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Deoria News: डीएपी के लिए मारामारी, समितियों से मायूस होकर लौट रहे किसान

Mon, 25 Nov 2024 12:09 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, देवरिया
संवाद न्यूज एजेंसी, देवरिया Updated Mon, 25 Nov 2024 12:09 PM IST
सार

जिले में डीएपी खाद की कमी नहीं है। सहकारिता विभाग दावा कर रहा है कि निजी क्षेत्र के लिए आ रही खाद का 30 प्रतिशत समितियों को भेजा जा रहा था। ऐसा प्रशासन लगातार दावा कर रहा है। परंतु ऐसा भी देखने में आ रहा है कि कई समितियाें पर अभी भी खाद नहीं पहुंच रही है।

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Fight for DAP, farmers returning disappointed from committees
डीएपी खाद - फोटो : social media

विस्तार

गेहूं बुआई के लिए किसान डीएपी खाद के लिए मारे मारे फिर रहे है। कई समितियों पर ताले लटके हुए हैं। किसान निजी दुकानों से महंगे खाद खरीदने के लिए मजबूर हैं। वहीं विभाग का कहना है कि रविवार से समितियों को 50 प्रतिशत खाद भेजा जाएगा। भाटपार रानी क्षेत्र में कुछ समितियों पर मांग से कम आई खाद की कालाबाजारी जोरों पर है।

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इसे सही किसानों को खाद नहीं मिल पा रही है। कुछ सफेद पोश 30 से 50 बोरी खाद समितियों से निकलवा ले रहे हैं और किसान लाइन में खड़े-खड़े मुंह ताककर वापस बैरंग लौट जा रहे हैं। भठवा तिवारी, कोड़रा, टीकम पार आदि समितियों का यही हाल है।
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ई पास मशीन से किसी समितियों पर खाद नहीं बांटी जा रही है। किसान चंद्रभान यादव, राधेश्याम, नंदकिशोर आदि का कहना है कि अंगूठा लगाकर कहीं खाद नहीं बंट रही है। इससे कालाबाजारी हो रही है। उप जिलाधिकारी रत्नेश तिवारी का कहना है कि बोर्ड परीक्षाओं के लिए केंद्र का चयन होना है ,उसी में देवरिया मुख्यालय पर व्यस्तता है। किसानों को सुविधा से खाद मिले इसके लिए सरकारी तंत्र प्रयास कर रहा है।
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सलेमपुर में कुल 17 सहकारी समिति है। इसमें चार समितियों चांद पार, भरौली, डोलछपरा, बरसीपार में एकभी बोरी डीएपी खाद नहीं आई। जबकि दो समिति पर 46-46 बाकी समितियों पर 36 -36 टन खाद आई थी। इस समय किसी भी समिति पर खाद उपलब्ध नहीं है। ईपास मशीन सब जगह ठीक है।


बरहज में सरकारी कृषि बीज गोदाम और अधिकांश साधन सहकारी समिति पर खाद-बीज की किल्लत बरकरार है। जिससे किसान रबी की बुवाई को लेकर हलकान हैं। खेती में हो रही देरी और समय से खाद-बीज उपलब्ध न होने से किसान प्राइवेट दुकानों पर उनकी जेब ढीली हो रही है। किसानों का कहना है कि प्राइवेट दुकानों पर बीज का पैकेट खरीदना मजबूरी हो गया है।

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