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छह हजार हेक्टेयर बढ़ा सरसों का रकबा

Thu, 20 Jan 2022 11:18 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Thu, 20 Jan 2022 11:18 PM IST
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Mustard area increased by six thousand hectares
बकेवर। पिछले सीजन में सरसों की कीमतों में आए उछाल के चलते इस साल किसानों का सरसों की फसल की तरफ रुख ज्यादा हो गया। इसका असर ये हुआ कि आलू और गेहूं के अच्छे खासे रकबे पर सरसों की फसल का कब्जा हो गया है।
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पिछले साल की अपेक्षा इस साल सरसों की फसल का रकबा लगभग छह हजार हेक्टेयर बढ़ गया। इस बढ़े हुए रकबे में लगभग एक हजार हेक्टेयर का रकबा आलू का कम हुआ है और लगभग पांच हजार हेक्टेयर रकबा गेहूं का कम हो गया है।
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इटावा जिले की मुख्य फसल गेहूं और आलू रहीं हैं। आलू की फसल किसानों के लिए नकदी का इंतजाम करती है, तो गेहूं की फसल उनके जीवन का आधार है।
गेहूं की फसल से पूरे साल परिवार के लिए अनाज का इंतजाम हो जाता है और इसका भूसा मवेशियों को खिलाने के काम आता है, लेकिन पिछले साल सरसों के भाव में उछाल आने से किसान का नजरिया बदल गया।
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इस बार जिले के किसान ने गेहूं और आलू के रकबे में कटौती करके सरसों को अधिक तवज्जो दी, जबकि पिछले वर्षों में सरसों का रकबा काफी कम होता रहा है। गेहूं का रकबा इस साल जिले में लगभग 93 हजार हेक्टेयर है। पिछले साल यही रकबा लगभग 98 हजार हेक्टेयर था।
पिछले साल सरसों का रकबा 17 हेक्टेयर के करीब था, इस साल यही रकबा 22 से 23 हजार हेक्टेयर के आसपास है। सरसों की बुवाई का रकबा इस साल आलू के रकबे को भी पार कर गया है।
आलू का रकबा पिछली साल का 20,500 हेक्टेयर था। इस साल 20 हजार हेक्टेयर है। डीएचओ डॉ. सुनील कुमार के अनुसार, ये अनुमानित रकबा है, इस साल आलू का रकबा 5 सौ से एक हजार के हेक्टेयर के बीच कम है।
ग्राम नौधना निवासी किसान राहुल चतुर्वेदी कहते है कि गेहूं की फसल परंपरागत खेती की है। जिसमें लागत भी काफी आती है। वे पहले गेहूं की फसल ही 35 से 40 बीघा करते थे, इस बार गेहूं के स्थान पर 20 बीघा सरसों बोई है।
किसान अनुरुद्ध चतुर्वेदी कहते हैं कि सरसों की फसल को नकदी कि फसल कहा जाता है। उसका किसान भंडारण कर कभी भी पैसों की आवश्यकता पड़ने पर बेच सकता है।
उन्होंने दो एकड़ में सरसों की बुवाई की है, जिसमें पहले गेहूं पैदा करते थे। जिला कृषि अधिकारी अभिनंदन सिंह ने बताया कि पिछले साल की अपेक्षा गेहूं का रकबा घटा है, जबकि उसी के सापेक्ष सरसों का रकवा में करीब छह हजार हेक्टेयर की वृद्धि हुई है।
गेहूं-आलू की अपेक्षा सरसों में लागत कम
सरसों की फसल की ओर किसान के बढ़ते रुझान की और भी वजहें हैं। एक तो सरसों की फसल में लागत कम आती है। गेहूं और आलू की अपेक्षा सरसों की फसल के लिए खेत की कम जुताई करनी पड़ती है।
उर्वरक और बीज की लागत भी आलू और गेहूं की अपेक्षा कम रहती है। इसके अलावा सिंचाई भी सरसों की फसल की एक अथवा दो बार करनी होती है, जबकि गेहूं और आलू की फसल की सिंचाई चार से पांच बार करनी पड़ती है।
गेहूं और आलू की फसल को आवारा मवेशी भी नुकसान पहुंचाते हैं, जबकि सरसों की फसल को आवारा मवेशी खाते नहीं हैं।
भंडारण में भी नहीं होती परेशानी
सरसों की उपज के भंडारण में भी किसान को कम परेशानी होती है। आलू के भंडारण के लिए किसान को कोल्डस्टोरेज की जरूरत होती है। किसान यदि भंडारण करना चाहे तो उसे कोल्ड स्टोरेज का किराया देना पड़ेगा।

इसके अलावा गेहूं की उपज में भी घुन और कीड़े लगने की आशंका अधिक रहती है। गेहूं को खराब होने से रोकने के लिए किसान को काफी मशक्कत करनी पड़ती है।
सरसों के भंडारण में कोई परेशानी नहीं है। इसे सिर्फ नमी से बचाना होता है और बिना किसी कीटनाशक के इसका एक से अधिक वर्ष के लिए घर पर ही भंडारण कर सकते हैं।
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