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घाघरा व सरयू के संगम में बांध से बाधा

Wed, 15 Jun 2022 10:48 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Wed, 15 Jun 2022 10:48 PM IST
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Obstacle from the dam at the sangam of Ghaghra and Saryu
गोंडा। पसका सूकरखेत में घाघरा व सरयू नदी के संगम स्थल पर 16 साल पहले बांध बना दिया गया था। इससे तीर्थराज कहलाने वाले पौराणिक क्षेत्र पसका सूकरखेत के त्रिमुहानी घाट पर अब दोनों नदियों का संगम नहीं हो पा रहा है। इसके चलते इस स्थान पर संगम की सार्थकता ही समाप्त होती जा रही है। इसे लेकर लोगों में आक्रोश है। संगम में बाधा बन रहे बांध को हटाने की मांग की जा रही है। मांग है कि सायफन फाटक लगाकर भी बाढ़ से बचाव हो सकता था मगर बांध बनने से नदियों का संगम नहीं हो पा रहा है।
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सूकरखेत पसका धार्मिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इसके महत्व का वर्णन ग्रंथों व महाकाव्यों में भी किया गया है। यहां भगवान वाराह का प्राचीन मंदिर भी है। मंदिर में सालभर पूजा-पाठ हुआ करता है। धार्मिक दृष्टिकोण का दूसरा पहलू यह भी है कि यहां सरयू व घाघरा नदियां मिलकर एक धारा में परिवर्तित होती हैं। इस स्थान को संगम के नाम से भी जाना जाता है। यहीं से घाघरा नदी का नाम सरयू पड़ा है और लाखों लोग यहां स्नान-दान कर पुण्य लाभ कमाते हैं। प्रति वर्ष सूकरखेत पसका में पौष पूर्णिमा पर भव्य मेले का आयोजन होता है।
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यहां त्रिमुहानी घाट के किनारे नागा, साधु, संन्यासी तथा गृहस्थ धर्म के लोग एक माह तक कल्पवास कर पुण्य लाभ अर्जित करते हैं। इस स्थान का उल्लेख स्कंद पुराण में भी है। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से इसका महत्व मानस के अमर रचनाकार गोस्वामी तुलसीदास के जन्म स्थान के रूप में भी माना जाता है। ऐसे में संगम स्थल पर बांध बनने से लोगों की आस्था पर तो चोट पहुंची ही, लोगों की भावनाएं भी आहत हुईं हैं। बांध बनने से दोनों नदियों का संगम अब चंदापुर किटौली के निकट होता है। लोगों का कहना है कि यदि घाघरा की धारा पर सायफन फाटक लटका दिया गया होता तो बाढ़ से बचाव भी होता। साथ ही संगम का अस्तित्व भी बरकरार रहता। इस समस्या की ओर नेताओं ने ध्यान नहीं दिया जिससे संगम के अस्तित्व पर संकट बना हुआ है।
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घाघरा नदी से निकलकर सरयू में जाने वाली धारा पर 16 वर्ष पहले वर्ष 2006 में बाढ़ से बचाव के लिए बांध बना दिया गया था। लोगों का कहना है कि घाघरा की धारा पर यदि सायफन लगा दिया गया होता तो बाढ़ से बचाव होता। साथ ही संगम का अस्तित्व भी बरकरार रहता। नागा, साधु-संतों के साथ ही 84 कोसी परिक्रमा के परिक्रमार्थियों की ओर से महंत गयादास जी महाराज ने मुख्यमंत्री को संबोधित ज्ञापन नायब तहसीलदार को देकर संगम बहाली की मांग की थी। साथ ही स्नान घाट पर शवों का अंतिम संस्कार आदि न करने सहित तीन सूत्री मांगपत्र सौंपा था। अब लोगों ने मांग की है कि संगम का अस्तित्व फिर से बहाल हो।
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