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डायलिसिस : अभी करना होगा 100 दिन का और इंतजार
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फतेहपुर। जिला अस्पताल में डायलिसिस यूनिट शुरू होने में अभी वक्त लगेगा। मौजूदा हालातों के मुताबिक यह यूनिट अगले वर्ष यानी कि 2022 के शुरुआती महीनों में शुरू हो सकेगी। हालांकि यूनिट का लगना 100 फीसदी तय है, मगर, इसकी सेवा मिलने में अभी वक्त लगेगा क्योंकि तीन कमरों का निर्माण होना अभी बाकी है।
बीते 15 अगस्त से सदर अस्पताल में डायलिसिस यूनिट संचालित होने का जन प्रतिनिधि कई अलग-अलग मंचों से एलान कर चुके हैं। हाल ही में जनपद आए डिप्टी सीएम केशव मौर्य के मंच से जिले की सांसद और केंद्रीय राज्यमंत्री साध्वी निरंजन ज्योति ने भी इस बात का एलान किया था। मगर डायलिसिस यूनिट का धरातल पर अभी तक अतापता नहीं हैं। हालांकि जिन घरों में मरीजों को डायलिसिस करानी पड़ रही है, वह बड़ी बेसब्री इसका इंतजार कर रहे हैं।
दरअसल, जिन मरीजों को डायलिसिस हो रही है, उन्हें 100 से 150 किमी दूर गैर जनपदों में जाना पड़ता है। एक बार की डायलिसिस में औसतन आठ से 10 हजार रुपये खर्च करने पड़ते हैं, तब जाकर कहीं डायलिसिस हो पाती है। ऐसे में यह यूनिट अगर जनपद मुख्यालय में शुरू हो जाती है, तो लोगों को इसका बड़ा लाभ मिलेगा।
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चौधराना मोहल्ले के अजय कुसार साहू ने बताया कि उनके भाई प्रदीप कुमार साहू की किडनी खराब है। डेढ़ महीने से डायलिसिस करा रहे हैं। इसके लिए लखनऊ जाना पड़ता है। एक बार के आने जाने में ही दो से ढ़ाई हजार रुपए खर्च हो जाते हैं। फतेहपुर में यह व्यवस्था हो जाए तो बड़ी राहत मिलेगी। लखनऊ तक आने और जाने में ही मरीज की हालत पस्त हो जाती है।
बिंदकी बस स्टाप के एमआईसी के समीप रहने वाले राकेश कुमार त्रिपाठी के परिजनों ने बताया कि कानपुर डायलिसिस कराने जाते हैं। आने-जाने को छोड़कर सिर्फ डायलिसिस में ही 2200 से 3250 रुपये तक लग जाते हैं। कुल खर्च की बात करें तो यह आठ से दस हजार रुपये होता है। उन लोगों का पूरा दिन लग जाता है। शहर में यह व्यवस्था हो गई तो दिक्कत नहीं होगी।
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शहर के तांबेश्वर मंदिर के पास रहने वाले नसीम सिद्दकी ने बताया कि एक सप्ताह में दो बार डायलिसिस के लिए डॉक्टर बुलाते हैं। इस तरह से महीने में औसत रूप से आठ से नौ बार डायलिसिस होती है। इस तरह से आने-जाने और डायलिसिस के खर्च को जोड़कर महीने में 40 से 50 हजार का खर्च आता है। शहर में जल्द से जल्द इसे चालू करने के लिए प्रयास होने चाहिए।
डायलिसिस एक तरह से रक्त शोधन की कृत्रिम विधि है। इस प्रक्रिया को तब अपनाया जाता है, जब किसी व्यक्ति के वृक्क यानि गुर्दे सही से काम नहीं कर रहे होते हैं। गुर्दे से जुड़े रोगों, लंबे समय से मधुमेह के रोगी, उच्च रक्तचाप जैसी स्थितियों में कई बार डायलिसिस की आवश्यकता पड़ती है।
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कोट -
फोटो 23- अपूर्वा दुबे
डायलिसिस यूनिट लगना तय है। इसकी प्रक्रिया चल रही है। मशीन के इंस्टाल होने में 90 दिन का वक्त लगता है और यूनिट लगाने आई टीम ने तीन कमरों की डिमांड की है। कमरे तैयार करने की भी तैयारी हो गई है। अभी तकरीबन सौ से सवा दिन लग सकते हैं।
- अपूर्वा दुबे, जिलाधिकारी
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बीते 15 अगस्त से सदर अस्पताल में डायलिसिस यूनिट संचालित होने का जन प्रतिनिधि कई अलग-अलग मंचों से एलान कर चुके हैं। हाल ही में जनपद आए डिप्टी सीएम केशव मौर्य के मंच से जिले की सांसद और केंद्रीय राज्यमंत्री साध्वी निरंजन ज्योति ने भी इस बात का एलान किया था। मगर डायलिसिस यूनिट का धरातल पर अभी तक अतापता नहीं हैं। हालांकि जिन घरों में मरीजों को डायलिसिस करानी पड़ रही है, वह बड़ी बेसब्री इसका इंतजार कर रहे हैं।
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दरअसल, जिन मरीजों को डायलिसिस हो रही है, उन्हें 100 से 150 किमी दूर गैर जनपदों में जाना पड़ता है। एक बार की डायलिसिस में औसतन आठ से 10 हजार रुपये खर्च करने पड़ते हैं, तब जाकर कहीं डायलिसिस हो पाती है। ऐसे में यह यूनिट अगर जनपद मुख्यालय में शुरू हो जाती है, तो लोगों को इसका बड़ा लाभ मिलेगा।
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चौधराना मोहल्ले के अजय कुसार साहू ने बताया कि उनके भाई प्रदीप कुमार साहू की किडनी खराब है। डेढ़ महीने से डायलिसिस करा रहे हैं। इसके लिए लखनऊ जाना पड़ता है। एक बार के आने जाने में ही दो से ढ़ाई हजार रुपए खर्च हो जाते हैं। फतेहपुर में यह व्यवस्था हो जाए तो बड़ी राहत मिलेगी। लखनऊ तक आने और जाने में ही मरीज की हालत पस्त हो जाती है।
बिंदकी बस स्टाप के एमआईसी के समीप रहने वाले राकेश कुमार त्रिपाठी के परिजनों ने बताया कि कानपुर डायलिसिस कराने जाते हैं। आने-जाने को छोड़कर सिर्फ डायलिसिस में ही 2200 से 3250 रुपये तक लग जाते हैं। कुल खर्च की बात करें तो यह आठ से दस हजार रुपये होता है। उन लोगों का पूरा दिन लग जाता है। शहर में यह व्यवस्था हो गई तो दिक्कत नहीं होगी।
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शहर के तांबेश्वर मंदिर के पास रहने वाले नसीम सिद्दकी ने बताया कि एक सप्ताह में दो बार डायलिसिस के लिए डॉक्टर बुलाते हैं। इस तरह से महीने में औसत रूप से आठ से नौ बार डायलिसिस होती है। इस तरह से आने-जाने और डायलिसिस के खर्च को जोड़कर महीने में 40 से 50 हजार का खर्च आता है। शहर में जल्द से जल्द इसे चालू करने के लिए प्रयास होने चाहिए।
डायलिसिस एक तरह से रक्त शोधन की कृत्रिम विधि है। इस प्रक्रिया को तब अपनाया जाता है, जब किसी व्यक्ति के वृक्क यानि गुर्दे सही से काम नहीं कर रहे होते हैं। गुर्दे से जुड़े रोगों, लंबे समय से मधुमेह के रोगी, उच्च रक्तचाप जैसी स्थितियों में कई बार डायलिसिस की आवश्यकता पड़ती है।
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फोटो 23- अपूर्वा दुबे
डायलिसिस यूनिट लगना तय है। इसकी प्रक्रिया चल रही है। मशीन के इंस्टाल होने में 90 दिन का वक्त लगता है और यूनिट लगाने आई टीम ने तीन कमरों की डिमांड की है। कमरे तैयार करने की भी तैयारी हो गई है। अभी तकरीबन सौ से सवा दिन लग सकते हैं।
- अपूर्वा दुबे, जिलाधिकारी