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खुद के शहर में बेगाने मशहूर शायर गुलाम रब्बानी तांबा

Fri, 07 Feb 2020 12:10 AM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Fri, 07 Feb 2020 12:10 AM IST
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मशहूर शायर गुलाम रब्बानी तांबा। संवाद न्यूज एजेंसी - फोटो : FARRUKHABAD
कायमगंज। गुलाम रब्बानी तांबा ने खुद के शहर फर्रुखाबाद का नाम हिंदुस्तान में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में रोशन किया है। उन्होंने अपनी शेरो-शायरी और लेखन के जरिये चार-पांच दशकों तक आजादी, देश प्रेम, धर्मनिरपेक्षता और समानता की आवाज बुलंद कर आधुनिक उर्दू शायरी के शिखर तक पहुंचाया। अन्याय, अत्यचार और शोषण के खिलाफ वह लड़ाई लड़ते रहे।
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प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष व उर्दू अकादमी के महत्वपूर्ण पदों पर रहे। उनकी शुक्रवार को बरसी है। पर ऐसे गजलकार को याद करने के लिए न तो प्रशासन के पास कोई कार्यक्रम है, न ही यहां के साहित्य, संस्कृति को संरक्षण देने का दंभ भरने वालों के पास वक्त है।
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मशहूर शायर गुलाम रब्बानी तांबा का जन्म 14 फरवरी 1914 को कायमगंज के पितौरा गांव में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई। इसके बाद उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से इंटर, आगरा से बीए व एलएलबी की डिग्री हासिल की। कुछ दिन तक फतेहगढ़ में वकालत करने के बाद मन नहीं लगा तो छोड़ दी। इसके बाद वह मकतबा जामिया (पब्लिकेशन हाउस) से जुड़ गए। 1970 में जनरल मैनेजर पद से सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने गजल व शेरो-शायरी को अपना जीवन बना लिया। साहित्य को उन्होंने अपने जीवन के 40 साल दिए। साजे-लरजा (1950), हदीस-ए- दिल (1960), जौक-ए- सफर (1970), नवा-ए- आवारा (1976) और गुबार ए मंजिल (1990) नाम से उनकी नज्मों और गजलों के पांच संग्रह प्रकाशित हुए हैं।
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सन 1974 में हवा के दोश पर नाम से रेडियो वार्ता और फीचर्स का संकलन निकला था। उनके द्वारा अंग्रेजी में लिखे गए लेखों का संग्रह पोएटिक्स टू पॉलटिक्स नाम से सन 1987 में प्रकाशित हुआ। उन्हें साहित्यिक अवदान के लिए कई पुरस्कारों से नवाजा गया। 1972 में उन्हें जैक ए सफर के लिए उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी अवार्ड मिला। फिर 1973 में इसी संग्रह के लिए उन्हें सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड दिया गया। इसी संग्रह को 1979 में साहित्य अकादमी अवार्ड भी मिला।
उनके साहित्यिक योगदान को देखते हुए 1982 में उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी ने स्पेशल अवार्ड से नवाजा। 1986 में उन्हें बहादुर शाह जफर अवार्ड दिया गया। इसके साथ ही तांबा साहब पूर्व राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन के निकट संबंधी व पूर्व गवर्नर खुर्शीद आलम खां के भाई भी हैं। उनके दो पुत्र इकतिदार आलम खां व इफ्तिखार आलम अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रोफेसर पद से रिटायर हो चुके हैं।
छोटे पुत्र पूर्व विधायक इजहार आलम खां गांव पितौरा में रहते हैं। उनके भतीजे पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद हैं। 7 फरवरी 1993 को वह इस दुनिया को अलविदा कह गए। पूर्व विधायक इजहार आलम खां ने कई बार कायमगंज में उनकी याद में आल इंडिया मुशायरे भी कराए। और समय समय पर परिवार उन्हें याद करता है।
छोटे बेटे पूर्व विधायक इजहार आलम खां बताते हैं वर्ष 1978 में अलीगढ़ में हिंदू-मुस्लिम दंगे हुए थे। यह दंगे एक माह तक चले थे। इस दौरान केंद्र में जनता पार्टी सरकार थी। मशहूर शायर गुलाम रब्बानी तांबा अलीगढ़ के दंगों से काफी दुखी थे।

उन्होंने दोनों कौमों से शांति की अपील भी की थी। जब दंगे नहीं रुके तो उन्होंने राष्ट्रपति को पत्र लिखा कि जो सरकार दो कौमों के बीच के दंगे नहीं कर रोक सकती, उस सरकार का मैं अवार्ड भी नहीं रख सकता। यह कहकर उन्होंने पद्मश्री वापस कर दिया था। सन 1971 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।
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