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प्राचीन टीले की खोदाई में मिली बौद्धकालीन देवी प्रतिमा
फैजाबाद/अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 22 Aug 2015 10:36 PM IST
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प्रथम दृष्ठया इसे मां दुर्गा की सैकड़ों साल पुरानी मूर्ति माना जा रहा है। प्राचीन मूर्ति मिलने की खबर पर पूरे क्षेत्र से बड़ी संख्या में लोग यहां एकत्र हो गए। इसके बौद्धकालीन होने की चर्चा है।
पूजन-अर्चन के बाद आनन-फानन इसकी प्राण प्रतिष्ठा भी ग्रामीणों ने करा दी है। देवकलीमाफी में प्राथमिक विद्यालय के समीप ईंट पत्थर व मिट्टी का पुराना टीला स्थित है।
ग्रामीणों के अनुसार प्राचीन टीले पर सिरसा बाबा का मंदिर था। इस समय यहां मंदिर नहीं हैं। लेकिन इस पर सैकड़ों वर्षों से आस पास के लोगों की आस्था बनी हुई है।
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हर वर्ष मकरसंक्रांति पर मेला भी लगता है तथा भंडारे का आयोजन होता है। गुरुवार को यहां एक मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन कराया गया था।
शुक्रवार को गांव के हनुमान प्रसाद यादव के नेतृत्व में मंदिर निर्माण के लिए टीले के किनारे नींव की खोदाई की जा रही थी। इसी दौरान मजदूरों को एक मूर्ति दिखाई दी।
इसे सुरक्षित बाहर निकाला गया और खोदाई बंद करवा दी गई। ग्रामीणों ने शुक्रवार देर शाम मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा कर आनन-फानन मूर्ति की स्थापना बाबा अमरनाथदास उर्फ अनादी बाबा द्वारा कर दी गई। लोगों ने पूजा-अर्चना शुरू कर दी।
समाचार लिखे तक कोई भी प्रशासनिक अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचा था। बुजुर्गों के मुताबिक मूर्ति काफी पुरानी है। यह मूर्ति लाल पत्थर पर बनी हुई है।
जिसमें नक्कासी की गयी है। जिसका रंग बदामी है। मूर्ति सुरक्षा के लिए ग्रामीणों से छप्पर रखने की व्यवस्था की जा रही है।
एसडीएम बीकापुर धर्मपाल का कहना है कि टीले की खोदाई में मूर्ति मिलने की जानकारी हुई है। इसको सुरक्षित रखने के लिए ग्राम पंचायत के मुखिया को जिम्मेदारी दे दी गई है। इसकी जांच आर्कियोलाजिकल विभाग वाले करेंगे।
हनुमान प्रसाद यादव शिक्षामित्र के पद पर तैनात थे। इन्होंने सिरसा बाबा से मनौती मांगी थी कि अध्यापक के पद पर नियुक्ति होने पर टीले पर मंदिर का निर्माण कराएंगे।
इनकी नियुक्ति सहायक अध्यापक पद पर होने से इनके द्वारा टीले पर मंदिर निर्माण के लिए नींव की खोदाई कराई जा रही है। उन्होंने बताया कि उनके एक रिश्तेदार पुरातत्व विभाग में कार्यरत है। उन्होंने टीले को देखकर बताया था कि टीला लगभग 1600 वर्ष पुराना है।
उमरपुर गांव के 80 वर्षीय प्रहलाद यादव, सोना देवी व रामजी दास आदि ने बताया कि टीले की ऊंचाई उनके बचपन में काफी थी। इस पर सिरसा बाबा का मंदिर था।
लोग दूर-दूर से आकर मनौतियां मांगते थे। टीले में अभी और भी मूर्तियों के होने की उम्मीद जताई जा रही है। ग्रामीणों ने भय के कारण अभी तक प्रशासन को सूचना नहीं दी है कि कहीं मूर्ति प्रशासन अपने कब्जे में न ले ले। इसीलिए प्राण प्रतिष्ठा कर मूर्ति की स्थापना कर दी गई।
अवध के टीलों के शोधार्थी रहे इतिहासविद् डॉ. हरिप्रसाद दुबे ने कहा कि इस इलाके में 10 वीं शताब्दी में राजभरों का शासन था। मैने तकरीबन 60 टीलों पर शोधकार्य किया। टीलों में पुरातात्विक खजाना दबा हुआ है। रूरूखास में मिली मूर्ति राजभरों की पूजा पद्धति से जुड़ी हुई हो सकती है।
डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के इतिहास एवं पुरातत्व विभाग के प्राध्यापक डॉ. राजेश कुमार सिंह ने कहा कि जिस गांव में मूर्ति मिली है।
उसी से कुछ किमी. की दूरी पर गुप्तकालीन करमदांडा गांव भी है। मूर्ति कितनी पुरानी है, अभी तो सटीक नहीं बताया जा सकता है। यह गुप्तकालीन भी हो सकती है। हां यह जरूर है कि इसके जरिए अवध के इतिहास पर भविष्य में नई रोशनी पड़ेगी।
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पूजन-अर्चन के बाद आनन-फानन इसकी प्राण प्रतिष्ठा भी ग्रामीणों ने करा दी है। देवकलीमाफी में प्राथमिक विद्यालय के समीप ईंट पत्थर व मिट्टी का पुराना टीला स्थित है।
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ग्रामीणों के अनुसार प्राचीन टीले पर सिरसा बाबा का मंदिर था। इस समय यहां मंदिर नहीं हैं। लेकिन इस पर सैकड़ों वर्षों से आस पास के लोगों की आस्था बनी हुई है।
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हर वर्ष मकरसंक्रांति पर मेला भी लगता है तथा भंडारे का आयोजन होता है। गुरुवार को यहां एक मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन कराया गया था।
शुक्रवार को गांव के हनुमान प्रसाद यादव के नेतृत्व में मंदिर निर्माण के लिए टीले के किनारे नींव की खोदाई की जा रही थी। इसी दौरान मजदूरों को एक मूर्ति दिखाई दी।
इसे सुरक्षित बाहर निकाला गया और खोदाई बंद करवा दी गई। ग्रामीणों ने शुक्रवार देर शाम मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा कर आनन-फानन मूर्ति की स्थापना बाबा अमरनाथदास उर्फ अनादी बाबा द्वारा कर दी गई। लोगों ने पूजा-अर्चना शुरू कर दी।
समाचार लिखे तक कोई भी प्रशासनिक अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचा था। बुजुर्गों के मुताबिक मूर्ति काफी पुरानी है। यह मूर्ति लाल पत्थर पर बनी हुई है।
जिसमें नक्कासी की गयी है। जिसका रंग बदामी है। मूर्ति सुरक्षा के लिए ग्रामीणों से छप्पर रखने की व्यवस्था की जा रही है।
एसडीएम बीकापुर धर्मपाल का कहना है कि टीले की खोदाई में मूर्ति मिलने की जानकारी हुई है। इसको सुरक्षित रखने के लिए ग्राम पंचायत के मुखिया को जिम्मेदारी दे दी गई है। इसकी जांच आर्कियोलाजिकल विभाग वाले करेंगे।
हनुमान प्रसाद यादव शिक्षामित्र के पद पर तैनात थे। इन्होंने सिरसा बाबा से मनौती मांगी थी कि अध्यापक के पद पर नियुक्ति होने पर टीले पर मंदिर का निर्माण कराएंगे।
इनकी नियुक्ति सहायक अध्यापक पद पर होने से इनके द्वारा टीले पर मंदिर निर्माण के लिए नींव की खोदाई कराई जा रही है। उन्होंने बताया कि उनके एक रिश्तेदार पुरातत्व विभाग में कार्यरत है। उन्होंने टीले को देखकर बताया था कि टीला लगभग 1600 वर्ष पुराना है।
उमरपुर गांव के 80 वर्षीय प्रहलाद यादव, सोना देवी व रामजी दास आदि ने बताया कि टीले की ऊंचाई उनके बचपन में काफी थी। इस पर सिरसा बाबा का मंदिर था।
लोग दूर-दूर से आकर मनौतियां मांगते थे। टीले में अभी और भी मूर्तियों के होने की उम्मीद जताई जा रही है। ग्रामीणों ने भय के कारण अभी तक प्रशासन को सूचना नहीं दी है कि कहीं मूर्ति प्रशासन अपने कब्जे में न ले ले। इसीलिए प्राण प्रतिष्ठा कर मूर्ति की स्थापना कर दी गई।
अवध के टीलों के शोधार्थी रहे इतिहासविद् डॉ. हरिप्रसाद दुबे ने कहा कि इस इलाके में 10 वीं शताब्दी में राजभरों का शासन था। मैने तकरीबन 60 टीलों पर शोधकार्य किया। टीलों में पुरातात्विक खजाना दबा हुआ है। रूरूखास में मिली मूर्ति राजभरों की पूजा पद्धति से जुड़ी हुई हो सकती है।
डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के इतिहास एवं पुरातत्व विभाग के प्राध्यापक डॉ. राजेश कुमार सिंह ने कहा कि जिस गांव में मूर्ति मिली है।
उसी से कुछ किमी. की दूरी पर गुप्तकालीन करमदांडा गांव भी है। मूर्ति कितनी पुरानी है, अभी तो सटीक नहीं बताया जा सकता है। यह गुप्तकालीन भी हो सकती है। हां यह जरूर है कि इसके जरिए अवध के इतिहास पर भविष्य में नई रोशनी पड़ेगी।