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तीर्थराज सूकरखेत में संगम का अस्तिव खत्म, स्थल उपेक्षित
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तीर्थराज सूकरखेत में संगम का अस्तित्व खत्म
गोंडा। पौराणिक, ऐतिहासिक, धार्मिक व सांस्कृतिक स्थल पसका सूकरखेत में घाघरा व सरयू नदी के संगम स्थल पर बांध बना दिया गया। इससे तीर्थराज कहा जाने वाला पौराणिक क्षेत्र पसका सूकरखेत के त्रिमुहानी घाट पर अब दोनों नदियों का संगम नहीं हो पा रहा है।
इससे इस स्थान की संगम नाम की सार्थकता ही समाप्त होती जा रही है। इस मुद्दे को लेकर पौष मास की पूर्णिमा के अवसर पर एक मास तक कल्पवास करने आने वाले साधु-संतों, नागा व गृहस्थ जनों में बेहद आक्रोश रहा।
माता पृथ्वी को हिरण्याक्ष राक्षस से मुक्त कराने के लिए भगवान विष्णु ने सूकर के रूप में यहीं अवतार लिया था। राक्षस को मारकर मां पृथ्वी को मुक्त कराकर सृष्टि को सुरक्षित किया था लेकिन यह क्षेत्र उपेक्षित ही रहा।
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सूकरखेत पसका धार्मिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इसके महत्व का वर्णन ग्रंथों व महाकाव्यों में भी किया गया है। यहां भगवान वाराह का प्राचीन मंदिर भी स्थित है।
मंदिर में साल भर पूजा-पाठ हुआ करता है। धार्मिक दृष्टिकोण का दूसरा पहलू यह भी है कि यहां सरयू व घाघरा नदियां मिल कर एक धारा में परिवर्तित होती हैं। इस स्थान को संगम के नाम से भी जाना जाता है।
यहीं से घाघरा नदी का नाम सरयू पड़ा है और लाखों लोग यहां स्नान-दान कर पुण्य लाभ कमाते हैं। प्रति वर्ष सूकरखेत पसका में पौष पूर्णिमा पर भव्य मेले का आयोजन होता है।
यहां त्रिमुहानी घाट के किनारे नागा, साधु, संन्यासी तथा गृहस्थ धर्म के लोग एक माह तक कल्पवास कर पुण्य लाभ अर्जित करते हैं। इस स्थान का उल्लेख स्कंद पुराण में भी है।
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से इसका महत्व मानस के अमर रचनाकार गोस्वामी तुलसीदास जी के जन्म स्थान के रूप में भी माना जाता है। कहा जाता है कि गोस्वामी तुलसीदास ने अपने बाल्यकाल में यहीं पर अपने गुरु नरहरिदास जी से रामकथा सुनी थी।
संगम स्थल पर बांध बनने से लोगों की आस्था पर तो चोट पहुंची ही, लोगों की भावनाएं भी आहत हुयी हैं। बांध बनने से दोनों नदियों का संगम अब चंदापुर किटौली के निकट होता है।
लोगों का कहना है कि यदि घाघरा की धारा पर सायफन फाटक लटका दिया गया होता तो बाढ़ से बचाव भी होता। साथ ही संगम का अस्तित्व भी बरकरार रहता। इस समस्या की ओर नेताओं ने ध्यान नहीं दिया जिससे संगम के अस्तित्व पर संकट बना है।
सनातन धर्म परिषद् एवं तुलसी पीठाधीश्वर डॉ. स्वामी भगवदाचार्य का कहना है कि उन्होंने कई बार इस मुद्दे को उठाया लेकिन नेताओं ने अनदेखी ही की। स्थल के विकास और संगम के गौरव को स्थापित करने की पहल नहीं की गई।
चेतावनी दी कि अगर प्रशासन ने मांगों पर विचार नहीं किया तो संत आरपार की लड़ाई के लिये मजबूर होंगे। सतयुग से जुड़े ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल संगम स्थान का महत्व धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है। संगम स्थली पर सायफन फाटक लगवाना जरूरी है। यदि मांगें पूरी न हुईं तो आंदोलन किया जायेगा।
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गोंडा। पौराणिक, ऐतिहासिक, धार्मिक व सांस्कृतिक स्थल पसका सूकरखेत में घाघरा व सरयू नदी के संगम स्थल पर बांध बना दिया गया। इससे तीर्थराज कहा जाने वाला पौराणिक क्षेत्र पसका सूकरखेत के त्रिमुहानी घाट पर अब दोनों नदियों का संगम नहीं हो पा रहा है।
इससे इस स्थान की संगम नाम की सार्थकता ही समाप्त होती जा रही है। इस मुद्दे को लेकर पौष मास की पूर्णिमा के अवसर पर एक मास तक कल्पवास करने आने वाले साधु-संतों, नागा व गृहस्थ जनों में बेहद आक्रोश रहा।
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माता पृथ्वी को हिरण्याक्ष राक्षस से मुक्त कराने के लिए भगवान विष्णु ने सूकर के रूप में यहीं अवतार लिया था। राक्षस को मारकर मां पृथ्वी को मुक्त कराकर सृष्टि को सुरक्षित किया था लेकिन यह क्षेत्र उपेक्षित ही रहा।
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सूकरखेत पसका धार्मिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इसके महत्व का वर्णन ग्रंथों व महाकाव्यों में भी किया गया है। यहां भगवान वाराह का प्राचीन मंदिर भी स्थित है।
मंदिर में साल भर पूजा-पाठ हुआ करता है। धार्मिक दृष्टिकोण का दूसरा पहलू यह भी है कि यहां सरयू व घाघरा नदियां मिल कर एक धारा में परिवर्तित होती हैं। इस स्थान को संगम के नाम से भी जाना जाता है।
यहीं से घाघरा नदी का नाम सरयू पड़ा है और लाखों लोग यहां स्नान-दान कर पुण्य लाभ कमाते हैं। प्रति वर्ष सूकरखेत पसका में पौष पूर्णिमा पर भव्य मेले का आयोजन होता है।
यहां त्रिमुहानी घाट के किनारे नागा, साधु, संन्यासी तथा गृहस्थ धर्म के लोग एक माह तक कल्पवास कर पुण्य लाभ अर्जित करते हैं। इस स्थान का उल्लेख स्कंद पुराण में भी है।
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से इसका महत्व मानस के अमर रचनाकार गोस्वामी तुलसीदास जी के जन्म स्थान के रूप में भी माना जाता है। कहा जाता है कि गोस्वामी तुलसीदास ने अपने बाल्यकाल में यहीं पर अपने गुरु नरहरिदास जी से रामकथा सुनी थी।
संगम स्थल पर बांध बनने से लोगों की आस्था पर तो चोट पहुंची ही, लोगों की भावनाएं भी आहत हुयी हैं। बांध बनने से दोनों नदियों का संगम अब चंदापुर किटौली के निकट होता है।
लोगों का कहना है कि यदि घाघरा की धारा पर सायफन फाटक लटका दिया गया होता तो बाढ़ से बचाव भी होता। साथ ही संगम का अस्तित्व भी बरकरार रहता। इस समस्या की ओर नेताओं ने ध्यान नहीं दिया जिससे संगम के अस्तित्व पर संकट बना है।
सनातन धर्म परिषद् एवं तुलसी पीठाधीश्वर डॉ. स्वामी भगवदाचार्य का कहना है कि उन्होंने कई बार इस मुद्दे को उठाया लेकिन नेताओं ने अनदेखी ही की। स्थल के विकास और संगम के गौरव को स्थापित करने की पहल नहीं की गई।
चेतावनी दी कि अगर प्रशासन ने मांगों पर विचार नहीं किया तो संत आरपार की लड़ाई के लिये मजबूर होंगे। सतयुग से जुड़े ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल संगम स्थान का महत्व धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है। संगम स्थली पर सायफन फाटक लगवाना जरूरी है। यदि मांगें पूरी न हुईं तो आंदोलन किया जायेगा।