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चार साल पहले जगी थी उम्मीद, अब घाघरा बनी सरयू

Wed, 15 Jan 2020 12:15 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Wed, 15 Jan 2020 12:15 AM IST
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ghaghara will be saryu
गोंडा। प्रदेश की योगी सरकार ने चार साल पहले घाघरा का नाम सरयू होने की जगी उम्मीद को पूरा कर दिया। इससे जिले के लोगों में उत्साह है। अब सरयू मैय्या का दायरा बिहार तक बढ़ गया है। अभी तक बहराइच से निकलकर करनैलगंज और फिर अयोध्या तक ही सरयू नदी का अस्तित्व था।
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इसके अलावा घाघरा नाम ही जाना जाता था। घाघरा का नाम सरयू किए जाने की घोषण करनैलगंज के चचरी में वर्ष 2016 में तत्कालीन सपा सरकार के सिंचाई मंत्री शिवपाल सिंह यादव ने किया था। लेकिन नामकरण की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई थी। प्रदेश की योगी सरकार ने घाघरा का नाम सरयू किए जाने का फैसला लेकर जिले के लोगों के सपनों को पूरा किया है।
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जिले के करनैलगंज क्षेत्र में घाघरा और सरयू दोनों नदियां हैं, लेकिन घाघरा बहराइच से करनैलगंज होते हुए निकली है। पसका के त्रिमुहानी घाट पर सरयू और घाघरा का संगम होता है, जिसे संगम स्थल के नाम से जाना जाता है। इसके बाद चंदापुर किटौली के आगे से फिर घाघरा ही कहा जाता है, फिर अयोध्या में सरयू नदी है।
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इसके बाद सरयू नदी का कोई अस्तित्व नही होता है। क्यों अयोध्या के टांडा, राजेसुल्तानपुर, दोहरीघाट होते हुए बलिया तक यह नदी घाघरा के नाम से ही जानी जाती है जो बिहार के छपरा में गंगा से जाकर मिल जाती है। प्रदेश सरकार की ओर से घाघरा का नाम सरयू किए जाने के बाद अब सरयू नदी का दायरा बिहार तक हो जाएगा और यह नदी करीब एक हजार किमी लंबी हो जाएगी।
इन्हीं तर्कों के साथ वर्ष 2016 में तत्कालीन बेसिक शिक्षा राज्यमंत्री योगेश प्रताप सिंह ने सिंचाई मंत्री शिवपाल सिंह से घाघरा का नाम सरयू करने की मांग किया था। जिस पर उन्होंने चचरी में घोषण करने के साथ ही सरयू के पौराणिकता को देखते हुए विकास की घोषण की थी।
करनैलगंज में सरयू घाट के विकास के साथ ही संगम स्थल पर विकास का खाका खींचा था। लेकिन घोषण पर अमल नही हो पाया था। प्रदेश की योगी सरकार ने रामायण काल में सरयू के महत्व को देखते हुए घाघरा का नाम सरयू किए जाने का फैसला लिया है। जिससे अब सरयू नदी का विस्तार होने के साथ ही विकास की उम्मीद भी बढ़ी है।
माना जा रहा है कि रामायण सर्किट के विकास में सरयू तटों का विकास भी होगा। जिले के एक दर्जन से अधिक गांव और नदी के तटवर्ती क्षेत्र 84 कोसी परिक्रमा में शामिल हैं, ऐसे में क्षेत्र का पौराणिक महत्व भी बढ़ेगा।
...तो अब खत्म हो जाएगा संगम का अस्तित्व
अभी तक घाघरा व सरयू दो नदियों के होने से पसका के त्रिमुहानी घाट पर संगम होता है। यहीं पर घाघरा और सरयू का मिलन होता था, हर साल कार्तिक पूर्णिमा को संगम मेला भी लगता है। यहां का पौराणिक इतिहास भी है कि भगवान विष्णु ने वाराह भगवान के अवतार में हिरण्याक्ष राक्षस का बध करके मां धरती का यहीं पर मुक्त कराया था।
पूरे विश्व की रक्षा का स्थल यहीं पर है। अब घाघरा का नाम सरयू हो जाने के बाद संगम का कोई औचित्य ही नही रहेगा। लेकिन सरयू नदी के अस्तित्व का विस्तार होगा। इसकी खुशी सभी में दिख रही है।
घाटों के विकास और तीर्थ त्रिकोण योजना की उम्मीद जगी
सरयू नदी के तटों का अपना पौराणिक इतिहास है। पसका के संगम तट पर वर्ष 2005-06 में तत्कालीन सिंचाई मंत्री योगेश सिंह ने चंद्राकार घाट का निर्माण कराया था। इसके बाद घाटों के विकास की योजना आगे नही बढ़ी।
यही नही वर्ष 2016 में घाघरा का नाम सरयू किए जाने की घोषणा के साथ ही घाटों के निर्माण, सरयू नदी के तट पर पार्क के निर्माण की घोषण भी हुई थी। लेकिन यह योजना आगे नही बढ़ सकी। इसी तरह तीर्थ त्रिकोण का प्रस्ताव भी खटाई में पड़ गया।

इसके लिए भी वर्ष 2016 में ही एक योजना बनी थी, जिसमें सरयू नदी के घाट के साथ ही पसका, राजापुर को जोड़ कर विकास की योजना शुरु होनी थी। अब एक बार फिर उम्मीद जगी है कि इन पौराणिक स्थलों के विकास की योजनाएं रफ्तार पकड़ेगी।
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