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त्याग ने ही महापुरुषों दिलाया आदर: विनम्र सागर
Amar Ujala
Updated Tue, 13 Sep 2016 11:50 PM IST
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त्याग ने ही महापुरुषों दिलाया आदर: विनम्र सागर
- फोटो : Amar Ujala
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त्याग ने ही महापुरुषों दिलाया आदर: विनम्र सागर
- छदामीलाल जैन मंदिर में मुनि महाराज ने दिए प्रवचन
- दशलक्षण महापर्व परा मंदिरों में धूमधाम से हो अर्चना
दशलक्षण महापर्व के अंतर्गत मंगलवार को उत्तम त्याग धर्म पर मंदिरों में विद्वानों एवं मुनि महाराजों ने प्रवचन दिए। देर सायं मंदिरों में सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं प्रतियोगिताएं आयोजित की गई। ।
श्री छदामीलाल जैन मंदिर में आचार्य श्री विनम्र सागर जी महाराज ने कहा कि गहन अनुभव की पराकाष्ठा को अभिव्यक्त करने के लिए त्याग किया जाता है। त्याग सारे संकल्पों और विकल्पों के दांत तोड़कर रख देता है। त्याग में उल्टा फल प्राप्त होता है। त्याग अंतरंग और उत्तम धर्म है। दान और त्याग करने वाले को ऊंची चीज दिखाई देती है। त्याग की दुनिया में सर्वत्र पूजा हुई है। महापुरुषों को आदर दिलाने वाला उनका त्याग ही है। आचार्यश्री ने कहा कि दिगंबर संतों को देखकर अपने अंदर शतांश भाग त्याग आना चाहिए। त्याग करना कोई अहसान नहीं है यह स्वयं हल्के होने का सुगम तरीका है। स्त्री गर्भ न त्यागे तो मर जाए। गाय दूध न त्यागे तो मर जाए। पेड़ फल न त्यागे तो कोई पेड़ के पास आना पसंद नहीं करेगा। दान में अपना भी उपकार होता है, दूसरों का भी उपकार होता है। वहीं चंद्रप्रभु मंदिर में मुनि श्री विज्ञ सागर जी महाराज ने प्रवचन दिए। सायं को विद्वान कमलेश जैन शास्त्री ने प्रवचन देकर श्रद्धालुओं को धर्म ज्ञान कराया। नसियाजी मंदिर, अट्टावाला मंदिर, विभव नगर, लोहियान गली, जैन नगर खेड़ा, घेर घोखल में भी पूजा अर्चना धूमधाम से की गई।
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- छदामीलाल जैन मंदिर में मुनि महाराज ने दिए प्रवचन
- दशलक्षण महापर्व परा मंदिरों में धूमधाम से हो अर्चना
दशलक्षण महापर्व के अंतर्गत मंगलवार को उत्तम त्याग धर्म पर मंदिरों में विद्वानों एवं मुनि महाराजों ने प्रवचन दिए। देर सायं मंदिरों में सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं प्रतियोगिताएं आयोजित की गई। ।
श्री छदामीलाल जैन मंदिर में आचार्य श्री विनम्र सागर जी महाराज ने कहा कि गहन अनुभव की पराकाष्ठा को अभिव्यक्त करने के लिए त्याग किया जाता है। त्याग सारे संकल्पों और विकल्पों के दांत तोड़कर रख देता है। त्याग में उल्टा फल प्राप्त होता है। त्याग अंतरंग और उत्तम धर्म है। दान और त्याग करने वाले को ऊंची चीज दिखाई देती है। त्याग की दुनिया में सर्वत्र पूजा हुई है। महापुरुषों को आदर दिलाने वाला उनका त्याग ही है। आचार्यश्री ने कहा कि दिगंबर संतों को देखकर अपने अंदर शतांश भाग त्याग आना चाहिए। त्याग करना कोई अहसान नहीं है यह स्वयं हल्के होने का सुगम तरीका है। स्त्री गर्भ न त्यागे तो मर जाए। गाय दूध न त्यागे तो मर जाए। पेड़ फल न त्यागे तो कोई पेड़ के पास आना पसंद नहीं करेगा। दान में अपना भी उपकार होता है, दूसरों का भी उपकार होता है। वहीं चंद्रप्रभु मंदिर में मुनि श्री विज्ञ सागर जी महाराज ने प्रवचन दिए। सायं को विद्वान कमलेश जैन शास्त्री ने प्रवचन देकर श्रद्धालुओं को धर्म ज्ञान कराया। नसियाजी मंदिर, अट्टावाला मंदिर, विभव नगर, लोहियान गली, जैन नगर खेड़ा, घेर घोखल में भी पूजा अर्चना धूमधाम से की गई।
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