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नौकरी के लालच में हो गए भूमिहीन

Wed, 17 Feb 2016 11:51 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला,फर्रुखाबाद
ब्यूरो/अमर उजाला,फर्रुखाबाद Updated Wed, 17 Feb 2016 11:51 PM IST
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Jobs were lured landless

फर्रुखाबाद। कंपिल कताई मिल के श्रमिकों के सपनों को ग्रहण लग गया। मिल बंद होने से बेरोजगार हुए तकरीबन 1500 श्रमिकों में से दर्जन भर ऐसे हैं, जिन्होंने नौकरी के लालच में सहकारी कताई मिल को अपनी जमीन औने-पौने दामों में बेच दी थी। कुछ ही सालों में मिल बंद हो गई। जीपीएफ का पैसा भी अधिकारी डकार गए।

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वर्ष 1985 में शुरू हुई कंपिल में सहकारिता विभाग की कताई मिल को स्थानीय लोगों ने नौकरी के लालच में जमीन बेच दी थी। गांव शिवपुर के दामोदर भी इसी लालच के शिकार हुए। दामोदर का कहना है कि उसकी 20 बीघा जमीन मिल के अधिकारियों ने यह कहकर अधिग्रहण कर ली थी कि उसे तथा उसके परिवार के लोगों को मिल में हर समय नौकरी मिलती रहेगी। मुआवजे के नाम पर केवल उसे 900 रुपये बीघा दिया गया। इसी तरह से विनोद शुक्ल की 38 बीघा भूमि और विनोद दुबे की छह बीघा भूमि सहित दर्जनों किसानों की भूमि नौकरी के नाम पर अधिग्रहण हुई।
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वर्ष 2000 में कताई मिल बंद होने के बाद यह श्रमिक नौकरी और जमीन दोनों से हाथ धो बैठे। वर्ष 1985 से 2000 तक जीपीएफ के नाम पर लगातार पैसा काटा जाता रहा लेकिन इनके खाते में जीपीएफ रकम जमा नहीं की गई।
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इसी मिल के कर्मी छोटेलाल की बेवा शीतला देवी और रामबाबूू की बेवा रामबेटी का कहना है कि जीपीएफ का पैसा लेने के लिए उसके पति लगातार प्रयासरत रहे। उनके स्वर्ग सिधार जाने के बाद पिछले चार साल से वह विनोद शुक्ल संघर्ष समिति कताई मिल कंपिल के महामंत्री के साथ अधिकारियों के चक्कर लगा रही है लेकिन भविष्य निधि के नाम से उन्हें कुछ नहीं मिला है।

विनोद शुक्ल का कहना है कि सरकार की ओर से वीआरएस के नाम पर किसी को 60 हजार तो किसी को 70 हजार रुपये देकर चलता कर दिया गया। जीपीएफ के लिए वह एमडी का कार्य देख रहे कानपुर के मंडलायुक्त से कई बार संपर्क कर चुके हैं लेकिन अभी तक कुछ नहीं मिला है।


डीकोड के बंद हो जाने के बाद श्रमिकों का पैसा जीपीएफ के खाते में जमा नहीं हो सका। यह सच है कि श्रमिकों के वेतन से पैसा काटा जाता रहा। कई श्रमिकों की जमीन अधिग्रहीत की गई थी। मेरे आने से पहले ही मिल बंद हो गई थी। - एनके मिश्र (महाप्रबंधक, कंपिल कताई मिल )

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