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गन्ने की खोई से बन रहे बर्तन बचाएंगे पर्यावरण
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अयोध्या-यश पेपर मिल में गन्ने की कुई से तैयार किए गए बर्तन।-संवाद
- फोटो : FAIZABAD
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अयोध्या। यश पेपर मिल ने कुछ महीनों पूर्व गन्ने की खोई से डिस्पोजबल बर्तन बनाने के लिए प्लांट लगाया था। आज यह कारोबार सालाना करीब 80 करोड़ का हो गया है।
पहले जहां गन्ने के खोई से बने बर्तनों की आपूर्ति देश में ही थी वहीं अब विदेशों में भी इसका निर्यात कंपनी कर रही है। सिंगल यूज प्लास्टिक पर एक जुलाई से प्रतिबंध लगने जा रहा है।
ऐसे में पेपर मिल प्रबंधन को गन्ने की खोई से बन रहे बर्तन एक बेहतर विकल्प के रूप में सामने आने की उम्मीद है। यश पेपर मिल में हेड ऑफ ऑपरेशन के पद पर कार्यरत मोहम्मद आवाज ने बताया कि शुरूआत में गन्ने की खोई से बने बर्तनों की मांग कम रही।
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धीरे-धीरे इसकी मांग बढ़ती चली गई। उन्होंने बताया कि हमने जो प्लांट लगाया है। उसमें हर रोज 10 लाख बर्तन बन सकते हैं। लेकिन अभी हम प्रतिदिन छह से आठ लाख पीस बना रहे हैं।
उन्होंने बताया कि गन्ने की खोई से बने हमारे बर्तनों में थाली, प्लेट, कटोरी आदि की पूरे भारत में खपत हो रही है। बंगलुरु, दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, पुणे सहित उत्तरप्रदेश में इसकी आपूर्ति की जा रही है।
हमारे प्रोडक्ट की मांग अब विदेशों में भी बढ़ी है। हर माह करीब दो लाख बर्तन हम विदेश भेज रहे हैं। कहा कि हाल ही में हमारी कंपनी को एक बड़ी सफलता मिली है। अमेरिका, दुबई और आस्ट्रेलिया से हमारे अनुबंध हुआ है।
इन तीनों देशों में भी हमारे बर्तन भेजे जा रहे हैं। गन्ने की खोई से बने करीब 15 लाख बर्तनों की हम देश के अलग-अलग राज्यों में आपूर्ति कर रहे हैं। विदेश में करीब दो लाख बर्तनों की आपूर्ति हमारे प्लांट से की जा रही है।
अयोध्या शहर में भी हमारे बर्तनों की मांग बढ़ी है। हर माह करीब डेढ़ से दो लाख बर्तनों की खपत हो रही है। मोहम्मद आवाज ने बताया कि गन्ने की खाई की लुगदी की सीट लाकर उन्हें पानी में घोलकर घोल बना लिया जाता है।
इसके बाद मोल्डिंग मशीनों में डालते हैं। जिस साइज की प्लेट या अन्य सामान चाहिए उसी साइज के खांचे मशीन में फिट कर दिए जाते हैं। इस तरह प्लांट में ये बर्तन तैयार हो जाते हैं।
मोहम्मद आवाज का कहना है कि गन्ने की खोई से बने बर्तनों को यदि आप जमीन पर फेंक देंगे तो 90 से 180 दिन के बीच में यह खाद में बदल जाएगा। खाद बनने से यह किसानों के काम आ जाएगा।
यह बर्तन धरती का नुकसान भी नहीं कर रहे हैं। प्लास्टिक की बर्तन को खुले में फेंकने पर ये कई सालों तक नष्ट नहीं होते और जलाने पर प्रदूषण अलग से फैलाते हैं। जबकि गन्ने की खोई की लुगदी से बने बर्तन से प्रदूषण नहीं होगा।
प्लास्टिक के बर्तन में 60 डिग्री से ज्यादा तापमान का कोई खाना खाया जाता है तो उससे कैंसर होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। इस प्रोडक्ट में ऐसी कोई संभावना नहीं है। ये आसानी से डिस्पोजबल होते हैं।
बर्तनों के दाम
थाली सात से आठ रुपये (प्रति पीस)
प्लेट ढाई से सात रुपये (प्रति पीस)
कटोरी डेढ़ से दो रुपये (प्रति पीस)
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पहले जहां गन्ने के खोई से बने बर्तनों की आपूर्ति देश में ही थी वहीं अब विदेशों में भी इसका निर्यात कंपनी कर रही है। सिंगल यूज प्लास्टिक पर एक जुलाई से प्रतिबंध लगने जा रहा है।
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ऐसे में पेपर मिल प्रबंधन को गन्ने की खोई से बन रहे बर्तन एक बेहतर विकल्प के रूप में सामने आने की उम्मीद है। यश पेपर मिल में हेड ऑफ ऑपरेशन के पद पर कार्यरत मोहम्मद आवाज ने बताया कि शुरूआत में गन्ने की खोई से बने बर्तनों की मांग कम रही।
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धीरे-धीरे इसकी मांग बढ़ती चली गई। उन्होंने बताया कि हमने जो प्लांट लगाया है। उसमें हर रोज 10 लाख बर्तन बन सकते हैं। लेकिन अभी हम प्रतिदिन छह से आठ लाख पीस बना रहे हैं।
उन्होंने बताया कि गन्ने की खोई से बने हमारे बर्तनों में थाली, प्लेट, कटोरी आदि की पूरे भारत में खपत हो रही है। बंगलुरु, दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, पुणे सहित उत्तरप्रदेश में इसकी आपूर्ति की जा रही है।
हमारे प्रोडक्ट की मांग अब विदेशों में भी बढ़ी है। हर माह करीब दो लाख बर्तन हम विदेश भेज रहे हैं। कहा कि हाल ही में हमारी कंपनी को एक बड़ी सफलता मिली है। अमेरिका, दुबई और आस्ट्रेलिया से हमारे अनुबंध हुआ है।
इन तीनों देशों में भी हमारे बर्तन भेजे जा रहे हैं। गन्ने की खोई से बने करीब 15 लाख बर्तनों की हम देश के अलग-अलग राज्यों में आपूर्ति कर रहे हैं। विदेश में करीब दो लाख बर्तनों की आपूर्ति हमारे प्लांट से की जा रही है।
अयोध्या शहर में भी हमारे बर्तनों की मांग बढ़ी है। हर माह करीब डेढ़ से दो लाख बर्तनों की खपत हो रही है। मोहम्मद आवाज ने बताया कि गन्ने की खाई की लुगदी की सीट लाकर उन्हें पानी में घोलकर घोल बना लिया जाता है।
इसके बाद मोल्डिंग मशीनों में डालते हैं। जिस साइज की प्लेट या अन्य सामान चाहिए उसी साइज के खांचे मशीन में फिट कर दिए जाते हैं। इस तरह प्लांट में ये बर्तन तैयार हो जाते हैं।
मोहम्मद आवाज का कहना है कि गन्ने की खोई से बने बर्तनों को यदि आप जमीन पर फेंक देंगे तो 90 से 180 दिन के बीच में यह खाद में बदल जाएगा। खाद बनने से यह किसानों के काम आ जाएगा।
यह बर्तन धरती का नुकसान भी नहीं कर रहे हैं। प्लास्टिक की बर्तन को खुले में फेंकने पर ये कई सालों तक नष्ट नहीं होते और जलाने पर प्रदूषण अलग से फैलाते हैं। जबकि गन्ने की खोई की लुगदी से बने बर्तन से प्रदूषण नहीं होगा।
प्लास्टिक के बर्तन में 60 डिग्री से ज्यादा तापमान का कोई खाना खाया जाता है तो उससे कैंसर होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। इस प्रोडक्ट में ऐसी कोई संभावना नहीं है। ये आसानी से डिस्पोजबल होते हैं।
बर्तनों के दाम
थाली सात से आठ रुपये (प्रति पीस)
प्लेट ढाई से सात रुपये (प्रति पीस)
कटोरी डेढ़ से दो रुपये (प्रति पीस)