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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Deoria News ›   Brothers thwarted by the hail of bullets arms and ammunition

गोलियों की बौछार ने नाकाम कर दिए भाइयों के असलहे

Fri, 20 Nov 2015 12:16 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/देवरिया
अमर उजाला ब्यूरो/देवरिया Updated Fri, 20 Nov 2015 12:16 AM IST
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लार के रेवली रेलवे क्रासिंग के समीप बाइक सवार नकाबपोश तीन बदमाशों ने जिस तरह दो भाइयों की सरेआम जान ली, उससे हर कोई सन्न है।

 हमलावरों की तरफ से एकाएक शुरू हुई गोलियों की बौछार इतनी तेज थी कि रामजीत सिंह को अपने पास मौजूद रिवाल्वर और बाइक पर पीछे बैठे भाई को हाथ की बंदूक के इस्तेमाल का मौका ही नहीं मिला।

बलिया, फेफना के खलीलपुर गांव निवासी रामजीत सिंह ने वर्ष 2010 में माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड के निर्देश पर स्वामी देवानंद इंटर कॉलेज में प्रधानाचार्य के पद पर कार्यभार ग्रहण किया।

 प्रिंसिपल की कुर्सी संभालने के करीब छह माह बाद घर जाते समय बदमाशों ने पीछे से गोली मार दी। गोली प्रधानाचार्य की गर्दन के पास लगी थी। इस मामले में फेफना थाने में अज्ञात बदमाशों के खिलाफ केस भी दर्ज हुआ था। इसके बाद वह अपनी सुरक्षा के लिए बलिया जिले के रसड़ा कोतवाली निवासी अनिरुद्ध कुमार को निजी गनर के रूप में साथ रखने लगे थे। 

इसके बाद 24 मार्च 2012 को प्रधानाचार्य गनर के साथ लार रोड पर जाते समय हरखौली गांव के करीब पीछे से आई बाइक पर सवार बदमाशों ने उन पर फायरिंग की तो बाइक पर पीछे बैठे गनर अनिरुद्ध गोली लगने से जख्मी हुए थे। 

इसका केस भी अज्ञात के खिलाफ दर्ज हुआ था। दूसरे हमले के बाद रामजीत सिंह को सुरक्षा के लिए दो सिपाही मिल गए थे, जो करीब एक साल तक उनके साथ रहे। 

बाद में सुरक्षा की सरकारी सुविधा वापस हो गई और इस बीच प्रबंधन की तरफ से अखिलेश चन्द्र मिश्र को कॉलेज का प्रधानाचार्य बनाने से उनका प्रबंध तंत्र से विवाद गर्मा गया। 

इसे हाईकोर्ट में चुनौती देने के बाद रामजीत सिंह ने फौज से सेवानिवृत्त बड़े भाई विजय बहादुर सिंह को ही मय लाइसेंसी असलहा अपने साथ रखना शुरू कर दिया था। 

बृहस्पतिवार को हुए हमले के समय भाई मय बंदूक बाइक पर साथ मौजूद थे, जबकि रामजीत सिंह के पास लाइसेंसी रिवाल्वर भी था लेकिन खुलेआम एकाएक शुरू हुई गोलियों की बौछार में दोनों भाइयों को असलहा इस्तेमाल करना तो दूर संभलने का मौका भी नहीं मिला और मौके पर ही मौत हो गई।

 रामजीत सिंह के सिर और चेहरे पर लगी गोली जानलेवा साबित हुई, जबकि भाई के चेहरे में धंसी एक ही गोली हमलावरों का मकसद पूरा करा गई। चार भाइयों में रामजीत सिंह सबसे छोटे थे।

 पूर्व फौजी विजय बहादुर के अलावा वीरबहादुर सिंह और रामबहादुर सिंह खेती संभालते थे।

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