{"_id":"56f822534f1c1bd154f14fed","slug":"alive-ramkali","type":"story","status":"publish","title_hn":"जिंदा हो गई रामकली ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जिंदा हो गई रामकली
अमर उजाला ब्यूरो फतेहपुर
Updated Sun, 27 Mar 2016 11:41 PM IST
विज्ञापन
जिंदगी की जंग जीतने वाली महिला रामकली
- फोटो : अमर उजाला
फतेहपुर। डॉक्टर को भगवान का दर्जा यूं ही नहीं दिया गया है। बेशक आज के दौर में धरती के यह भगवान धन कमाने के लालच में कभी-कभी हैवान बन जाते हैं। फिर भी तमाम पल ऐसे भी सामने आए जब यही भगवान नामकरण के अनुरूप खुद को स्थापित करने में सफल हुए। अपनी विधा से मौत और जिंदगी के नजदीक फासले को एक झटके में खत्म कर दिया। ऐसा ही एक नजीर सदर अस्पताल के वरिष्ठ फिजीशियन डॉ. एनके सक्सेना ने पेश की। अंतिम समय मानकर एक महिला को अस्पताल से बाहर किया जा रहा था, तभी इनकी नजर उस पर पड़ गई। महिला को दोबारा भर्ती कर उपचार किया गया और वह अब स्वस्थ है।
भिटौरा पीएचसी के गांव बसोहनी निवासी ननकू बाल्मीकि की 50 वर्षीय पत्नी रामकली को श्वांस की बीमारी थी। हालत बिगड़ने पर परिजन 14 मार्च को सदर अस्पताल लेकर आए थे। रामकली का इलाज फिजीशियन डॉ. आरएस प्रजापति की देखरेख में चालू हुआ। दो दिन भर्ती रहने के बावजूद हालत में सुधार तो नहीं हुआ अलबत्ता सेहत जरूर बिगड़ गई। फिर 16 मार्च को एक ऐसा क्षण आया जब महिला का अंतिम समय मान कर उसे रेफर कर दिया गया।
अस्पताल प्रशासन के हाथ खड़े कर लेने से मायूस परिजनों के आंखों से आसुंओं की धार निकल पड़ी। वे रामकली को स्ट्रेचर पर लादे रोते हुए लेकर बाहर जा रहे थे। राउंड पर निकले अस्पताल के वरिष्ठ फिजीशियन डॉ. एनके सक्सेना ने देखा तो उनसे नहीं रहा गया। फिर क्या था? उन्होंने महिला को बजाय कहीं और ले जाने के खुद स्वस्थ करने का जिम्मा ले लिया। इस दौरान महिला की पल्स-बीपी पूरी तरह से जवाब दे रही थी। इसके बावजूद डॉ. सक्सेना ने हिम्मत नहीं हारी और महिला को आक्सीजन देने के साथ पूरे दो घंटे आईपीडी में रुककर हालात पर नजर रखी।
विज्ञापन
इसके बाद जो महिला लगभग जिंदगी से हाथ धो चुकी थी उसकी हालत में सुधार होने लगा। यह डॉक्टर का प्रयास ही था कि जिस महिला को मरने की कगार पर रेफर किया गया था। होलिका दहन से पहले 22 मार्च को वह खुद डिस्चार्ज स्लिप कटवा कर अपने घर लौटी।
विज्ञापन
भिटौरा पीएचसी के गांव बसोहनी निवासी ननकू बाल्मीकि की 50 वर्षीय पत्नी रामकली को श्वांस की बीमारी थी। हालत बिगड़ने पर परिजन 14 मार्च को सदर अस्पताल लेकर आए थे। रामकली का इलाज फिजीशियन डॉ. आरएस प्रजापति की देखरेख में चालू हुआ। दो दिन भर्ती रहने के बावजूद हालत में सुधार तो नहीं हुआ अलबत्ता सेहत जरूर बिगड़ गई। फिर 16 मार्च को एक ऐसा क्षण आया जब महिला का अंतिम समय मान कर उसे रेफर कर दिया गया।
विज्ञापन
अस्पताल प्रशासन के हाथ खड़े कर लेने से मायूस परिजनों के आंखों से आसुंओं की धार निकल पड़ी। वे रामकली को स्ट्रेचर पर लादे रोते हुए लेकर बाहर जा रहे थे। राउंड पर निकले अस्पताल के वरिष्ठ फिजीशियन डॉ. एनके सक्सेना ने देखा तो उनसे नहीं रहा गया। फिर क्या था? उन्होंने महिला को बजाय कहीं और ले जाने के खुद स्वस्थ करने का जिम्मा ले लिया। इस दौरान महिला की पल्स-बीपी पूरी तरह से जवाब दे रही थी। इसके बावजूद डॉ. सक्सेना ने हिम्मत नहीं हारी और महिला को आक्सीजन देने के साथ पूरे दो घंटे आईपीडी में रुककर हालात पर नजर रखी।
विज्ञापन
इसके बाद जो महिला लगभग जिंदगी से हाथ धो चुकी थी उसकी हालत में सुधार होने लगा। यह डॉक्टर का प्रयास ही था कि जिस महिला को मरने की कगार पर रेफर किया गया था। होलिका दहन से पहले 22 मार्च को वह खुद डिस्चार्ज स्लिप कटवा कर अपने घर लौटी।