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Farrukhabad News: अरहर की दाल चिरौंजी हुई गई, गेहुंआ भए बादाम

Sat, 10 Oct 2026 01:13 AM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Sat, 10 Oct 2026 01:13 AM IST
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Arhar dal has turned into chironji, and wheat grains have become almonds.
कमालगंज। रामलीला धर्म की शिक्षा के साथ ही लोक संस्कृति, संगीत व नाट्य परंपरा की वाहक भी है। कमालगंज की रामलीला में बिना रंगमंच के सड़क पर खेले जाने वाले नाटकों को ''नकल'' कहते थे। मनोरंजन व हास्य-व्यंग्य के साथ ही समाज की असल चीजों का नकल के रूप में मंचन कर बुराइयों को छोड़ने व सही को अपनाने पर बल दिया जाता था।
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बाल विवाह की बुराइयों के खिलाफ समाज को खड़ा करने के लिए ''बारे बलम की सेजन सोऊं, मैं बैरन हो जाऊं, महंगाई से गरीब तबके की समस्याओं को दर्शाने वाली नकल ''अरहर की दाल चिरौंजी हुई गई, गेहुंआ भए बादाम'' आदि नकलों को आज भी पुराने लोग याद करते हैं।
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रामलीला में कानपुर-फतेहगढ़ मार्ग स्थित कमालगंज के चौराहे पर रात नौ-दस बजे आरती कार्यक्रम के बाद खुले आकाश के नीचे बिना मंच के सड़क पर ही रंगमंच सज जाता था। तीन-चार घंटे तक नकल के रूप में नाटक खेले जाते थे। लोहियानगर निवासी 85 वर्षीय रामप्रकाश अहिरवार बताते हैं कि समाज की असल समस्याओं की नकल कर उन्हें नाट्य रूप में प्रस्तुत किया जाता था।
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नकल देखने के लिए सैकड़ों लोगों की भीड़ उमड़ती थी, जो घंटों जमी रहती थी। आज से 40 साल पहले तक नकल के कार्यक्रम होते रहे। अरहर की दाल चिरौंजी हुई गई, गेहुंआ भए बादाम नकल दर्शकों में खूब लोकप्रिय थी। आज यह लोकोक्ति महंगाई को लेकर सही साबित हो रही।
छोटी उम्र के नासमझ पति से ब्याह हो जाने से विवाहिता की पीड़ा को उजागर करने वाली नकल, ''बारे बलम की सेजन सोऊं'' जहां दर्शकों को गुदगुदाकर हास्य में डुबो देती थी, वहीं बाल विवाह के दुष्प्रभावों को लेकर सचेत भी करती थी।
सामाजिक समरसता व एकता की बजती थी वंशी का उपयोग
- केशव गुप्ता कहते हैं कि नकल के कार्यक्रमों में सामाजिक समरसता व एकता की वंशी बजती थी। स्वर्गीय अमीर हुसैन उस्ताद, मुल्ला बाथम व उनके भतीजे बद्री, कन्हई कठेरिया, रामभरोसे कमरया, हरी बाथम, मंगू शंखवार, छदामी, मन्नी दिवाकर सहित सभी लोग मिलजुलकर सड़क पर नकल खेलते थे। इस दौरान नाट्यकला से रोमांचित दर्शक झूमते रहते थे। ऊंट बनकर नाच भी होता था।


तुम्हें सखी नैहर की पड़ी, यहां निकले जाएं प्राण
- यदुनाथ सिंह बताते हैं कि एक नकल में चोर मकान में चोरी करने के लिए सेंध लगाता था, पीछे से पुलिस उसे पकड़ लेती। साफ संदेश है कि चोर पकड़ा जरूर जाएगा। तुम्हें सखी नैहर की पड़ी, यहां निकले जाएं प्राण, नकल में महिलाओं के मायके जाने की जिद को हास्य पूर्ण रूप में दर्शाया जाता था। समय के साथ सड़क पर खुले आकाश के नीचे नकल मंचन की परंपरा अतीत के झरोखों में जा पहुंची।
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