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रोपाई के बजाय बोआई कर धान की खेती अपना रहे किसान
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गोंडा। कोरोना महामारी में किसानों ने कई नए प्रयोग शुरू कर दिए हैं। परसपुर के किसानों ने जलवायु आधारित खेती अपनाई है। धान के बेरन तैयार करके रोपाई करते थे, अब सीधे बुवाई की पद्धति को अपना रहे हैं। खेती में लागत तो घट ही रही है, श्रम भी कम आ रहा है। उपज भी अधिक होने का अनुमान है।
धान की रोपाई की खेती में अधिक पानी और श्रम की जरूरत पड़ती थी। जिससे धान की उत्पादन लागत बढ़ जाती है। रोपाई में अधिक श्रमिकों की जरूरत से कोरोना प्रोटोकाल लागू करने में कठिनाई होती थी। खेत में पानी भरने पर ही बेरन की रोपाई संभव होती थी, इससे पानी अधिक लगता था।
जमीन के पोषक तत्वों भी प्रभावित हो रहे थे। इन दुष्प्रभावों से बचाने और लागत घटाने के लिए परसपुर के राजकीय कृषि बीज भंडार के प्रभारी अनूप सिंह चौहान ने किसानों को प्रेरित किया, और कई किसानों ने उनकी पहल को अपनाया है। सीधे धान की बुआई करने की पद्धति पर खेती शुरू कर दी है।
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कई मायनों में कारगर सीधी बुवाई की खेती: अनूप
प्रभारी राजकीय कृषि बीज भंडार परसपुर अनूप सिंह चौहान ने व्यापक पहल की गई एवं किसानों को जलवायु आधारित खेती के लिए प्रेरित किया। बताया कि किसानों ने कस्टम हायरिंग एवं फार्म मशीनरी बैंक की योजना का लाभ उठाते हुए सीड ड्रिल एवं सुपर सीडर द्वारा धान की बुवाई की गई। कुछ किसानों ने छिड़काव विधि से बुवाई की, जिससे लागत में कमी आयी। श्रम एवं जल की कम आवश्यकता हुई। गिरते हुए जलस्तर के लिए सहायक सिद्ध हुई है। रोपाई पद्धति की अपेक्षा सिर्फ 20 प्रतिशत जल की आवश्यकता होती है। धान की सीधी बुवाई के लिए 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर देसी प्रजाति एवं 15 किलोग्राम संकर धान के प्रजाति की आवश्यकता होती है। धान की बुवाई मानसून आने से 10 से 12 दिन पूर्व की जाती है।
किसानों ने कहा, कम लागत में अच्छी उपज
परसपुर में ग्राम मधईपरुखाण्डेराय गलिबहा निवासी किसान अरूण सिंह ने कहा कि सीधी बुवाई की खेती उन्होंने अपनाई है और इससे लागत में कमी आई है। वहीं अच्छी उपज भी मिलेगा। साथ ही गांव के अनिल सिंह व अविनाश सिंह, चरौहां निवासी रविशंकर सिंह, बबलू सिंह डेहरास, राजेश सिंह परसपुर, विवेक सिंह परसपुर, बेचन सिंह राजापुर, चंद्रहास सिंह बहुवन, शिवाकांत सिंह, राजेश त्रिपाठी डेहरास, इंद्र प्रकाश शुक्ला आदि ने इस पद्धति को अपनाया गया है।
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धान की रोपाई की खेती में अधिक पानी और श्रम की जरूरत पड़ती थी। जिससे धान की उत्पादन लागत बढ़ जाती है। रोपाई में अधिक श्रमिकों की जरूरत से कोरोना प्रोटोकाल लागू करने में कठिनाई होती थी। खेत में पानी भरने पर ही बेरन की रोपाई संभव होती थी, इससे पानी अधिक लगता था।
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जमीन के पोषक तत्वों भी प्रभावित हो रहे थे। इन दुष्प्रभावों से बचाने और लागत घटाने के लिए परसपुर के राजकीय कृषि बीज भंडार के प्रभारी अनूप सिंह चौहान ने किसानों को प्रेरित किया, और कई किसानों ने उनकी पहल को अपनाया है। सीधे धान की बुआई करने की पद्धति पर खेती शुरू कर दी है।
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कई मायनों में कारगर सीधी बुवाई की खेती: अनूप
प्रभारी राजकीय कृषि बीज भंडार परसपुर अनूप सिंह चौहान ने व्यापक पहल की गई एवं किसानों को जलवायु आधारित खेती के लिए प्रेरित किया। बताया कि किसानों ने कस्टम हायरिंग एवं फार्म मशीनरी बैंक की योजना का लाभ उठाते हुए सीड ड्रिल एवं सुपर सीडर द्वारा धान की बुवाई की गई। कुछ किसानों ने छिड़काव विधि से बुवाई की, जिससे लागत में कमी आयी। श्रम एवं जल की कम आवश्यकता हुई। गिरते हुए जलस्तर के लिए सहायक सिद्ध हुई है। रोपाई पद्धति की अपेक्षा सिर्फ 20 प्रतिशत जल की आवश्यकता होती है। धान की सीधी बुवाई के लिए 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर देसी प्रजाति एवं 15 किलोग्राम संकर धान के प्रजाति की आवश्यकता होती है। धान की बुवाई मानसून आने से 10 से 12 दिन पूर्व की जाती है।
किसानों ने कहा, कम लागत में अच्छी उपज
परसपुर में ग्राम मधईपरुखाण्डेराय गलिबहा निवासी किसान अरूण सिंह ने कहा कि सीधी बुवाई की खेती उन्होंने अपनाई है और इससे लागत में कमी आई है। वहीं अच्छी उपज भी मिलेगा। साथ ही गांव के अनिल सिंह व अविनाश सिंह, चरौहां निवासी रविशंकर सिंह, बबलू सिंह डेहरास, राजेश सिंह परसपुर, विवेक सिंह परसपुर, बेचन सिंह राजापुर, चंद्रहास सिंह बहुवन, शिवाकांत सिंह, राजेश त्रिपाठी डेहरास, इंद्र प्रकाश शुक्ला आदि ने इस पद्धति को अपनाया गया है।