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नागा साधुओं ने किया शाही स्नान
ब्यूरो अमर उजाला, एटा
Updated Wed, 23 Dec 2015 11:17 PM IST
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तीर्थनगरी में भारत के विभिन्न अखाड़ों से आए नागा साधु संतों ने बुधवार को शोभायात्रा निकालकर हरिपदी गंगा में शाही स्नान किया। हाथों में वाद्य यंत्र लिए नागा साधुओं का तीर्थ भ्रमण सुबह 10 बजे हरिपदी किनारे स्थित नागालैंड आश्रम से शुरू हुआ। विभिन्न अखाड़ों के प्रमुख नागा साधु संत और मठाधीश सुसज्जित सिंहासनों में विराजमान थे। उनके साथ चल रहे उनके शिष्य दुुंदुभि, तुरही बजाते हुए त्रिशूल, फरसा, तलवार से प्रदर्शन कर रहे थे। शरीर पर भभूत लपेटे और गले में माला डाले सन्यासियों को लोग श्रद्धा से प्रणाम कर रहे थे।
शोभायात्रा तीर्थनगरी में चक्रतीर्थ, बारू बाजार, चौदहपोर, बड़ा बाजार, लहरा रोड, रामसिंहपुरा, कटराबजार, चंदन चौक भ्रमण करती हुई, हरिपदी पहुंची। जहां नागा साधुओं ने सामूहिक शाही स्नान किया। शोभायात्रा के दौरान जगह जगह श्रद्धालुओं ने दूध, फल मिष्ठान का वितरण किया। शोभायात्रा श्रीशंभू पंच दशनाम आवाह्न सरकार गणपति के अखाड़े के नेतृत्व में निकाली गई। जिसमें गनेश गिरी महाराज, जूना अखाड़ा, निरंजनी, अटल आनंद अग्नि, श्री पंचायती बड़ा उदासीन अखाड़ा, वैष्णव चर्तुसंप्रदाय, खडग दर्शन संप्रदाय और नागालैंड अखाड़े के साधु शामिल रहे। कई मठों के शंकराचार्य, अखाड़ों के नागा साधु यहां प्रतिवर्ष स्नान करते आए हैं।
18 वर्ष पूर्व सोरों के ब्रहमलीन नागा साधु महंत सेवागिरी ने पूरे भारतवर्ष के नागा साधुओं के अखाडे़ पर जाकर उन्हें एक मंच पर लाकर शाही स्नान की परंपरा डाली। तभी से हर वर्ष मार्गशीर्ष पर नागा साधु एकत्रित होते हैं।
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शोभायात्रा तीर्थनगरी में चक्रतीर्थ, बारू बाजार, चौदहपोर, बड़ा बाजार, लहरा रोड, रामसिंहपुरा, कटराबजार, चंदन चौक भ्रमण करती हुई, हरिपदी पहुंची। जहां नागा साधुओं ने सामूहिक शाही स्नान किया। शोभायात्रा के दौरान जगह जगह श्रद्धालुओं ने दूध, फल मिष्ठान का वितरण किया। शोभायात्रा श्रीशंभू पंच दशनाम आवाह्न सरकार गणपति के अखाड़े के नेतृत्व में निकाली गई। जिसमें गनेश गिरी महाराज, जूना अखाड़ा, निरंजनी, अटल आनंद अग्नि, श्री पंचायती बड़ा उदासीन अखाड़ा, वैष्णव चर्तुसंप्रदाय, खडग दर्शन संप्रदाय और नागालैंड अखाड़े के साधु शामिल रहे। कई मठों के शंकराचार्य, अखाड़ों के नागा साधु यहां प्रतिवर्ष स्नान करते आए हैं।
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18 वर्ष पूर्व सोरों के ब्रहमलीन नागा साधु महंत सेवागिरी ने पूरे भारतवर्ष के नागा साधुओं के अखाडे़ पर जाकर उन्हें एक मंच पर लाकर शाही स्नान की परंपरा डाली। तभी से हर वर्ष मार्गशीर्ष पर नागा साधु एकत्रित होते हैं।
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