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सरयू घाघरा संगम तट त्रिमुहानी पर एक माह का कल्पवास शुरू

Tue, 21 Dec 2021 10:48 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Tue, 21 Dec 2021 10:48 PM IST
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One month's Kalpwas started at Saryu Ghaghra Sangam
गोंडा। पौराणिक, धार्मिक, आध्यात्मिक व ऐतिहासिक अवध के चौरासी कोसी परिक्रमा मार्ग में अवस्थित भगवान वाराह की अवतार स्थली पसका सूकरखेत में एक माह तक चलने वाले कल्पवास शुरू हो गया है। नागा बाबा व साधु-संत मां सरयू संगम की रेती पर फूस की कुटिया डाल कल्पवास के साथ पूजा अर्चना में जुट गए हैं।
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पौराणिक मान्यता है कि सतयुग में हिरणाकश्यप का भाई हिरण्याक्ष पृथ्वी को चुरा कर पाताल में चला गया था। तब भगवान विष्णु ने पृथ्वी को मुक्त कराने के लिये इसी स्थान पर वाराह का रूप धारण कर हिरण्याक्ष नामक राक्षस का वध किया था। इस लिये इस तपो स्थली को सूकरखेत या वाराह क्षेत्र भी कहा जाता है।
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सरयू नदी के इस पवित्र तट पर नागा, साधु सन्यासी व गृहस्थ सांसारिक सुख सुविधाओं को तिलांजलि देकर फूस की कुटिया डाल एक माह तक कल्पवास, तपस्या में लीन रहते हैं। पसका, सूकरखेत राजापुर में ही रामचरित मानस की रचना करने वाले गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म हुआ था। पसका में तुलसीदास के गुरु नरहरिदास का आश्रम भी है। रामचरित मानस के बालकांड में इस स्थान का उल्लेख खुद तुलसीदास ने किया है।
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पसका, सूकरखेत में सरयू व घाघरा दोनों नदियां मिलती हैं। इसलिये इस स्थली को संगम कहते हैं। कुछ साल पहले संगम स्थल पर बांध बनने के कारण यहां से सात किमी दूर चंदापुर किटौली में दोनों नदियां मिलती हैं। इस स्थली का उल्लेख स्कन्द पुराण में भी मिलता है। रामचरित मानस के बालकांड में भी इस पुण्य क्षेत्र का उल्लेख मिलता था। ऐसी मान्यता है कि की इस संगम के त्रिमुहानी में स्नान करने से तीनों तापों से मोक्ष प्राप्त होता है

प्रशासनिक अफसरों की ढिलाई के चलते पसका, सूकरखेत में संगम तट के त्रिमुहानी घाट व कल्पवास स्थल पर साफ सफाई के साथ ही जरूरी मूलभूत सेवाओं का कोई इंतजाम नहीं है। इसके चलते कल्पवास स्थल पर व्याप्त भीषण गंदगी से फूस की कुटिया बना कर कल्पवास करने वाले साधू संतों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। सबसे ज्यादा परेशानी कल्पवास स्थल पर ही शवों के हो रहे अंतिम संस्कार की चिंताओं से उठते धुएं के कारण हो उठानी पड़ रही है।
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