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विधानसभा चुनाव से पूर्व कहीं ये सत्ता के खिलाफ लहर तो नहीं

Mon, 03 May 2021 11:13 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Mon, 03 May 2021 11:13 PM IST
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Panchayat elections are daunting for BJP
गोंडा। पंचायत चुनाव में समर्थित प्रत्याशियों को मैदान में उतारना भाजपा को महंगा पड़ता दिखा। गांव की सरकार चुनने की इस जंग में भाजपा के कई दिग्गज धराशायी हुए। जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी के लिए संगठन ने जिन पर दांव लगाया और सांसद से लेकर विधायक तक पूरा दमखम दिखाया वह भी जीत हासिल नहीं कर सके।
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भाजपा समर्थित प्रत्याशियों को जिला पंचायत सदस्य की करीब एक दर्जन सीट पर ही विजय मिली है। चौकाने वाली बात यह रही कि समर्थन न मिलने से भाजपा छोड़ बतौर बागी चुनाव मैदान में उतरे प्रत्याशियों ने ज्यादा बेहतर प्रदर्शन चुनाव मैदान में किया।
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इसके चलते ही कई निर्दलीय प्रत्याशियों ने भाजपा प्रत्याशियों को हराने में कामयाबी हासिल की। चुनाव परिणामों के बाद अब यह चर्चा जोरों पर दिख रही है कि कहीं यह सत्ता के खिलाफ लहर तो नहीं है जिसे परखने के लिए भाजपा ने रणनीति तय की थी।
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फरवरी 2022 में आम विधानसभा चुनाव होने हैं। जिले के दो सांसद, सात विधायक सभी भाजपा के हैं। जनप्रतिनिधियों व कार्यकर्ताओं को तरजीह न मिलने कारण कई कार्यकर्ता पंचायत चुनाव में बागी हो गए। इसका असर भी परिणाम आने के बाद दिखा।
नवाबगंज ब्लाक क्षेत्र में तीन जिला पंचायत वार्ड हैं। तीनों में भाजपा के समर्थित प्रत्याशी चुनाव हार गए। भाजपा के ही वरिष्ठ कार्यकर्ता महेंद्र सिंह ने निर्दल प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े और वह विजई रहे। इसी तरह भाजपा के अवध क्षेत्र के क्षेत्रीय उपाध्यक्ष व पूर्व जिलाध्यक्ष पीयूष मिश्र को प्रदेश संगठन के आदेश पर मैदान में उतारा गया।
इनके समर्थन में गोंडा सांसद कीर्तिवर्धन सिंह, प्रदेश के समाज कल्याणमंत्री रमापति शास्त्री व गौरा के विधायक प्रभात वर्मा ने गांवों में चौपाल लगाकर पीयूष के लिए वोट मांगे पर वे सपा के विजय यादव से चुनाव हार गए। सपा के पूर्व जिलाध्यक्ष अकबाल बहादुर तिवारी भी बेलसर से चुनाव हार गए।
कटरा बाजार चतुर्थ से भाजपा के समर्थित प्रत्याशी अर्जुन प्रसाद तिवारी सपा के वकार खां से चुनाव हार गए। संगठन के ये नामचीन नाम हैं जिन पर भाजपा ने दांव लगाया था और संगठन तथा सत्ता की उपलब्धियों के बलबूते मैदान मारने की सोच के साथ उतारा गया था। लेकिन संगठन का यह पैंतरा काम न आया।
कैसरगंज से भाजपा के सांसद बृजभूषण शरण सिंह को नकारना तो महंगा नहीं पड़ा। पंचायत चुनाव में भाजपा ने समर्थित जिला पंचायत उम्मीदवारों की सूची जारी की। इसमें सांसद बृजभूषण शरण सिंह की पत्नी पूर्व सांसद केतकी सिंह, बेटे करन भूषण शरण सिंह को टिकट नहीं दिया गया, जबकि वह प्रबल दावेदार थे।
केतकी सिंह निवर्तमान जिला पंचायत अध्यक्ष भी रहीं। ऐसे में माना जा रहा था कि इस पंचायत चुनाव में सांसद बृजभूषण का रुतबा फिर गालिब होगा लेकिन उनके परिजनों को टिकट तक नहीं दिया गया।

पंचायत चुनाव में भाजपा के तमाम कार्यकर्ता जिला पंचायत सदस्य पद के लिए निर्दलीय प्रत्याशी के बतौर मैदान में उतरे थे। भाजपा ने अपने समर्थित प्रत्याशी के पक्ष में किसी भी बागी को मनाने की कोई कोशिश नहीं की बल्कि उन्हें बागी करार देते हुए पार्टी से छह साल के लिए निष्कासित कर दिया था। इसकी नाराजगी भी पार्टी कार्यकर्ताओं में साफ दिखी।
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