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दरगाह प्रकरण: चढ़ावे के सामान-नकदी के स्वामित्व के भी होते रहे सौदे

Fri, 22 Apr 2022 11:12 PM IST
Agra Bureau आगरा ब्यूरो
Updated Fri, 22 Apr 2022 11:12 PM IST
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Offering goods - deals with the ownership of cash
एटा। जलेसर की बड़े मियां की दरगाह प्रकरण में चल रही जांच में कई चौंकाने वाली बातें सामने आ रही हैं। दरगाह पर चढ़ावे में आने वाले सामान और नकदी के स्वामित्व के भी सौदे होते रहे हैं। इस तरह के तीन बैनामों के अभिलेख प्रशासन को मिले हैं। प्रशासन इस तरह के बैनामों को नियम विरुद्ध बता रहा है।
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बड़े मियां, शनिदेव मंदिर पर शनि जात के लिए बड़ी संख्या में स्थानीय ही नहीं, दूसरे जिलों और प्रांतों तक के श्रद्धालु पहुंचते हैं। पूजा-पाठ के दौरान काफी सामान, नकद भेंट किया जाता है। इसे लेकर इस दरगाह पर कई लोगों ने अपनी-अपनी हिस्सेदारी बना ली। धीरे-धीरे इस पर एक परिवार के लोगों ने पूरी तरह आधिपत्य जमा लिया। चल रही जांच के दौरान हाल में प्रशासनिक अधिकारियों को जो अभिलेख मिले हैं, वो हैरत में डालने वाले हैं। 1973 में एक बैनामा शराफत हुसैन निवासी गुलनगर ने पंजीकृत कराया। बताया कि वह बड़े मियां की दरगाह पर आने वाले चढ़ावे, नकदी के एक हिस्से का स्वामी है।
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इस हिस्से को रामदास निवासी मोहल्ला अकबरपुर हवेली को 750 रुपये में विक्रय कर रहे हैं। अप्रैल 1976 में इसी तरह का एक बैनामा शमसुल हक निवासी गली बोहरान ने रामदास के हक में किया। जिसमें अपना हिस्सा 500 रुपये में बेचने की बात लिखी गई। जबकि इसी साल एक और बैनामा रामदास ने किया। जसमें उन्होंने एक हजार रुपये में अपना एक हिस्सा रईस मुहम्मद निवासी गली बोहरान और मु. अजहर निवासी मोहल्ला सादात को एक हजार रुपये में बेचे जाने की बात लिखी। इन्हीं बेनामों के माध्यम से दरगाह पर बिना किसी हिसाब-किताब चढ़ावे के रुपयों का गोलमाल लंबे समय तक चलता रहा।
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गबन के आरोपी को कैसे बनाया मुतवल्ली? अफसरों ने वक्फ बोर्ड को भेजी आपत्ति
उप्र सुन्नी वक्फ बोर्ड ने दरगाह को वक्फ कब्रिस्तान के तौर पर वक्फ संपत्ति में दर्ज किया है। इसका मुतवल्ली मु. अकबर को बनाया गया है। स्थानीय प्रशासन ने इस पर आपत्ति जताई है। वक्फ बोर्ड को पत्र भेजकर पूछा गया है कि गबन के मामले में आरोपी को कैसे मुतवल्ली बना दिया गया? इसमें आरोपियों की संपत्तियों की भी जानकारी दी गई है।
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