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दो वक्त की रोटी कमाने में ढल रहा बेशकीमती बचपन
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एटा। खेल-खिलौने और पढ़ाई-लिखाई इनके लिए बस सपना है। दो वक्त की रोटी कमाने में इनका बेशकीमती बचपन ढल रहा है। बस स्टैंड, ढाबा, किराना की दुकानों आदि पर तमाम बाल मजदूर नजर आ जाते हैं। जिम्मेदार विभाग द्वारा उनके मुक्त कराने के नाम पर खानापूर्ति ही गई। चंद दिनों बाद फिर ये बच्चे मजदूरी के दलदल में पहुंच गए। शहर में कई परिवार गरीब तबके के रहते हैं, जो दैनिक मजदूरी के माध्यम से गुजर करते हैं। खर्च पूरे न होने पर उनके छोटे बच्चे भी कहीं न कहीं मजदूरी में लगे हैं। जब इनसे पूछा गया तो उन्होंने गरीबी का हवाला देते हुए मजदूरी की मजबूरी बयां की।
गांव भगीपुर निवासी 12 साल का बच्चा दो साल से बस स्टैंड पर पानी की बोतल और पाउच बेचता है। उसका कहना है कि घर का खर्च चलाने के लिए बस स्टैंड पर पानी बेचता हूं। पिताजी मजदूरी करते हैं। कभी-कभी उनको काम नहीं मिलता है तो भूखे पेट रहना पड़ता था। ऐसे में मैने भी काम शुरू कर दिया।
शांति नगर निवासी 11 वर्षीय बालक ने बताया कि मां घर-घर जाकर बर्तन धोने का काम करती थी। कोरोना काल में लोगों ने उनसे काम छुड़वा दिया। पिता रिक्शा चलाते हैं। कोरोना कर्फ्यू में राहगीर कम हुए तो कमाई भी बंद सी हो गई। ऐसे में मदद के लिए मैंने बस स्टैंड पर चाट-समौसे बेचने का काम शुरू कर दिया।
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गांव भगीपुर निवासी 12 साल का बच्चा दो साल से बस स्टैंड पर पानी की बोतल और पाउच बेचता है। उसका कहना है कि घर का खर्च चलाने के लिए बस स्टैंड पर पानी बेचता हूं। पिताजी मजदूरी करते हैं। कभी-कभी उनको काम नहीं मिलता है तो भूखे पेट रहना पड़ता था। ऐसे में मैने भी काम शुरू कर दिया।
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शांति नगर निवासी 11 वर्षीय बालक ने बताया कि मां घर-घर जाकर बर्तन धोने का काम करती थी। कोरोना काल में लोगों ने उनसे काम छुड़वा दिया। पिता रिक्शा चलाते हैं। कोरोना कर्फ्यू में राहगीर कम हुए तो कमाई भी बंद सी हो गई। ऐसे में मदद के लिए मैंने बस स्टैंड पर चाट-समौसे बेचने का काम शुरू कर दिया।
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