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जलाते नहीं, पुतले को करते नष्ट
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इटावा। जसवंतनगर में दशहरा के दिन रावण के पुतले का दहन नहीं होता, बल्कि तीरों से वार करके नष्ट कर दिया जाता है। इसके बाद दशानन के पुतले की लकड़ियों को हासिल करने के लिए लोगों में होड़ मचती है।
लोग अपने घरों में इन लकड़ियों को रखते हैं। मान्यता है कि जिस घर में दशानन की लकड़ियां होती हैं, वहां पर प्रेत आत्माओं का वास नहीं होता है। जसवंतनगर में मैदानी रामलीला चल रही है। दशमी यानी दशहरा दिन यहां दशानन रावण का पुतला दहन नहीं होता है।
भगवान श्रीराम और उनकी सेना की तरफ से चलाए गए तीरों से पुतला क्षतिग्रस्त होकर जमीन पर धराशायी हो जाता है। इसके बाद लोग पुतले को लकड़ियों को पाने की लोगों में होड़ मच जाती है। धक्कामुक्की कर लोग पुतले की लड़की पा कर खुश हो जाते हैं और उसे अपने घर ले जाते हैं।
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मान्यता है कि पुतले की लकड़ी रखने से घर में प्रेत या बुरी आत्मा का वास नहीं होता है। घर में सुख-शांति बनी रहती है। जीवन अच्छा व हंसी-खुशी से बीतता है। साथ ही मांगी गई कुछ मनोकामनाएं भी पूर्ण होती है। जिस तरह से दक्षिण के देशों व प्रांतों में रामलीला होती है, उसी तर्ज पर यहां रामलीला का मंचन होता है।
यहां मंच नहीं बनता है, पूरी लीला खुले मैदान में होती है। श्रीराम व रावण का युद्ध भी खुले मैदान में होता है। उधर, तीरों को मजदूर नहीं, बल्कि जसवंतनगर के बाशिंदे खुद बनाते हैं। दशानन का पुतला भी इलाकाई लोग तैयार करते हैं।
अबकी रामलीला के लिए दस हजार तीर बनाएं गए हैं, जिससे रावण के पुतले को दशहरा के दिन क्षतिग्रस्त किया जाएगा। सालों से यहां की यहीं परंपरा है। (संवाद)
कुछ अलग है जसवंतनगर की रामलीला
रामलीला समिति के प्रबंधक राजीव गुप्ता बबलू व व्यवस्थापक अजय गौड़ ने बताया कि कुछ साल पहले दक्षिणी अमेरिकी महाद्वीप के कैरेबियन देश त्रिनिदाद और टोबैगो से रामलीला पर रिसर्च कर रही डा. इंद्राणी रामप्रसाद जसवंतनगर की रामलीला का प्रदर्शन देखने आई थी।
रामलीला में हो रहे प्रदर्शन से काफी आकर्षित हुई। साथ ही आश्चर्यचकित भी हुई कि रामलीला का प्रदर्शन ऐसे भी हो सकता है। दुनिया की 432 रामलीलाओं का अध्ययन करने के बाद उन्होंने जब शोध लिखा तो जसवंतनगर की मैदानी रामलीला को दुनिया की सबसे बेहतरीन रामलीला बताते हुए कई लीलाओं का वर्णन किया।
त्रिनिदाद विवि से उन्हें रामलीला के प्रदर्शन विषय पर डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की गई। उन्होंने इसके बाद दुनिया के कई देशों में हिंदू समुदाय के लोगों तक इस लीला की खूबियों को व आकर्षण को पहुंचाने का काम किया। इसके बाद ही स्थानीय लोग समझ सके की जसवंतनगर की रामलीला दुनिया में बेजोड़ है।
25 फीट का पुतला बनाने में जुटे लोग
जसवंतनगर की रामलीला में दशानन का 25 फीट ऊंचा पुतला तैयार किया जा रहा है। इसे तैयार करने में इलाकाई लोग और पप्पू पेंटर लगे हैं। दशहरा यानी 15 अक्तूबर को दोपहर तक पुतला तैयार हो जाएगा। इसे खड़ा भी कर दिया जाएगा।
दिल्ली, राजस्थान व मध्य प्रदेश से आते हैं लोग
जसवंतनगर में लगने वाले मेले में इटावा के साथ ही आसपास के जिलों, मध्यप्रदेश, दिल्ली व राजस्थान के भी लोग शामिल होते हैं। मेला देखने को लेकर बच्चों, महिलाओं व बुजुर्गों में काफी उत्साह रहता है।
भीड़ अधिक होने की वजह से मैदान के पास ही रेलवे ट्रैक से गुजरने वाली ट्रेनें धीमी होकर गुजरती हैं। कभी-कभी तो ज्यादा भीड़ होने से ट्रैक पर ट्रेनें पांच से दस मिनट तक रुक भी जाती हैं।
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लोग अपने घरों में इन लकड़ियों को रखते हैं। मान्यता है कि जिस घर में दशानन की लकड़ियां होती हैं, वहां पर प्रेत आत्माओं का वास नहीं होता है। जसवंतनगर में मैदानी रामलीला चल रही है। दशमी यानी दशहरा दिन यहां दशानन रावण का पुतला दहन नहीं होता है।
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भगवान श्रीराम और उनकी सेना की तरफ से चलाए गए तीरों से पुतला क्षतिग्रस्त होकर जमीन पर धराशायी हो जाता है। इसके बाद लोग पुतले को लकड़ियों को पाने की लोगों में होड़ मच जाती है। धक्कामुक्की कर लोग पुतले की लड़की पा कर खुश हो जाते हैं और उसे अपने घर ले जाते हैं।
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मान्यता है कि पुतले की लकड़ी रखने से घर में प्रेत या बुरी आत्मा का वास नहीं होता है। घर में सुख-शांति बनी रहती है। जीवन अच्छा व हंसी-खुशी से बीतता है। साथ ही मांगी गई कुछ मनोकामनाएं भी पूर्ण होती है। जिस तरह से दक्षिण के देशों व प्रांतों में रामलीला होती है, उसी तर्ज पर यहां रामलीला का मंचन होता है।
यहां मंच नहीं बनता है, पूरी लीला खुले मैदान में होती है। श्रीराम व रावण का युद्ध भी खुले मैदान में होता है। उधर, तीरों को मजदूर नहीं, बल्कि जसवंतनगर के बाशिंदे खुद बनाते हैं। दशानन का पुतला भी इलाकाई लोग तैयार करते हैं।
अबकी रामलीला के लिए दस हजार तीर बनाएं गए हैं, जिससे रावण के पुतले को दशहरा के दिन क्षतिग्रस्त किया जाएगा। सालों से यहां की यहीं परंपरा है। (संवाद)
कुछ अलग है जसवंतनगर की रामलीला
रामलीला समिति के प्रबंधक राजीव गुप्ता बबलू व व्यवस्थापक अजय गौड़ ने बताया कि कुछ साल पहले दक्षिणी अमेरिकी महाद्वीप के कैरेबियन देश त्रिनिदाद और टोबैगो से रामलीला पर रिसर्च कर रही डा. इंद्राणी रामप्रसाद जसवंतनगर की रामलीला का प्रदर्शन देखने आई थी।
रामलीला में हो रहे प्रदर्शन से काफी आकर्षित हुई। साथ ही आश्चर्यचकित भी हुई कि रामलीला का प्रदर्शन ऐसे भी हो सकता है। दुनिया की 432 रामलीलाओं का अध्ययन करने के बाद उन्होंने जब शोध लिखा तो जसवंतनगर की मैदानी रामलीला को दुनिया की सबसे बेहतरीन रामलीला बताते हुए कई लीलाओं का वर्णन किया।
त्रिनिदाद विवि से उन्हें रामलीला के प्रदर्शन विषय पर डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की गई। उन्होंने इसके बाद दुनिया के कई देशों में हिंदू समुदाय के लोगों तक इस लीला की खूबियों को व आकर्षण को पहुंचाने का काम किया। इसके बाद ही स्थानीय लोग समझ सके की जसवंतनगर की रामलीला दुनिया में बेजोड़ है।
25 फीट का पुतला बनाने में जुटे लोग
जसवंतनगर की रामलीला में दशानन का 25 फीट ऊंचा पुतला तैयार किया जा रहा है। इसे तैयार करने में इलाकाई लोग और पप्पू पेंटर लगे हैं। दशहरा यानी 15 अक्तूबर को दोपहर तक पुतला तैयार हो जाएगा। इसे खड़ा भी कर दिया जाएगा।
दिल्ली, राजस्थान व मध्य प्रदेश से आते हैं लोग
जसवंतनगर में लगने वाले मेले में इटावा के साथ ही आसपास के जिलों, मध्यप्रदेश, दिल्ली व राजस्थान के भी लोग शामिल होते हैं। मेला देखने को लेकर बच्चों, महिलाओं व बुजुर्गों में काफी उत्साह रहता है।
भीड़ अधिक होने की वजह से मैदान के पास ही रेलवे ट्रैक से गुजरने वाली ट्रेनें धीमी होकर गुजरती हैं। कभी-कभी तो ज्यादा भीड़ होने से ट्रैक पर ट्रेनें पांच से दस मिनट तक रुक भी जाती हैं।