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अब जिले में कितनी बची गौरैया, इसकी गिनती कराएगा विभाग
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गाजीपुर। कुछ साल पहले तक देहात से लेकर शहर तक हर आंगन, बालकनी में फुदकती और चहकती गौरैया मिल जाती थी लेकिन अब उनकी गणना कराने की नौबत आ गई है। वन विभाग 20 मार्च विश्व गौरैया संरक्षण दिवस पर जनपद में गौरैया की गिनती शुरू करा रहा है।
राजकीय जैव विविधता बोर्ड की तरफ से पहली बार इस तरह का अभियान शुरू किया जा रहा है। दो हफ्ते में कर्मियों और लोगों की मदद से जनपद में गौरैया का आंकड़ा पता लगाया जाएगा। वन विभाग का कहना है कि सभी रेंजरों और अन्य वनकर्मियों को मिलाकर कुल 90 लोगों को गौरैया की गिनती के लिए सक्रिय किया गया है। आमजन को इस मुहिम से जोड़ने के लिए डीएफओ ने अपना मोबाइल नंबर 7839435180 जारी किया है, जिस पर क्षेत्र में दिखने वाली गौरैया की संख्या बताई जा सकती है।
कभी गर्मी शुरू होते ही सुबह से शाम तक गौरैया खेत, खलिहान, आंगन, मुंडेर हर जगह दाना चुंगती, पानी पीते या झुंड में चहचहाती दिख जाती थी। पिछले दो दशक में गौरैया के प्राकृतिक आवास नष्ट होने होने लगे और अस्तित्व पर असर पड़ना शुरू हो गया है। पहले अधिकांश घर कच्चे और सरपत के होते थे तो गौरैया भी बड़े आराम से उसी आवास में अपना आशियाना बना लेती थी। दिन भर उसी घर के आसपास मंडरातीं, दाना चुगतीं और अपने बच्चों के साथ घोंसले में चली जातीं। इधर कुछ वर्षों में पक्के मकान बनने लगे। छोटे-बड़े जल स्रोत सूखने और पर्यावरण प्रदूषण के चलते गौरैया को बी अस्तित्व की लड़ाई लड़नी पड़ रही है।
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लोगों को जागरूक करने के लिए अभियान छेड़ा गया है। गौरैया की गणना करना समय की जरूरत है। साथ ही गौरैया को बचाने के लिए लोगों को मानव निर्मित घोसला भी विभाग की ओर से उपलब्ध कराया जाएगा। उनके लिए लोगों को दाना,पानी अपने छत या आस-पास रखने के लिए जागरूक किया जाएगा। प्रदीप कुमार, डीएओ
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राजकीय जैव विविधता बोर्ड की तरफ से पहली बार इस तरह का अभियान शुरू किया जा रहा है। दो हफ्ते में कर्मियों और लोगों की मदद से जनपद में गौरैया का आंकड़ा पता लगाया जाएगा। वन विभाग का कहना है कि सभी रेंजरों और अन्य वनकर्मियों को मिलाकर कुल 90 लोगों को गौरैया की गिनती के लिए सक्रिय किया गया है। आमजन को इस मुहिम से जोड़ने के लिए डीएफओ ने अपना मोबाइल नंबर 7839435180 जारी किया है, जिस पर क्षेत्र में दिखने वाली गौरैया की संख्या बताई जा सकती है।
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कभी गर्मी शुरू होते ही सुबह से शाम तक गौरैया खेत, खलिहान, आंगन, मुंडेर हर जगह दाना चुंगती, पानी पीते या झुंड में चहचहाती दिख जाती थी। पिछले दो दशक में गौरैया के प्राकृतिक आवास नष्ट होने होने लगे और अस्तित्व पर असर पड़ना शुरू हो गया है। पहले अधिकांश घर कच्चे और सरपत के होते थे तो गौरैया भी बड़े आराम से उसी आवास में अपना आशियाना बना लेती थी। दिन भर उसी घर के आसपास मंडरातीं, दाना चुगतीं और अपने बच्चों के साथ घोंसले में चली जातीं। इधर कुछ वर्षों में पक्के मकान बनने लगे। छोटे-बड़े जल स्रोत सूखने और पर्यावरण प्रदूषण के चलते गौरैया को बी अस्तित्व की लड़ाई लड़नी पड़ रही है।
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लोगों को जागरूक करने के लिए अभियान छेड़ा गया है। गौरैया की गणना करना समय की जरूरत है। साथ ही गौरैया को बचाने के लिए लोगों को मानव निर्मित घोसला भी विभाग की ओर से उपलब्ध कराया जाएगा। उनके लिए लोगों को दाना,पानी अपने छत या आस-पास रखने के लिए जागरूक किया जाएगा। प्रदीप कुमार, डीएओ