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फर्रुखाबाद : कर्बला में दीन-ए-इस्लाम को बचाने आए थे इमाम
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घेरशांमू खां में मजलिस में बोलते फरहत अली जैदी। संवाद
- फोटो : FARRUKHABAD
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फर्रुखाबाद। मोहर्रम के चांद का दीदार होते ही इमामबाड़ों, घरों में मजलिसों का सिलसिला शुरू हो गया। मौलाना फरहत अली जैदी ने कहा कि इमाम कर्बला में दीन-ए-इस्लाम को बचाने के लिए आए थे। उनके साथ बच्चे भी थे। कर्बला का मातम सुन शैदाइयों के आंसू छलकने लगे।
रविवार को शहर के मोहल्ला घेर शामू खां स्थित आफताब हुसैन के आवास पर मजलिस हुई। इसमें शिया धर्मगुरु मौलाना फरहत अली जैदी ने कर्बला पर रोशनी डाली। कहा कि मोहर्रम गम का महीना है। कहा कि हजरत इमाम हुसैन कर्बला के मैदान में जंग करने के लिए नहीं आए थे।
अगर उन्हें जंग करनी होती तो वह अपने साथ छोटे-छोटे बच्चों को ना लाते। वह तो कर्बला में दीन-ए-इस्लाम को बचाने के लिए आए थे। कहा कि अगर हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 साथी कर्बला के मैदान में कुर्बानी न देते तो आज इस्लाम का कोई नाम लेने वाला न होता। इमाम हुसैन ने 72 लोगों की शहादत देकर दीन-ए-इस्लाम को बचा लिया।
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भूरा वाली गली के इमामबाड़े में शिया धर्मगुरु मौलाना सदाकत हुसैन सैंथली ने कहा कि हजरत इमाम हुसैन व उनके 72 साथियों की ऐसी शहादत है, जो समाज के अंदर एक कुर्बानी का जज्बा पैदा करती है।
कर्बला के अंदर जो जंग हुई वह जंग सत्य-असत्य के बीच की थी। इमामबाड़ा यावर हुसैन, मदारबाड़ी, घेर शामू खां और फतेहगढ़ भूसा मंडी इमामबाड़े में भी मजलिस हुई।
घरों से भी गूंजी या हुसैन की सदाएं
महिलाएं व छोटे-छोटे बच्चों ने हजरत इमाम हुसैन की शहादत के गम में नोहे पढ़े और मातम किया। घरों में काले लिवास में लोग दिन भर मातम मनाते रहेे।
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रविवार को शहर के मोहल्ला घेर शामू खां स्थित आफताब हुसैन के आवास पर मजलिस हुई। इसमें शिया धर्मगुरु मौलाना फरहत अली जैदी ने कर्बला पर रोशनी डाली। कहा कि मोहर्रम गम का महीना है। कहा कि हजरत इमाम हुसैन कर्बला के मैदान में जंग करने के लिए नहीं आए थे।
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अगर उन्हें जंग करनी होती तो वह अपने साथ छोटे-छोटे बच्चों को ना लाते। वह तो कर्बला में दीन-ए-इस्लाम को बचाने के लिए आए थे। कहा कि अगर हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 साथी कर्बला के मैदान में कुर्बानी न देते तो आज इस्लाम का कोई नाम लेने वाला न होता। इमाम हुसैन ने 72 लोगों की शहादत देकर दीन-ए-इस्लाम को बचा लिया।
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भूरा वाली गली के इमामबाड़े में शिया धर्मगुरु मौलाना सदाकत हुसैन सैंथली ने कहा कि हजरत इमाम हुसैन व उनके 72 साथियों की ऐसी शहादत है, जो समाज के अंदर एक कुर्बानी का जज्बा पैदा करती है।
कर्बला के अंदर जो जंग हुई वह जंग सत्य-असत्य के बीच की थी। इमामबाड़ा यावर हुसैन, मदारबाड़ी, घेर शामू खां और फतेहगढ़ भूसा मंडी इमामबाड़े में भी मजलिस हुई।
घरों से भी गूंजी या हुसैन की सदाएं
महिलाएं व छोटे-छोटे बच्चों ने हजरत इमाम हुसैन की शहादत के गम में नोहे पढ़े और मातम किया। घरों में काले लिवास में लोग दिन भर मातम मनाते रहेे।