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जिला वीआईपी, पर उद्योगों का अकाल
ब्यूरो/अमर उजाला, इटावा
Updated Sat, 20 Dec 2014 11:11 PM IST
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भी उद्योगों का अकाल है। उद्योग के नाम पर यहां सिर्फ एक सूत मिल थी, जो
लापरवाह प्रबंधन के कारण बंद हो गई।
इससे करीब एक हजार परिवारों की रोजी-रोटी छिन गई। उद्योग न होने से यहां के युवा पढ़ लिखकर पलायन को मजबूर हैं। विडंबना यह कि जिस वीआईपी जिले से गैर जनपदों के बेरोजगारों को उम्मीद होनी चाहिए, वहां के बाशिंदे रोजगार की तलाश में महानगरों का रुख कर रहे हैं।
कारोबार की दृष्टि से जिला लगातार पिछड़ता आ रहा है। लोग बेशक जिले को राजनैतिक उर्वरा से समृद्ध मानकर चलें लेकिन सत्ता के केंद्र में होने के जो लाभ होते हैं, यहां के लोग उससे वंचित हैं। प्रदेश को चार बार मुख्यमंत्री देने वाले इस जिले में बहुतेरे विकास कार्य हुए।
पुलों और सड़कों से लेकर लॉयन सफारी तक कई बड़ी परियोजनाएं यहां लागू हुई लेकिन रोजगार की दिशा में कोई सार्थक कदम नहीं उठाए गए। यहां आज भी उद्योगों नितांत अभाव है।
जो पढ़े-लिखे नौजवानों को रोजगार के अवसर मुहैया करा सकें। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बात तो दूर जिले में राष्ट्रीय स्तर के भी कल कारखाने नहीं हैं। रोजगार देने वाली फैक्ट्रियां और सार्वजनिक उपक्रम तक स्थापित नहीं हुए।
आलम यह है कि पढ़ाई लिखाई पूरी करने के बाद जिले का नौजवान या तो सरकारी नौकरी पाने के लिए इधर उधर खाक छानता फिरता है या फिर काम की तलाश में दिल्ली और लुधियाना जैसे व्यवसायिक शहरों का रुख करता है।
जिले में उद्योगों की स्थापना को लेकर सरकारी प्रयास नगण्य ही रहे हैं।
समय के साथ रोजगार दफ्तर के भी मायने खत्म होते गए। अब इस दफ्तर में बेरोजगारों के रजिस्ट्रेशन मात्र होते हैं। यहां से सरकारी नौकरी मिलने का काम तो वर्षों पहले समाप्त हो चुका है।
अब न तो सरकारी विभाग जिला सेवायोजन कार्यालय को रिक्त पदों से अवगत कराते हैं और न ही इस विभाग के माध्यम से स्थायी या अस्थाई भर्तियां कराते हैं। यहीं वजह है कि सेवायोजन कार्यालय से नौकरी के लिए कॉल मिलना बीते कल की बात हो गई है।
जिला सेवायोजन कार्यालय की अहमियत इसी से आंकी जा सकती है। पांच वर्षों में महज नौ बेरोजगारों को अस्थाई नौकरी हासिल हो पाई। वर्ष 2012 से अबतक इस विभाग से सार्वजनिक क्षेत्र में कोई नौकरी उपलब्ध नहीं करवाई गई।
हालांकि मौजूदा जिला सेवायोजन अधिकारी देवेंद्र प्रताप सिंह के कार्यकाल में जरुर वर्ष 2013 व 14 में रोजगार मेले के आयोजन हुए। जिसके तहत प्राइवेट क्षेत्र में क्रमश: 168 व 675 लोगों को रोजगार मुहैया हो सके।
अखिलेश सरकार ने शुरुआती वर्ष में बेरोजगारी भत्ता दिया था। लिहाजा बड़ी संख्या में बेरोजगारों ने रजिस्ट्रेशन करवाए थे। इस वक्त रोजगार दफ्तर में हाईस्कूल उत्तीर्ण के 50731, इंटरमीडिएट के 41503, स्नातक के 24281 और परास्नातक के 8190 आवेदकों के रजिस्ट्रेशन हैं।
नियोक्ता अब रिक्त पदों की सूचना जिला सेवायोजन कार्यालय को नहीं देते हैं, जबकि सीएनवी एक्ट के तहत ऐसा करना अनिवार्य है। केंद्र और प्रदेश की सरकार इस दिशा में काफी प्रयत्नशील हैं। लिहाजा आने वाले समय में बदलाव की संभावना जरूर है। -देवेंद्र प्रताप सिंह, जिला सेवायोजन अधिकारी, इटावा।
इससे करीब एक हजार परिवारों की रोजी-रोटी छिन गई। उद्योग न होने से यहां के युवा पढ़ लिखकर पलायन को मजबूर हैं। विडंबना यह कि जिस वीआईपी जिले से गैर जनपदों के बेरोजगारों को उम्मीद होनी चाहिए, वहां के बाशिंदे रोजगार की तलाश में महानगरों का रुख कर रहे हैं।
कारोबार की दृष्टि से जिला लगातार पिछड़ता आ रहा है। लोग बेशक जिले को राजनैतिक उर्वरा से समृद्ध मानकर चलें लेकिन सत्ता के केंद्र में होने के जो लाभ होते हैं, यहां के लोग उससे वंचित हैं। प्रदेश को चार बार मुख्यमंत्री देने वाले इस जिले में बहुतेरे विकास कार्य हुए।
पुलों और सड़कों से लेकर लॉयन सफारी तक कई बड़ी परियोजनाएं यहां लागू हुई लेकिन रोजगार की दिशा में कोई सार्थक कदम नहीं उठाए गए। यहां आज भी उद्योगों नितांत अभाव है।
जो पढ़े-लिखे नौजवानों को रोजगार के अवसर मुहैया करा सकें। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बात तो दूर जिले में राष्ट्रीय स्तर के भी कल कारखाने नहीं हैं। रोजगार देने वाली फैक्ट्रियां और सार्वजनिक उपक्रम तक स्थापित नहीं हुए।
आलम यह है कि पढ़ाई लिखाई पूरी करने के बाद जिले का नौजवान या तो सरकारी नौकरी पाने के लिए इधर उधर खाक छानता फिरता है या फिर काम की तलाश में दिल्ली और लुधियाना जैसे व्यवसायिक शहरों का रुख करता है।
जिले में उद्योगों की स्थापना को लेकर सरकारी प्रयास नगण्य ही रहे हैं।
समय के साथ रोजगार दफ्तर के भी मायने खत्म होते गए। अब इस दफ्तर में बेरोजगारों के रजिस्ट्रेशन मात्र होते हैं। यहां से सरकारी नौकरी मिलने का काम तो वर्षों पहले समाप्त हो चुका है।
अब न तो सरकारी विभाग जिला सेवायोजन कार्यालय को रिक्त पदों से अवगत कराते हैं और न ही इस विभाग के माध्यम से स्थायी या अस्थाई भर्तियां कराते हैं। यहीं वजह है कि सेवायोजन कार्यालय से नौकरी के लिए कॉल मिलना बीते कल की बात हो गई है।
जिला सेवायोजन कार्यालय की अहमियत इसी से आंकी जा सकती है। पांच वर्षों में महज नौ बेरोजगारों को अस्थाई नौकरी हासिल हो पाई। वर्ष 2012 से अबतक इस विभाग से सार्वजनिक क्षेत्र में कोई नौकरी उपलब्ध नहीं करवाई गई।
हालांकि मौजूदा जिला सेवायोजन अधिकारी देवेंद्र प्रताप सिंह के कार्यकाल में जरुर वर्ष 2013 व 14 में रोजगार मेले के आयोजन हुए। जिसके तहत प्राइवेट क्षेत्र में क्रमश: 168 व 675 लोगों को रोजगार मुहैया हो सके।
अखिलेश सरकार ने शुरुआती वर्ष में बेरोजगारी भत्ता दिया था। लिहाजा बड़ी संख्या में बेरोजगारों ने रजिस्ट्रेशन करवाए थे। इस वक्त रोजगार दफ्तर में हाईस्कूल उत्तीर्ण के 50731, इंटरमीडिएट के 41503, स्नातक के 24281 और परास्नातक के 8190 आवेदकों के रजिस्ट्रेशन हैं।
नियोक्ता अब रिक्त पदों की सूचना जिला सेवायोजन कार्यालय को नहीं देते हैं, जबकि सीएनवी एक्ट के तहत ऐसा करना अनिवार्य है। केंद्र और प्रदेश की सरकार इस दिशा में काफी प्रयत्नशील हैं। लिहाजा आने वाले समय में बदलाव की संभावना जरूर है। -देवेंद्र प्रताप सिंह, जिला सेवायोजन अधिकारी, इटावा।