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जरी-जरदोजी के हुनर पर उपेक्षा का ग्रहण
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अलीगंज के अंसारी मोहल्ला में जरी का काम करते परिवार के सदस्य। संवाद
- फोटो : ETAH
अलीगंज। कस्बे में जरी-जरदोजी का काम दशकों पुराना है, जो लघु उद्योग के रूप में चलता था। जहां कई घरों में महिलाएं, युवतियां रेशमी धागों के हुनर से कपड़ों को आकर्षक रूप देती थीं, लेकिन समय बदलने के साथ इस कला की कद्र कम होती गई और इस हुनर पर उपेक्षा का ग्रहण लगता जा रहा है। सरकारी मदद के अभाव और मांग कम होने से असर पड़ रहा है।
वर्तमान में मोहल्ला काजी और अंसारी मोहल्ला के करीब 125 परिवारों में यह काम किया जा रहा है। हर परिवार से तीन-चार लोग कपड़ों पर उंगलियों के हुनर से कढ़ाई करते हैं। इन्हें एटा के अलावा मैनपुरी, फर्रुखाबाद, कासगंज आदि के व्यापारी कपड़े देते हैं। जिस पर यहां के कारीगर कढ़ाई के जरिए लहंगा-चुनरी, साड़ी आदि को आकर्षक रूप प्रदान करते हैं।
कारीगरों के मुताबिक अब से एक दशक पहले करीब 200 परिवारों में यह काम चलता था। धीरे-धीरे मांग कम होती गई। अब तो साल के चार-पांच महीनों में ही काम मिलता है। अन्य दिनों में दूसरा रोजगार देखना होता था। कारीगरों का कहना है कि यदि सरकार हमें प्रशिक्षित कर हुनर को और बढ़ाती तथा अपने उत्पादों को सीधे बाजारों में पहुंचाने के लिए व्यवस्था करती तो इस उद्यम को जान मिल जाती।
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13 साल पहले राहुल गांधी ने ली थी सुध
यूं तो अलीगंज में तमाम नेता आए और उनकी सभाएं हुईं, लेकिन कभी इस लघु उद्यम पर बात ही नहीं हुई। 13 साल पहले 2009 में कांग्रेस नेता राहुल गांधी यहां आए थे। उन्होंने खासतौर पर बुनकरों के साथ सभा की और उनकी समस्याएं जानी थीं। उम्मीद जगी कि कारीगरों की किस्मत बदलेगी। लोकसभा चुनाव के बाद केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व के गठबंधन की सरकार भी बनी, लेकिन अलीगंज के जरी-जरदोजी को कुछ हासिल नहीं हुआ।
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वर्तमान में मोहल्ला काजी और अंसारी मोहल्ला के करीब 125 परिवारों में यह काम किया जा रहा है। हर परिवार से तीन-चार लोग कपड़ों पर उंगलियों के हुनर से कढ़ाई करते हैं। इन्हें एटा के अलावा मैनपुरी, फर्रुखाबाद, कासगंज आदि के व्यापारी कपड़े देते हैं। जिस पर यहां के कारीगर कढ़ाई के जरिए लहंगा-चुनरी, साड़ी आदि को आकर्षक रूप प्रदान करते हैं।
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कारीगरों के मुताबिक अब से एक दशक पहले करीब 200 परिवारों में यह काम चलता था। धीरे-धीरे मांग कम होती गई। अब तो साल के चार-पांच महीनों में ही काम मिलता है। अन्य दिनों में दूसरा रोजगार देखना होता था। कारीगरों का कहना है कि यदि सरकार हमें प्रशिक्षित कर हुनर को और बढ़ाती तथा अपने उत्पादों को सीधे बाजारों में पहुंचाने के लिए व्यवस्था करती तो इस उद्यम को जान मिल जाती।
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13 साल पहले राहुल गांधी ने ली थी सुध
यूं तो अलीगंज में तमाम नेता आए और उनकी सभाएं हुईं, लेकिन कभी इस लघु उद्यम पर बात ही नहीं हुई। 13 साल पहले 2009 में कांग्रेस नेता राहुल गांधी यहां आए थे। उन्होंने खासतौर पर बुनकरों के साथ सभा की और उनकी समस्याएं जानी थीं। उम्मीद जगी कि कारीगरों की किस्मत बदलेगी। लोकसभा चुनाव के बाद केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व के गठबंधन की सरकार भी बनी, लेकिन अलीगंज के जरी-जरदोजी को कुछ हासिल नहीं हुआ।