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विश्वनाथ के नाम से ही खौफ खाते थे अंग्रेज
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7 शद्घ 2,345 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्व.विश्वनाथ राय की फाइल फोटो
- फोटो : DEORIA
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विश्वनाथ के नाम से ही खौफ खाते थे अंग्रेज
कालकोठरी भी डिगा नहीं सकीं आजादी के दीवाने का हौसला
गिरफ्तारी के दबाव में परिवार को भी सहनी पड़ी थीं यातनाएं
संवाद न्यूज एजेंसी
खुखुंदू। उनके हौसलों को न राह की मुश्किलें डिगा सकीं और न ही अंग्रेजों की बर्बरता असर दिखा पाई। आजादी लाना उनका जुनून था और आजाद भारत सपना। घर-परिवार की चिंता किए बगैर वह अपने मिशन में लगे रहे। कुछ ऐसी ही शख्सियत थी खुखुंदू के विश्वनाथ राय की। महात्मा गांधी के सिद्धांतों को अपनाते हुए आंदोलनों में लाठी खाई तो बहरी सरकार की तंद्रा भंग करने के लिए चंद्रशेखर आजाद के रास्ते को भी अपनाने से पीछे नहीं हटे। कालकोठरी में रहकर भी उन्होंने सिर्फ आजाद भारत का ही सपना देखा। प्रयागराज विवि के लॉ छात्र विश्वनाथ राय नेशनल यूथ लीग की कार्यसमिति के सदस्य के रूप में 1930 में महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन से जुड़े।
युवाओं के जत्थे के साथ उन्होंने प्रयागराज के घंटाघर पर तिरंगा फहराने का प्रण किया था। इस मौके पर दो साथियों की शहादत ने उन्हें इस तरह झकझोरा कि अब तक बापू के अहिंसक आंदोलन को ही आजादी का सही रास्ता मानने वाले विश्वनाथ ने हथियार उठाने का निर्णय लिया। चंद्रशेखर आजाद के सानिध्य में पुलिस से बचते हुए वह दिन प्रतिदिन अंग्रेजी हुकूमत के लिए सिर दर्द बनते जा रहे थे। परिवार पर अंग्रेजों ने उन्हें हाजिर कराने का दबाव बनाना शुरू किया। अंग्रेजों को इसमें सफलता भी मिली और आजादी के इस दीवाने को देवली (राजस्थान) के रेगिस्तानी इलाके की जेल में डाल दिया। क्रांतिकारी की पत्नी इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर सकीं और अल्पायु में ही अपने दो वर्ष की इकलौती बिटिया इंदिरा को छोड़कर चल बसीं। बेटे व बहू के सदमे को उनके पिता भी बर्दाश्त नहीं कर सके। वह भी चल बसे। इस दुखद मौके पर भी बंदी विश्वनाथ राय को अपने पिता के अंतिम क्रिया में शामिल होने का अवसर नहीं मिला। चंद्रशेखर आजाद की शहादत के बाद देवली जेल से आठ वर्षों के लंबे अंतराल के बाद वह पुन: चंद्रशेखर आजाद की सोशलिस्ट रिपब्लिक आर्मी के लिए सक्रिय रूप से कार्य करने लगे। अब अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें अपने लिए बड़ा खतरा मान लिया। उनकी अनुपस्थिति में खुखुंदू स्थित उनके परिवार पर अंग्रेजों ने अपना कहर बरपाया। उनके घर में लूटपाट की। इस यातना से उनका परिवार गांव में ही दूसरों के घर में ही छिपकर रहने को विवश हो गया। यहां तक कि उनकी ससुराल उजियार घाट (बलिया) में उनके जज पद पर कार्यरत ससुर तक पर अंग्रेजों ने दबाव बनाया कि वो अपने क्रांतिकारी दामाद को समर्पण करा दें। अंग्रेजों की यह युक्ति भी काम नहीं आई। लेकिन 1940 में विश्वनाथ राय आखिरकार एक बार फिर पकड़ लिए गए। इस बार उनके कारावास की अवधि छह वर्ष थी। इन छह वर्षों में उन्होंने खुखुंदू में अपनी धीरे-धीरे बड़ी हो रही बच्ची इंदिरा राय से पत्राचार करना शुरू कर उनमें भी पत्रों के माध्यम से देश प्रेम की भावना का संचार करते थे। 1940-46 के कारावास के दौरान ही विश्वनाथ राय जी का संपर्क उसी जेल में बंद जवाहर लाल नेहरू से हुआ। उनके विचारों से प्रभावित होकर विश्वनाथ राय ने पुन: गांधीवादी रास्ते पर चलने का निर्णय लिया। 1944 में कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली।
25 वर्षों तक लगातार रहे सांसद
खुखुंदू। आजादी के बाद भी उनमें देश प्रेम की भावना में कमी नहीं आई। 1952 से 1977 तक लगातार लोकसभा के निर्वाचित संसद सदस्य रहने के बाद भी समाजसेवा को प्राथमिकता में रखा। शिक्षा के विस्तार में उन्होंने पैतृक गांव खुखुंदू में शिवाजी बाल विद्यालय शिवाजी इंटर कॉलेज की स्थापना की। पिता के सपनों को साकार करने के लिए उन्हीं के पद चिह्नों पर चलते हुए उनके दूसरे नंबर के सुपुत्र अजय शर्मा ने शिक्षा के क्षेत्र में विस्तार करते हुए डिग्री कॉलेज की स्थापना कराई। वर्तमान में अजय शर्मा इन कॉलेजों के प्रबंधक हैं। 1906 में जन्मे क्रांतिकारी विश्वनाथ राय ईमानदार सांसद के रूप में 25 वर्ष के गौरवमयी जीवन जीते हुए आजाद भारत में 28 अगस्त 1984 को अपनी अंतिम सांस लेकर इस दुनिया से अलविदा हो गए। केंद्र में रही कांग्रेस सरकार ने स्वर्गीय राय के नाम से डाक टिकट भी जारी कराया है।
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लोकप्रियता की बदौलत अशोक मेहता को दी थी मात
खुखुंदू। स्व. विश्वनाथ राय अपनी ईमानदारी और लोकप्रियता की बदौलत कांग्रेस पार्टी से 1962 के लोकसभा के आम चुनाव में राम मनोहर लोहिया के साथ सोशलिस्ट पार्टी के दूसरे नंबर के नेता कहे जाने वाले आर्थिक चिंतक अशोक मेहता को भारी मतों से देवरिया के सरजमीं पर चुनाव हराकर अपना लोहा मनवाया था। स्व. राय ने एक अलग पहचान बनाई थी। उनके निधन के समय उनके बैंक खाते में 35 हजार रुपये थे। इसके अलावा उनके पास पिता द्वारा छोड़ी गई अचल संपत्ति के अलावा क्रय और अर्जित की गई कोई संपत्ति नहीं थी।
फोटो समाचार
रतसिया कोठी लूटकर हिला दी थी अंग्रेजी हुकूमत की चूलें
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चन्दर सिंह का घर उपेक्षित
संवाद न्यूज एजेंसी
भाटपाररानी। आठ अगस्त 1942 को जब बंबई (अब मुंबई) के ग्वालियर टैंक मैदान में कांग्रेस के अधिवेशन में अंग्रेजों भारत छोड़ो प्रस्ताव पर मुहर लगी तो अंग्रेजी हुकूमत ने महात्मा गांधी, पंडित नेहरू समेत अनेक शीर्ष नेताओं को बंदी बना लिया और जेल में ठूंस दिया। इन नेताओं की गिरफ्तारी की सूचना जैसे ही देश के अलग-अलग हिस्सों में पहुंची क्रांतिकारियों के साथ आम जन में भी अंग्रेजी शासन के प्रति रोष भड़क गया। तत्कालीन संयुक्त प्रान्त के गोरखपुर जिले में आजादी की लड़ाई की चिंगारी पहुंची तो इलाका सुलग उठा। अंग्रेजी हुकूमत का प्रतीक रतसिया कोठी उस समय क्रांतिकारियों के निशाने पर था।
अहिरौली बघेल निवासी 85 वर्षीय बुजुर्ग सुरेश सिंह कहते हैं कि दरवाजे पर पेड़ के ऊपर लंबे बांस में तिरंगा झंडा फहराया जाता था। बाबा महेंद्र सिंह उस समय गांव के युवाओं को अंग्रेजी हुकूमत के क्रूरता की कहानी सुनाकर राष्ट्र प्रेम और आजादी का जज्बा भरते थे। इनसे प्रेरणा लेकर गांव के बाबू चन्दर सिंह ने अपने साथियों बाबू वीरेन्द्र सिंह, रामबिहारी सिंह और राधकिशुन सिंह के साथ बनकटा क्षेत्र में क्रांति का आगाज किया। क्रांतिकारियों ने आज के गोरखपुर-छपरा रेलखंड की भाटपाररानी से बनकटा तक अनेक जगह रेल पटरियों को उखाड़ फेंका और दूरसंचार के तारों को काट डाला। क्रांतिकारियों का अगला पड़ाव रतसिया कोठी को तहस-नहस कर अंग्रेजों को भगाना था। काम इतना आसान नहीं था। रतसिया कोठी पूर्वी उत्तर प्रदेश बिहार सीमा के निकट वह जगह थी जहां अंग्रेज अफसर मार्टिन ने 2400 एकड़ की कोठी और गोदाम स्थापित किया। नील, अफीम, जूट समेत कपास की खेती अंग्रेजों की आय का माध्यम थे। बाबू चन्दर सिंह ने अपने साथियों समेत क्षेत्र के हजारों युवाओं संग रतसिया कोठी पर धावा बोला और आगजनी की। क्रांतिकारियों की उग्र भीड़ देखकर अनेक अंग्रेज अफसर और कर्मचारी भाग खड़े हुए। इसी आग में अंग्रेज मैनेजर बर्कले की दो युवा बेटियां घिर गईं। क्रुद्ध क्रांतिकारियों ने उन्हें भी आग में झोंकने की कोशिश की, किन्तु बाबू चन्दर सिंह ने ऐसा करने से न केवल रोका बल्कि सुरक्षित जाने दिया। रतसिया कोठी लूटे जाने से अंग्रेजी हुकूमत बौखला गई और क्रांतिकारियों को जिंदा या मुर्दा पकड़ने का वारंट जारी हुआ। अंग्रेज सिपाहियों की दबिश से क्रांतिकारियों ने गांव छोड़ दिया। बाबू चन्दर सिंह ने भी पहले सलेमपुर के नादघाट में अपने रिश्तेदार के यहां शरण ली। अंग्रेजों के पता चलने से पहले बस्ती जिले के चनहर गांव में पुन: एक रिश्तेदार के घर महीनों रहे। यहीं के जमींदार ने इनाम के लालच में मुखबिरी की और पकड़वा दिया। गिरफ्तारी के बाद चन्दर सिंह की फांसी की सजा निश्चित थी, किन्तु अंग्रेज अफसर बर्कले की दोनों बेटियों की गवाही पर सजा घटाकर 25 वर्ष कारावास कर दी गई। स्वतंत्रता सेनानी बाबू चन्दर सिंह के रिश्ते में पौत्र अध्यापक सतीश सिंह कहते हैं कि अंग्रेजों ने घर फूंक दिया था। परिवार के लोग खेतों और बगीचे में शरण लिए थे। जब नेहरू जी की बहन विजय लक्ष्मी पंडित को चन्दर सिंह के बारे में जानकारी हुई तो वह अहिरौली बघेल स्थित उनके घर आईं और घर बनाने के लिए कुछ रकम भी दी थीं। वर्ष 1945-46 में अंतरिम सरकार के गठन के साथ पंडित नेहरू ने सजा से मुक्ति दिलाई। स्वतंत्रता सेनानी के तौर पर नैनीताल में मिली 40 एकड़ भूमि को बाबू चन्दर सिंह ने भूदान आंदोलन में विनोबा भावे को दान कर दी। जिन सेनानियों ने दमनकारी अंग्रेजों से लोहा लेकर आजादी दिलाई, आजादी के बाद उनके देश के हुक्मरानों ने न ही उनकी स्मृतियां संजोई और न ही इनके नाम पर कोई आयोजन होता है। पुश्तैनी मकान ढह गया है। अगले हिस्से में टीन शेड पड़ा है। भाटपाररानी क्षेत्र के बरईपार में उनकी बड़ी बेटी के पुत्र धर्म प्रकाश सिंह योगी आदित्यनाथ द्वारा उद्घाटित स्वतंत्रता सेनानी बाबू चन्दर सिंह स्मारक विद्यालय का संचालन करते हैं।
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गिरफ्तारी के दबाव में परिवार को भी सहनी पड़ी थीं यातनाएं
संवाद न्यूज एजेंसी
खुखुंदू। उनके हौसलों को न राह की मुश्किलें डिगा सकीं और न ही अंग्रेजों की बर्बरता असर दिखा पाई। आजादी लाना उनका जुनून था और आजाद भारत सपना। घर-परिवार की चिंता किए बगैर वह अपने मिशन में लगे रहे। कुछ ऐसी ही शख्सियत थी खुखुंदू के विश्वनाथ राय की। महात्मा गांधी के सिद्धांतों को अपनाते हुए आंदोलनों में लाठी खाई तो बहरी सरकार की तंद्रा भंग करने के लिए चंद्रशेखर आजाद के रास्ते को भी अपनाने से पीछे नहीं हटे। कालकोठरी में रहकर भी उन्होंने सिर्फ आजाद भारत का ही सपना देखा। प्रयागराज विवि के लॉ छात्र विश्वनाथ राय नेशनल यूथ लीग की कार्यसमिति के सदस्य के रूप में 1930 में महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन से जुड़े।
युवाओं के जत्थे के साथ उन्होंने प्रयागराज के घंटाघर पर तिरंगा फहराने का प्रण किया था। इस मौके पर दो साथियों की शहादत ने उन्हें इस तरह झकझोरा कि अब तक बापू के अहिंसक आंदोलन को ही आजादी का सही रास्ता मानने वाले विश्वनाथ ने हथियार उठाने का निर्णय लिया। चंद्रशेखर आजाद के सानिध्य में पुलिस से बचते हुए वह दिन प्रतिदिन अंग्रेजी हुकूमत के लिए सिर दर्द बनते जा रहे थे। परिवार पर अंग्रेजों ने उन्हें हाजिर कराने का दबाव बनाना शुरू किया। अंग्रेजों को इसमें सफलता भी मिली और आजादी के इस दीवाने को देवली (राजस्थान) के रेगिस्तानी इलाके की जेल में डाल दिया। क्रांतिकारी की पत्नी इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर सकीं और अल्पायु में ही अपने दो वर्ष की इकलौती बिटिया इंदिरा को छोड़कर चल बसीं। बेटे व बहू के सदमे को उनके पिता भी बर्दाश्त नहीं कर सके। वह भी चल बसे। इस दुखद मौके पर भी बंदी विश्वनाथ राय को अपने पिता के अंतिम क्रिया में शामिल होने का अवसर नहीं मिला। चंद्रशेखर आजाद की शहादत के बाद देवली जेल से आठ वर्षों के लंबे अंतराल के बाद वह पुन: चंद्रशेखर आजाद की सोशलिस्ट रिपब्लिक आर्मी के लिए सक्रिय रूप से कार्य करने लगे। अब अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें अपने लिए बड़ा खतरा मान लिया। उनकी अनुपस्थिति में खुखुंदू स्थित उनके परिवार पर अंग्रेजों ने अपना कहर बरपाया। उनके घर में लूटपाट की। इस यातना से उनका परिवार गांव में ही दूसरों के घर में ही छिपकर रहने को विवश हो गया। यहां तक कि उनकी ससुराल उजियार घाट (बलिया) में उनके जज पद पर कार्यरत ससुर तक पर अंग्रेजों ने दबाव बनाया कि वो अपने क्रांतिकारी दामाद को समर्पण करा दें। अंग्रेजों की यह युक्ति भी काम नहीं आई। लेकिन 1940 में विश्वनाथ राय आखिरकार एक बार फिर पकड़ लिए गए। इस बार उनके कारावास की अवधि छह वर्ष थी। इन छह वर्षों में उन्होंने खुखुंदू में अपनी धीरे-धीरे बड़ी हो रही बच्ची इंदिरा राय से पत्राचार करना शुरू कर उनमें भी पत्रों के माध्यम से देश प्रेम की भावना का संचार करते थे। 1940-46 के कारावास के दौरान ही विश्वनाथ राय जी का संपर्क उसी जेल में बंद जवाहर लाल नेहरू से हुआ। उनके विचारों से प्रभावित होकर विश्वनाथ राय ने पुन: गांधीवादी रास्ते पर चलने का निर्णय लिया। 1944 में कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली।
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खुखुंदू। आजादी के बाद भी उनमें देश प्रेम की भावना में कमी नहीं आई। 1952 से 1977 तक लगातार लोकसभा के निर्वाचित संसद सदस्य रहने के बाद भी समाजसेवा को प्राथमिकता में रखा। शिक्षा के विस्तार में उन्होंने पैतृक गांव खुखुंदू में शिवाजी बाल विद्यालय शिवाजी इंटर कॉलेज की स्थापना की। पिता के सपनों को साकार करने के लिए उन्हीं के पद चिह्नों पर चलते हुए उनके दूसरे नंबर के सुपुत्र अजय शर्मा ने शिक्षा के क्षेत्र में विस्तार करते हुए डिग्री कॉलेज की स्थापना कराई। वर्तमान में अजय शर्मा इन कॉलेजों के प्रबंधक हैं। 1906 में जन्मे क्रांतिकारी विश्वनाथ राय ईमानदार सांसद के रूप में 25 वर्ष के गौरवमयी जीवन जीते हुए आजाद भारत में 28 अगस्त 1984 को अपनी अंतिम सांस लेकर इस दुनिया से अलविदा हो गए। केंद्र में रही कांग्रेस सरकार ने स्वर्गीय राय के नाम से डाक टिकट भी जारी कराया है।
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खुखुंदू। स्व. विश्वनाथ राय अपनी ईमानदारी और लोकप्रियता की बदौलत कांग्रेस पार्टी से 1962 के लोकसभा के आम चुनाव में राम मनोहर लोहिया के साथ सोशलिस्ट पार्टी के दूसरे नंबर के नेता कहे जाने वाले आर्थिक चिंतक अशोक मेहता को भारी मतों से देवरिया के सरजमीं पर चुनाव हराकर अपना लोहा मनवाया था। स्व. राय ने एक अलग पहचान बनाई थी। उनके निधन के समय उनके बैंक खाते में 35 हजार रुपये थे। इसके अलावा उनके पास पिता द्वारा छोड़ी गई अचल संपत्ति के अलावा क्रय और अर्जित की गई कोई संपत्ति नहीं थी।
फोटो समाचार
रतसिया कोठी लूटकर हिला दी थी अंग्रेजी हुकूमत की चूलें
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चन्दर सिंह का घर उपेक्षित
संवाद न्यूज एजेंसी
भाटपाररानी। आठ अगस्त 1942 को जब बंबई (अब मुंबई) के ग्वालियर टैंक मैदान में कांग्रेस के अधिवेशन में अंग्रेजों भारत छोड़ो प्रस्ताव पर मुहर लगी तो अंग्रेजी हुकूमत ने महात्मा गांधी, पंडित नेहरू समेत अनेक शीर्ष नेताओं को बंदी बना लिया और जेल में ठूंस दिया। इन नेताओं की गिरफ्तारी की सूचना जैसे ही देश के अलग-अलग हिस्सों में पहुंची क्रांतिकारियों के साथ आम जन में भी अंग्रेजी शासन के प्रति रोष भड़क गया। तत्कालीन संयुक्त प्रान्त के गोरखपुर जिले में आजादी की लड़ाई की चिंगारी पहुंची तो इलाका सुलग उठा। अंग्रेजी हुकूमत का प्रतीक रतसिया कोठी उस समय क्रांतिकारियों के निशाने पर था।
अहिरौली बघेल निवासी 85 वर्षीय बुजुर्ग सुरेश सिंह कहते हैं कि दरवाजे पर पेड़ के ऊपर लंबे बांस में तिरंगा झंडा फहराया जाता था। बाबा महेंद्र सिंह उस समय गांव के युवाओं को अंग्रेजी हुकूमत के क्रूरता की कहानी सुनाकर राष्ट्र प्रेम और आजादी का जज्बा भरते थे। इनसे प्रेरणा लेकर गांव के बाबू चन्दर सिंह ने अपने साथियों बाबू वीरेन्द्र सिंह, रामबिहारी सिंह और राधकिशुन सिंह के साथ बनकटा क्षेत्र में क्रांति का आगाज किया। क्रांतिकारियों ने आज के गोरखपुर-छपरा रेलखंड की भाटपाररानी से बनकटा तक अनेक जगह रेल पटरियों को उखाड़ फेंका और दूरसंचार के तारों को काट डाला। क्रांतिकारियों का अगला पड़ाव रतसिया कोठी को तहस-नहस कर अंग्रेजों को भगाना था। काम इतना आसान नहीं था। रतसिया कोठी पूर्वी उत्तर प्रदेश बिहार सीमा के निकट वह जगह थी जहां अंग्रेज अफसर मार्टिन ने 2400 एकड़ की कोठी और गोदाम स्थापित किया। नील, अफीम, जूट समेत कपास की खेती अंग्रेजों की आय का माध्यम थे। बाबू चन्दर सिंह ने अपने साथियों समेत क्षेत्र के हजारों युवाओं संग रतसिया कोठी पर धावा बोला और आगजनी की। क्रांतिकारियों की उग्र भीड़ देखकर अनेक अंग्रेज अफसर और कर्मचारी भाग खड़े हुए। इसी आग में अंग्रेज मैनेजर बर्कले की दो युवा बेटियां घिर गईं। क्रुद्ध क्रांतिकारियों ने उन्हें भी आग में झोंकने की कोशिश की, किन्तु बाबू चन्दर सिंह ने ऐसा करने से न केवल रोका बल्कि सुरक्षित जाने दिया। रतसिया कोठी लूटे जाने से अंग्रेजी हुकूमत बौखला गई और क्रांतिकारियों को जिंदा या मुर्दा पकड़ने का वारंट जारी हुआ। अंग्रेज सिपाहियों की दबिश से क्रांतिकारियों ने गांव छोड़ दिया। बाबू चन्दर सिंह ने भी पहले सलेमपुर के नादघाट में अपने रिश्तेदार के यहां शरण ली। अंग्रेजों के पता चलने से पहले बस्ती जिले के चनहर गांव में पुन: एक रिश्तेदार के घर महीनों रहे। यहीं के जमींदार ने इनाम के लालच में मुखबिरी की और पकड़वा दिया। गिरफ्तारी के बाद चन्दर सिंह की फांसी की सजा निश्चित थी, किन्तु अंग्रेज अफसर बर्कले की दोनों बेटियों की गवाही पर सजा घटाकर 25 वर्ष कारावास कर दी गई। स्वतंत्रता सेनानी बाबू चन्दर सिंह के रिश्ते में पौत्र अध्यापक सतीश सिंह कहते हैं कि अंग्रेजों ने घर फूंक दिया था। परिवार के लोग खेतों और बगीचे में शरण लिए थे। जब नेहरू जी की बहन विजय लक्ष्मी पंडित को चन्दर सिंह के बारे में जानकारी हुई तो वह अहिरौली बघेल स्थित उनके घर आईं और घर बनाने के लिए कुछ रकम भी दी थीं। वर्ष 1945-46 में अंतरिम सरकार के गठन के साथ पंडित नेहरू ने सजा से मुक्ति दिलाई। स्वतंत्रता सेनानी के तौर पर नैनीताल में मिली 40 एकड़ भूमि को बाबू चन्दर सिंह ने भूदान आंदोलन में विनोबा भावे को दान कर दी। जिन सेनानियों ने दमनकारी अंग्रेजों से लोहा लेकर आजादी दिलाई, आजादी के बाद उनके देश के हुक्मरानों ने न ही उनकी स्मृतियां संजोई और न ही इनके नाम पर कोई आयोजन होता है। पुश्तैनी मकान ढह गया है। अगले हिस्से में टीन शेड पड़ा है। भाटपाररानी क्षेत्र के बरईपार में उनकी बड़ी बेटी के पुत्र धर्म प्रकाश सिंह योगी आदित्यनाथ द्वारा उद्घाटित स्वतंत्रता सेनानी बाबू चन्दर सिंह स्मारक विद्यालय का संचालन करते हैं।