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गोंडा में 30 दिनों के भीतर 24 बच्चों की गई जान
Updated Wed, 06 Sep 2017 12:32 AM IST
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महिला अस्पताल के एसएनसीयू वार्ड में 14 नवजातों ने तोड़ा दम
तो जिला अस्पताल के चिल्ड्रेन वार्ड में थमी 10 बच्चों की सांसें
गोंडा। गर्भस्थ और नवजात शिशुओं से लेकर 10 साल तक के बच्चों की जान बचाने में जिले का स्वास्थ्य महकमा कितना सक्षम है, इसका अंदाजा अगस्त महीने में हुई 24 बच्चों की मौतों से लगाया जा सकता है। जिन 24 बच्चों की मौतें जिले में हुई, उसमें सर्वाधिक 14 बच्चे महिला अस्पताल में बने 10 बेड के एनसीयू वार्ड में भर्ती थे। जबकि एक साल से 10 साल तक की उम्र के 10 बच्चों की मौत जिला अस्पताल के चिल्ड्रेन वार्ड में हुई।
हालांकि स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि मरने वाले ज्यादातर बच्चे कम उम्र के थे और उनका वजन काफी कम था। वहीं दूसरी ओर जिला अस्पताल के चिल्ड्रेन वार्ड में भर्ती बच्चों की मौत के मामले में कोई जिम्मेदार डॉक्टर मुंह खोलने को भी तैयार नहीं है। बच्चों के लिए बने वार्ड में ही उन्हें बचाने के कोई इंतजाम नहीं हैं। अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञ के पद पर तैनात एक डॉक्टर घनश्याम गुप्ता पिछले तीन महीनों से निलंबित चल रहे हैं। जिन्हें अबतक निदेशालय से कोई आरोप पत्र निर्गत नहीं किया गया है। ऐसे में यहां भर्ती होने वाले बच्चों की पूरी देखरेख का जिम्मा डा. बीसी गुप्ता और डाक्टर बीएल रस्तोगी पर ही है।
बच्चों के लिए जिला अस्पताल में अलग से बने 20 बेड के चिल्ड्रेन वार्ड में न तो रेडिएंट वार्मर है न ही सांस लेने में आ रही दिक्कतों के लिए ऑक्सीजन की कोई ठीकठाक व्यवस्था। कभी-कभी तो एक ही बेड पर दो-दो बच्चों को लिटाकर उनका इलाज करना पड़ता है। अगस्त महीने की 3 तारीख को इस वार्ड में भर्ती 10 साल की फूलमती की जान चली गई। जबकि ठीक तीन दिन बाद मनीष (3 साल) की मौत हो गई। वहीं 8 अगस्त को 9 साल की आरती, 13 अगस्त को 4 साल के आरिफ, 16 अगस्त को 13 साल के सिपाहीलाल, 19 अगस्त को डेढ़ साल के दीनदयाल, 25 अगस्त को ढाई साल के कुलदीप, 26 अगस्त को 7 साल की नीता तो 29 अगस्त को 7 साल की प्रियंका की यहां मौत हो गई। वहीं महिला अस्पताल में अगस्त महीने में कुल 73 बच्चे यहां बने एसएनसीयू वार्ड में भर्ती हुए। जिसमें से 14 की मौत हो गई।
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अबतक नहीं बना 30 बेड का पीकू वार्ड
बच्चों की जान बचाने के लिए जिला अस्पताल में बनने वाला 30 बेड का पीकू वार्ड अबतक बनकर तैयार नहीं हो पाया है। वहीं महिला अस्पताल में बना 10 बेड का एसएनसीयू वार्ड हर समय फुल रहता है। जबकि जिला अस्पताल के चिल्ड्रेन वार्ड में ऐसी कोई व्यवस्था ही नहीं है, जहां बच्चों का ठीक तरह से उपचार हो सके।
बुखार और डायरिया के मरीजों से भरा वार्ड
पूरे अगस्त महीने जिला अस्पताल का चिल्ड्रेन वार्ड बुखार और डायरिया से पीड़ित बच्चों से भरा रहा। वहीं इस महीने यह आंकड़ा कम होता नहीं दिख रहा। 20 बेड के इस अस्पताल में मौजूदा वक्त 40 से ऊपर बच्चे चिल्ड्रेन व हड्ड़ी वार्ड में भर्ती हैं। अगस्त महीने में 400 के करीब बच्चे चिल्ड्रेन वार्ड में भर्ती हुए थे। वहीं सितम्बर महीने की पांच तरीख तक ही इस वार्ड में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या 100 का आंकड़ा पार कर गई है।
जिला अस्पताल के चिल्ड्रेन वार्ड में नवजात शिशुओं को भर्ती करने की कोई व्यवस्था नहीं है। उसके लिए महिला अस्पताल है। रेडिएंट वार्मर की जरूरत हाईपोथर्मिया से पीड़ित बच्चों को पड़ती है। जिसके लिए जिला अस्पताल में 30 बेड का पीकू वार्ड निर्माणाधीन है। जिसमें वेंटीलेटर तक की व्यवस्था होगी। ऐसे में अगस्त महीने में जिन 10 बच्चों की मौत जिला अस्पताल में हुई, वह काफी सीरियस थे।
-डा. संतोष कुमार श्रीवास्तव, प्रभारी सीएमएस/सीएमओ, गोंडा
महिला अस्पताल में बना एसएनसीयू वार्ड 10 बेड का है। जिसमें अगस्त महीने के भीतर कुल 73 बच्चे भर्ती किए गए थे। इनमें से 14 बच्चों की मौत हो गई। जिन नवजात बच्चों की मौतें इस वार्ड में हुई वह सभी प्री-मेच्योर थे।
-डा.अरुण लाल, सीएमएस, महिला अस्पताल
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तो जिला अस्पताल के चिल्ड्रेन वार्ड में थमी 10 बच्चों की सांसें
गोंडा। गर्भस्थ और नवजात शिशुओं से लेकर 10 साल तक के बच्चों की जान बचाने में जिले का स्वास्थ्य महकमा कितना सक्षम है, इसका अंदाजा अगस्त महीने में हुई 24 बच्चों की मौतों से लगाया जा सकता है। जिन 24 बच्चों की मौतें जिले में हुई, उसमें सर्वाधिक 14 बच्चे महिला अस्पताल में बने 10 बेड के एनसीयू वार्ड में भर्ती थे। जबकि एक साल से 10 साल तक की उम्र के 10 बच्चों की मौत जिला अस्पताल के चिल्ड्रेन वार्ड में हुई।
हालांकि स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि मरने वाले ज्यादातर बच्चे कम उम्र के थे और उनका वजन काफी कम था। वहीं दूसरी ओर जिला अस्पताल के चिल्ड्रेन वार्ड में भर्ती बच्चों की मौत के मामले में कोई जिम्मेदार डॉक्टर मुंह खोलने को भी तैयार नहीं है। बच्चों के लिए बने वार्ड में ही उन्हें बचाने के कोई इंतजाम नहीं हैं। अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञ के पद पर तैनात एक डॉक्टर घनश्याम गुप्ता पिछले तीन महीनों से निलंबित चल रहे हैं। जिन्हें अबतक निदेशालय से कोई आरोप पत्र निर्गत नहीं किया गया है। ऐसे में यहां भर्ती होने वाले बच्चों की पूरी देखरेख का जिम्मा डा. बीसी गुप्ता और डाक्टर बीएल रस्तोगी पर ही है।
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बच्चों के लिए जिला अस्पताल में अलग से बने 20 बेड के चिल्ड्रेन वार्ड में न तो रेडिएंट वार्मर है न ही सांस लेने में आ रही दिक्कतों के लिए ऑक्सीजन की कोई ठीकठाक व्यवस्था। कभी-कभी तो एक ही बेड पर दो-दो बच्चों को लिटाकर उनका इलाज करना पड़ता है। अगस्त महीने की 3 तारीख को इस वार्ड में भर्ती 10 साल की फूलमती की जान चली गई। जबकि ठीक तीन दिन बाद मनीष (3 साल) की मौत हो गई। वहीं 8 अगस्त को 9 साल की आरती, 13 अगस्त को 4 साल के आरिफ, 16 अगस्त को 13 साल के सिपाहीलाल, 19 अगस्त को डेढ़ साल के दीनदयाल, 25 अगस्त को ढाई साल के कुलदीप, 26 अगस्त को 7 साल की नीता तो 29 अगस्त को 7 साल की प्रियंका की यहां मौत हो गई। वहीं महिला अस्पताल में अगस्त महीने में कुल 73 बच्चे यहां बने एसएनसीयू वार्ड में भर्ती हुए। जिसमें से 14 की मौत हो गई।
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अबतक नहीं बना 30 बेड का पीकू वार्ड
बच्चों की जान बचाने के लिए जिला अस्पताल में बनने वाला 30 बेड का पीकू वार्ड अबतक बनकर तैयार नहीं हो पाया है। वहीं महिला अस्पताल में बना 10 बेड का एसएनसीयू वार्ड हर समय फुल रहता है। जबकि जिला अस्पताल के चिल्ड्रेन वार्ड में ऐसी कोई व्यवस्था ही नहीं है, जहां बच्चों का ठीक तरह से उपचार हो सके।
बुखार और डायरिया के मरीजों से भरा वार्ड
पूरे अगस्त महीने जिला अस्पताल का चिल्ड्रेन वार्ड बुखार और डायरिया से पीड़ित बच्चों से भरा रहा। वहीं इस महीने यह आंकड़ा कम होता नहीं दिख रहा। 20 बेड के इस अस्पताल में मौजूदा वक्त 40 से ऊपर बच्चे चिल्ड्रेन व हड्ड़ी वार्ड में भर्ती हैं। अगस्त महीने में 400 के करीब बच्चे चिल्ड्रेन वार्ड में भर्ती हुए थे। वहीं सितम्बर महीने की पांच तरीख तक ही इस वार्ड में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या 100 का आंकड़ा पार कर गई है।
जिला अस्पताल के चिल्ड्रेन वार्ड में नवजात शिशुओं को भर्ती करने की कोई व्यवस्था नहीं है। उसके लिए महिला अस्पताल है। रेडिएंट वार्मर की जरूरत हाईपोथर्मिया से पीड़ित बच्चों को पड़ती है। जिसके लिए जिला अस्पताल में 30 बेड का पीकू वार्ड निर्माणाधीन है। जिसमें वेंटीलेटर तक की व्यवस्था होगी। ऐसे में अगस्त महीने में जिन 10 बच्चों की मौत जिला अस्पताल में हुई, वह काफी सीरियस थे।
-डा. संतोष कुमार श्रीवास्तव, प्रभारी सीएमएस/सीएमओ, गोंडा
महिला अस्पताल में बना एसएनसीयू वार्ड 10 बेड का है। जिसमें अगस्त महीने के भीतर कुल 73 बच्चे भर्ती किए गए थे। इनमें से 14 बच्चों की मौत हो गई। जिन नवजात बच्चों की मौतें इस वार्ड में हुई वह सभी प्री-मेच्योर थे।
-डा.अरुण लाल, सीएमएस, महिला अस्पताल