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20 साल से बना रहे हैं कल्पवासियों का ठिकाना
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पांचाल घाट पर झोपड़ी बनाते राजेश। संवाद
- फोटो : FARRUKHABAD
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अमृतपुर। मेला रामनगरिया लाखों गंगा भक्तों की आस्था का केंद्र है। वहीं कल्पवास के लिए आने वालों की आस्था से कई लोगों को रोजगार मिलता है। कल्पवासियों के लिए झोपड़ी बनाने का काम करने वाले राजेश कुमार भी इस मेले का पूरे साल इंतजार करते हैं। वह इन दिनों झोपड़ी बनाने के काम में जुटे हैं। इसकी कमाई से ही वह परिवार का पेट पालते हैं।
गांव दहलिया के राजेश कुमार गंगा तट पर तख्त डालकर पूजा पाठ करते हैं और उससे ही खर्च चलाते हैं। भूमिहीन होने से उन्हें रामनगरिया का बेसब्री से इंतजार रहता है। इस दौरान उनका पेशा थोड़ा बदल जाता है। वह मेला में कल्पवास करने आने वाले लोगों के लिए झोपड़ी बनाने का काम शुरू कर देते हैं। जो कल्पवासी राऊटी लेकर मेला में नहीं आते हैं, वह राजेश के हाथ की बनी झोपड़ी खरीदते हैं। उनका कहना है कि वह बीस साल से यह काम कर रहे हैं। मेले में वह 70 से 80 झोपड़ी बनाकर बेच देते हैं। एक झोपड़ी में पांच सौ रुपये का तक मुनाफा हो जाता है।
महंगाई की मार से कोई चीज अछूती नहीं रही है। कल्पवासियों की झोपड़ी भी महंगी हो गई है। पिछले वर्ष 900 रुपये में तैयार होने वाली झोपड़ी अब 15 सौ रुपये में तैयार हो रही है। इससे अब राजेश उसी झोपड़ी दो हजार रुपये में बेच रहे हैं। पिछले साल सेंठा का एक गठ्ठर 90 रुपये में मिलता था। वह 120 रुपये में मिल रहा है। भागा(फूस) का पुरा 20 से 25 की जगह 30 से 35 रुपये में मिल रहा है। एक झोपड़ी तैयार करने में 15 सौ रुपये का खर्चा हो जाता है। पिछले साल सभी खर्च निकालकर उन्हें 750 रुपये तक बच जाते थे। इस बार उन्हें पांच सौ रुपये ही बच रहे हैं। गंगा मैया के ही सहारे परिवार का पालन पोषण कर रहे हैं। कल्पवासियों की सुविधा के लिए किराए पर भी झोपड़ियां दे देते हैं।
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गांव दहलिया के राजेश कुमार गंगा तट पर तख्त डालकर पूजा पाठ करते हैं और उससे ही खर्च चलाते हैं। भूमिहीन होने से उन्हें रामनगरिया का बेसब्री से इंतजार रहता है। इस दौरान उनका पेशा थोड़ा बदल जाता है। वह मेला में कल्पवास करने आने वाले लोगों के लिए झोपड़ी बनाने का काम शुरू कर देते हैं। जो कल्पवासी राऊटी लेकर मेला में नहीं आते हैं, वह राजेश के हाथ की बनी झोपड़ी खरीदते हैं। उनका कहना है कि वह बीस साल से यह काम कर रहे हैं। मेले में वह 70 से 80 झोपड़ी बनाकर बेच देते हैं। एक झोपड़ी में पांच सौ रुपये का तक मुनाफा हो जाता है।
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महंगाई की मार से कोई चीज अछूती नहीं रही है। कल्पवासियों की झोपड़ी भी महंगी हो गई है। पिछले वर्ष 900 रुपये में तैयार होने वाली झोपड़ी अब 15 सौ रुपये में तैयार हो रही है। इससे अब राजेश उसी झोपड़ी दो हजार रुपये में बेच रहे हैं। पिछले साल सेंठा का एक गठ्ठर 90 रुपये में मिलता था। वह 120 रुपये में मिल रहा है। भागा(फूस) का पुरा 20 से 25 की जगह 30 से 35 रुपये में मिल रहा है। एक झोपड़ी तैयार करने में 15 सौ रुपये का खर्चा हो जाता है। पिछले साल सभी खर्च निकालकर उन्हें 750 रुपये तक बच जाते थे। इस बार उन्हें पांच सौ रुपये ही बच रहे हैं। गंगा मैया के ही सहारे परिवार का पालन पोषण कर रहे हैं। कल्पवासियों की सुविधा के लिए किराए पर भी झोपड़ियां दे देते हैं।
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