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असली शत्रु हमारे मन के अंदर विराजमान
farrukhabad
Updated Wed, 05 Dec 2018 11:49 PM IST
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बौद्ध धर्म गुरु दलाई लामा
- फोटो : अमर उजाला
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वाईबीएस सेंटर राजघाट मैनपुरी में चल रहे धम्म प्रवचन समारोह के अंतिम दिन बुधवार को दलाई लामा ने कहा कि असली शत्रु हमारे मन के अंदर विराजमान होता है, जो आसानी से नहीं निकाला जा सकता। बाहरी शत्रु को तो हम पहचानकर उससे लड़ सकते हैं लेकिन क्लेश रूपी शत्रु को निकालने के लिए बोधित्व की आवश्यकता होती है।
कहा कि करुणा को आधार बनाकर मन शुद्ध किया जाता है। दुख व सुख की वजह होती है, जिसे जानें और अज्ञानता की जड़ कैसे नष्ट करें। इस पर चिंतन करने की आवश्यकता है। सभी लोग निर्धनता का सिद्धांत अपनाएं। क्योंकि हर कोई एक-दूसरे पर निर्भर है। निर्भरता के सिद्धांत से ही हम किसी चीज की वास्तविकता को समझ सकते हैं। सुख तो सभी जीव चाहते हैं लेकिन यह तभी संभव है, जब हम दूसरों के प्रति स्नेह रखें। परहित व परस्नेह करने से सबसे ज्यादा लाभ खुद को होता है।
दलाई लामा ने कहा कि दूसरे के लिए स्नेह सोचने से उसका स्नेह नहीं होगा, बल्कि उसके साथ स्नेह करें, तभी उसका स्नेह होगा। बोधचित्त एक दिन की तपस्या से प्राप्त नहीं हो सकता। इसके लिए हमें कठिन तपस्या करनी होगी। क्लेश रूपी शत्रु को निकालने के लिए कड़े अभ्यास की जरूरत है। इसे जड़ से समाप्त करने के लिए प्रेम का अभ्यास करें। प्रेम के अभ्यास से ही बैर रूपी शत्रु का नाश हो सकता है। लोगों का उपहास करना व हत्या आदि करना ईर्ष्या और बैर से ही होते हैं। बैर समाप्त करने को प्रेम आवश्यक है। लखनऊ से आए कलाकारों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए। यूथ बुद्धिष्ट सोसाइटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुरेशचंद्र बौद्ध ने कार्यक्रम में सहयोग करने वाले लोगों को धन्यवाद दिया।
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कहा कि करुणा को आधार बनाकर मन शुद्ध किया जाता है। दुख व सुख की वजह होती है, जिसे जानें और अज्ञानता की जड़ कैसे नष्ट करें। इस पर चिंतन करने की आवश्यकता है। सभी लोग निर्धनता का सिद्धांत अपनाएं। क्योंकि हर कोई एक-दूसरे पर निर्भर है। निर्भरता के सिद्धांत से ही हम किसी चीज की वास्तविकता को समझ सकते हैं। सुख तो सभी जीव चाहते हैं लेकिन यह तभी संभव है, जब हम दूसरों के प्रति स्नेह रखें। परहित व परस्नेह करने से सबसे ज्यादा लाभ खुद को होता है।
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दलाई लामा ने कहा कि दूसरे के लिए स्नेह सोचने से उसका स्नेह नहीं होगा, बल्कि उसके साथ स्नेह करें, तभी उसका स्नेह होगा। बोधचित्त एक दिन की तपस्या से प्राप्त नहीं हो सकता। इसके लिए हमें कठिन तपस्या करनी होगी। क्लेश रूपी शत्रु को निकालने के लिए कड़े अभ्यास की जरूरत है। इसे जड़ से समाप्त करने के लिए प्रेम का अभ्यास करें। प्रेम के अभ्यास से ही बैर रूपी शत्रु का नाश हो सकता है। लोगों का उपहास करना व हत्या आदि करना ईर्ष्या और बैर से ही होते हैं। बैर समाप्त करने को प्रेम आवश्यक है। लखनऊ से आए कलाकारों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए। यूथ बुद्धिष्ट सोसाइटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुरेशचंद्र बौद्ध ने कार्यक्रम में सहयोग करने वाले लोगों को धन्यवाद दिया।
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