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जागरूकता अभियान बेअसर, एड्स के मरीज बढ़े
Updated Sat, 01 Dec 2018 11:03 PM IST
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गाजीपुर। भारत सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के संयुक्त पहल के बाद भी एड्स के रोगियों की तादात बढ़ती जा रही है। जनपद में मौजूदा समय में एड्स रोगियों की संख्या 1512 है। जिसमें 90 नाबालिग भी शामिल हैं। इनकी उम्र 14 से 17 वर्ष है। इसके साथ ही 809 पुरूष और 553 महिलाएं एड्स रोग की चपेट में हैं। सदर अस्पताल के एंटी रेट्रो थिरेपी सेंटर (एआरटी सेंटर) द्वारा की गई जांच में यह तथ्य अब तक सामने आए हैं। इनमें से 1452 मरीजों का इलाज फिलहाल जनपद में चल रहा है।
एड्स जैसे खतरनाक और लाइलाज बीमारी के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए सरकार द्वारा करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। बावजूद एड्स पीड़ितों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। रोगियों में कमी लाने और जागरूकता के लिए रैली, गोष्ठी और अभियान निरंतर चलाए जा रहे हैं, लेकिन इसका खास असर नहीं दिखाई दे रहा है। लोगों को जागरूक करने की दिशा में कई एनजीओ (नान गर्वनमेंट आर्गेनाइजेशन) के साथ केंद्र सरकार रेड रिबन एक्सप्रेस तक चलाने का काम करती है। इतना ही नहीं इसके प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए सरकार की ओर से हर साल एक दिसंबर को एड्स दिवस मनाया जाता है।
एचआईवी (ह्यूमन इम्यूनो डिफीसिएंसी वायरस) पीड़ित व्यक्ति की सही समय पर जानकारी न होने से यह एचआईवी से परिवर्तित होकर एड्स का रूप ले लेती है। एचआईवी रोगी के टेस्ट में ए-1, ए-2, ए-3 पॉजीटिव पाया जाता है तो वह एड्स (एक्वायर्ड इम्यूनो डिफीसिएंसी सिंड्रोम) में परिवर्तित हो जाता है। इसके चलते एड्स पीड़ित मरीजों में प्रतिरोधक क्षमता यानि डब्ल्यूबीसी की कमी होने लगती है। प्रतिरोधक क्षमता में कमी होने से रोगी कई बीमारियों की चपेट में आ जाता है। अंतत: एक दिन मरीज की मौत हो जाती है। इसके लिए सीडी-4 की जांच कराई जाती है। डाक्टरों की ओर से एड्स रोगी को हीमोग्लोबिन नौ से अधिक बनाए रखने की सलाह दी जाती है। इसके लिए खानपान पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है।
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जिला अस्पताल में प्रतिमाह औसतन 40 से 50 संभावित एड्स रोगियों की जांच होती है। इसमें 12 से 13 मरीज पीड़ित पाए जा रहे हैं। वर्ष 2012 से लेकर अब तक कुल 1512 लोग एड्स से पीड़ित पाए गए हैं, जिसमें ज्यादातर पेशे से ड्राइवर और मजदूर हैं। 90 नाबालिग बच्चों के साथ 553 महिलाएं भी शामिल हैं। जबकि पिछले वर्ष एड्स से पीड़ित मरीजों की संख्या 1357 थी।
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एड्स जैसे खतरनाक और लाइलाज बीमारी के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए सरकार द्वारा करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। बावजूद एड्स पीड़ितों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। रोगियों में कमी लाने और जागरूकता के लिए रैली, गोष्ठी और अभियान निरंतर चलाए जा रहे हैं, लेकिन इसका खास असर नहीं दिखाई दे रहा है। लोगों को जागरूक करने की दिशा में कई एनजीओ (नान गर्वनमेंट आर्गेनाइजेशन) के साथ केंद्र सरकार रेड रिबन एक्सप्रेस तक चलाने का काम करती है। इतना ही नहीं इसके प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए सरकार की ओर से हर साल एक दिसंबर को एड्स दिवस मनाया जाता है।
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एचआईवी (ह्यूमन इम्यूनो डिफीसिएंसी वायरस) पीड़ित व्यक्ति की सही समय पर जानकारी न होने से यह एचआईवी से परिवर्तित होकर एड्स का रूप ले लेती है। एचआईवी रोगी के टेस्ट में ए-1, ए-2, ए-3 पॉजीटिव पाया जाता है तो वह एड्स (एक्वायर्ड इम्यूनो डिफीसिएंसी सिंड्रोम) में परिवर्तित हो जाता है। इसके चलते एड्स पीड़ित मरीजों में प्रतिरोधक क्षमता यानि डब्ल्यूबीसी की कमी होने लगती है। प्रतिरोधक क्षमता में कमी होने से रोगी कई बीमारियों की चपेट में आ जाता है। अंतत: एक दिन मरीज की मौत हो जाती है। इसके लिए सीडी-4 की जांच कराई जाती है। डाक्टरों की ओर से एड्स रोगी को हीमोग्लोबिन नौ से अधिक बनाए रखने की सलाह दी जाती है। इसके लिए खानपान पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है।
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जिला अस्पताल में प्रतिमाह औसतन 40 से 50 संभावित एड्स रोगियों की जांच होती है। इसमें 12 से 13 मरीज पीड़ित पाए जा रहे हैं। वर्ष 2012 से लेकर अब तक कुल 1512 लोग एड्स से पीड़ित पाए गए हैं, जिसमें ज्यादातर पेशे से ड्राइवर और मजदूर हैं। 90 नाबालिग बच्चों के साथ 553 महिलाएं भी शामिल हैं। जबकि पिछले वर्ष एड्स से पीड़ित मरीजों की संख्या 1357 थी।