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अवैध थी संस्था, फिर सौंपे गए कई बड़े प्रोजेक्ट
Updated Tue, 07 Aug 2018 11:05 PM IST
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देवरिया बालगृह कांड
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मान्यता नहीं, फिर भी सौंपे गए कई बड़े प्रोजेक्ट
सामूहिक विवाह समारोह, स्वीप जागरूकता अभियान जैसे कार्यक्रमों का दिया जिम्मा
संस्था पर अफसरों की रही मेहरबानी, नेताओं-अफसरों के साथ मंच पर मिलता था सम्मान
मनीष जायसवाल
देवरिया। जून 2017 में मान्यता स्थगित होने के बाद भी चल रहे मां विंध्यवासिनी महिला प्रशिक्षण एवं समाज सेवा संस्थान पर अफसरों की भरपूर मेहरबानी रही। यही कारण रहा कि सीबीआई की चिह्नित संस्थाओं में होने के बाद भी उसे एक के बाद एक बड़े-बड़े प्रोजेक्ट सौंपे गए। समाज कल्याण विभाग के सामूहिक विवाह समारोह में मुख्य भूमिका निभाई तो निर्वाचन कार्य में भी बड़ी जिम्मेदारी दी गई। वृद्धाश्रम संचालन सहित सामाजिक सुधार के कई अन्य कार्यक्रमों से जोड़ा गया। इन आयोजनों में गिरिजा त्रिपाठी की न सिर्फ सक्रिय भूमिका रही, बल्कि बड़े अफसरों, जनप्रतिनिधियों के साथ मंच पर सम्मान दिया गया।
वित्तीय सत्र के अंतिम दिनों में मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना के लक्ष्य पूर्ति की बारी आई तो समाज कल्याण विभाग सबसे पहले इसी संस्था के पास पहुंचा। नौ फरवरी को पुलिस लाइन, 10 मार्च को महुआरी और 13 जुलाई को बैतालपुर में आयोजित सामूहिक विवाह समारोह में जोड़ों के ढूंढने से लेकर आयोजन की समाप्ति तक गिरिजा और उनकी संस्था ही सक्रिय रही। निकाय चुनावों में स्वीप अभियान के तहत मतदाता जागरूकता कार्यक्रम में भी इसी संस्था को आगे किया गया। सिर्फ यही नहीं, जिले में आयोजित होने वाले किसी भी सरकारी सामाजिक कार्यक्रम में गिरिजा त्रिपाठी की संस्था को आगे रखा जाता था। गिरिजा के पति मोहन त्रिपाठी को समाज कल्याण विभाग के दफ्तर में अक्सर घंटों बैठे देखा जाता था। ऐसे में सवाल है कि अगर संस्था बगैर मान्यता के थी तो अफसर इस पर इतनी मेहरबानी क्यों दिखाते थे। पूरे मामले में कई उच्च पदस्थ लोगों की भूमिका संदेह के घेरे में है। जांच में सभी चेहरे बेनकाब होंगे।
एक ही भवन में चल रहे थे चार अलग-अलग केंद्र
एक ही स्टॉफ से सभी केंद्रों का लिया जाता था काम
अनुदान बंद होने से पहले अलग-अलग किराया और स्टॉफ का हुआ भुगतान
अमर उजाला ब्यूरो
देवरिया। बालगृह बालिका में रह रही लड़कियों के यौन उत्पीड़न के आरोपों से घिरी गिरिजा त्रिपाठी का एक और फर्जीवाड़ा सामने आया है। उनकी संस्था एक ही भवन में चार अलग-अलग केंद्रों का संचालन कर रही थी। इनके स्टॉफ भी एक ही थे। नियमानुसार सभी केंद्रों का भवन और स्टॉफ अलग-अलग होना चाहिए। इसी आधार पर शासन की ओर से अनुदान देने का भी नियम है।
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मां विंध्यवासिनी महिला प्रशिक्षण एवं समाज सेवा संस्थान के अंतर्गत चार केंद्रों को मान्यता दी गई थी। इनमें सबसे बड़ी इकाई बालगृह बालिका थी, जिसकी क्षमता 50 लड़कियों की थी। इसमें 18 वर्ष से नीचे की बालिकाएं रखी जाती थीं। इस केंद्र के लिए मानक करीब आठ हजार वर्ग फीट के भवन का है। बालिकाओं की देखरेख व अन्य कार्यों के लिए अधीक्षिका समेत 15 कर्मचारी होने चाहिए। आठ वर्ष से नीचे के बच्चों वाले शिशु गृह की क्षमता 25 की थी। इसमें भी 15 स्टॉफ होने चाहिए। 10 बच्चों की क्षमता वाले विशेष दत्तक ग्रहण इकाई के लिए 11 कर्मचारी और स्वाधार गृह में 15 का स्टॉफ स्वीकृत है। कागजों में प्रत्येक केंद्र के लिए अलग-अलग कर्मचारी भी कार्यरत हैं, मगर मौके पर सिर्फ एक संस्था के कर्मचारियों से ही सभी के काम कराए जाते हैं। शिशु गृह, विशेष दत्तक इकाई, बालिका गृह का संचालन एक ही भवन में हो रहा है, जबकि स्वाधार गृह शहर से रजला गांव में वृद्धाश्रम के भवन में संयुक्त रूप से चलता है। विभागीय सूत्रों के मुताबिक इन प्रोजेक्ट पर सालाना बजट 50 लाख से एक करोड़ तक का है। फंड पर रोक से पहले प्रत्येक केंद्र के लिए अलग-अलग किराया और स्टॉफ का वेतन-मानदेय दिया जाता रहा है। एक ही भवन में इन केंद्रों का संचालन भी नियमविरुद्ध है, बावजूद जिम्मेदार आंखें मूंदे रहे।
संस्था में बच्चों को रखने पर मौन थी बाल कल्याण समिति
गुमशुदा व भागी हुई किशोरियों को रखने के लिए समिति ही नामित करती है संस्था
अमर उजाला ब्यूरो
देवरिया। बच्चों के कल्याण और बेहतरी से जुड़े निर्णय लेने के लिए डेढ़ साल पहले जिले में गठित पांच सदस्यीय बाल कल्याण समिति की उपयोगिता भी इस मामले में जांच के दायरे में है। जिले की सीमा में किसी भी गुमशुदा या घर से भागी नाबालिग बच्ची के मिलने पर उसे सबसे पहले बाल कल्याण समिति के समक्ष ही पेश करना होता है। यह समिति ही तय करती है कि बच्चे को कहां और किस केंद्र में रखा जाएगा। संस्था नामित करने की जिम्मेदारी भी इसी समिति की है। जून 2017 के बाद जिले में सवा सौ से भी अधिक भूले-भटके बच्चे और किशोरियां पाई गईं। इनमें चंद को छोड़ दें तो ज्यादातर को मां विंध्यवासिनी संस्था में ही रखा गया है। अवैध संस्था में बच्चों को रखे जाने के बावजूद बाल कल्याण समिति की चुप्पी चर्चा में है। सूत्रों की मानें तो पांच सदस्यीय कमेटी के कई सदस्य संचालिका गिरिजा त्रिपाठी की सहयोगी हैं। यही कारण है कि नियम विरुद्ध होते हुए भी चुप्पी साध जाते थे। हालांकि समिति के अध्यक्ष श्रीकांत यादव इससे इन्कार करते हैं। उनका कहना है कि समिति पूरी सक्रियता से अपना काम करती रही है। कई बार पुलिस-प्रशासन को पत्र से अवगत कराया गया। बैठकों में भी कहा गया कि कोई नाबालिग बच्ची मिलने पर सबसे पहले समिति के समक्ष ही पेश करें, मगर इसे दरकिनार किया जाता रहा। पुलिस भी अक्सर समिति की जानकारी में लाए बगैर किशोरियों को बालगृह बालिका में पहुंचा देती थी।
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मान्यता नहीं, फिर भी सौंपे गए कई बड़े प्रोजेक्ट
सामूहिक विवाह समारोह, स्वीप जागरूकता अभियान जैसे कार्यक्रमों का दिया जिम्मा
संस्था पर अफसरों की रही मेहरबानी, नेताओं-अफसरों के साथ मंच पर मिलता था सम्मान
मनीष जायसवाल
देवरिया। जून 2017 में मान्यता स्थगित होने के बाद भी चल रहे मां विंध्यवासिनी महिला प्रशिक्षण एवं समाज सेवा संस्थान पर अफसरों की भरपूर मेहरबानी रही। यही कारण रहा कि सीबीआई की चिह्नित संस्थाओं में होने के बाद भी उसे एक के बाद एक बड़े-बड़े प्रोजेक्ट सौंपे गए। समाज कल्याण विभाग के सामूहिक विवाह समारोह में मुख्य भूमिका निभाई तो निर्वाचन कार्य में भी बड़ी जिम्मेदारी दी गई। वृद्धाश्रम संचालन सहित सामाजिक सुधार के कई अन्य कार्यक्रमों से जोड़ा गया। इन आयोजनों में गिरिजा त्रिपाठी की न सिर्फ सक्रिय भूमिका रही, बल्कि बड़े अफसरों, जनप्रतिनिधियों के साथ मंच पर सम्मान दिया गया।
वित्तीय सत्र के अंतिम दिनों में मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना के लक्ष्य पूर्ति की बारी आई तो समाज कल्याण विभाग सबसे पहले इसी संस्था के पास पहुंचा। नौ फरवरी को पुलिस लाइन, 10 मार्च को महुआरी और 13 जुलाई को बैतालपुर में आयोजित सामूहिक विवाह समारोह में जोड़ों के ढूंढने से लेकर आयोजन की समाप्ति तक गिरिजा और उनकी संस्था ही सक्रिय रही। निकाय चुनावों में स्वीप अभियान के तहत मतदाता जागरूकता कार्यक्रम में भी इसी संस्था को आगे किया गया। सिर्फ यही नहीं, जिले में आयोजित होने वाले किसी भी सरकारी सामाजिक कार्यक्रम में गिरिजा त्रिपाठी की संस्था को आगे रखा जाता था। गिरिजा के पति मोहन त्रिपाठी को समाज कल्याण विभाग के दफ्तर में अक्सर घंटों बैठे देखा जाता था। ऐसे में सवाल है कि अगर संस्था बगैर मान्यता के थी तो अफसर इस पर इतनी मेहरबानी क्यों दिखाते थे। पूरे मामले में कई उच्च पदस्थ लोगों की भूमिका संदेह के घेरे में है। जांच में सभी चेहरे बेनकाब होंगे।
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एक ही भवन में चल रहे थे चार अलग-अलग केंद्र
एक ही स्टॉफ से सभी केंद्रों का लिया जाता था काम
अनुदान बंद होने से पहले अलग-अलग किराया और स्टॉफ का हुआ भुगतान
अमर उजाला ब्यूरो
देवरिया। बालगृह बालिका में रह रही लड़कियों के यौन उत्पीड़न के आरोपों से घिरी गिरिजा त्रिपाठी का एक और फर्जीवाड़ा सामने आया है। उनकी संस्था एक ही भवन में चार अलग-अलग केंद्रों का संचालन कर रही थी। इनके स्टॉफ भी एक ही थे। नियमानुसार सभी केंद्रों का भवन और स्टॉफ अलग-अलग होना चाहिए। इसी आधार पर शासन की ओर से अनुदान देने का भी नियम है।
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मां विंध्यवासिनी महिला प्रशिक्षण एवं समाज सेवा संस्थान के अंतर्गत चार केंद्रों को मान्यता दी गई थी। इनमें सबसे बड़ी इकाई बालगृह बालिका थी, जिसकी क्षमता 50 लड़कियों की थी। इसमें 18 वर्ष से नीचे की बालिकाएं रखी जाती थीं। इस केंद्र के लिए मानक करीब आठ हजार वर्ग फीट के भवन का है। बालिकाओं की देखरेख व अन्य कार्यों के लिए अधीक्षिका समेत 15 कर्मचारी होने चाहिए। आठ वर्ष से नीचे के बच्चों वाले शिशु गृह की क्षमता 25 की थी। इसमें भी 15 स्टॉफ होने चाहिए। 10 बच्चों की क्षमता वाले विशेष दत्तक ग्रहण इकाई के लिए 11 कर्मचारी और स्वाधार गृह में 15 का स्टॉफ स्वीकृत है। कागजों में प्रत्येक केंद्र के लिए अलग-अलग कर्मचारी भी कार्यरत हैं, मगर मौके पर सिर्फ एक संस्था के कर्मचारियों से ही सभी के काम कराए जाते हैं। शिशु गृह, विशेष दत्तक इकाई, बालिका गृह का संचालन एक ही भवन में हो रहा है, जबकि स्वाधार गृह शहर से रजला गांव में वृद्धाश्रम के भवन में संयुक्त रूप से चलता है। विभागीय सूत्रों के मुताबिक इन प्रोजेक्ट पर सालाना बजट 50 लाख से एक करोड़ तक का है। फंड पर रोक से पहले प्रत्येक केंद्र के लिए अलग-अलग किराया और स्टॉफ का वेतन-मानदेय दिया जाता रहा है। एक ही भवन में इन केंद्रों का संचालन भी नियमविरुद्ध है, बावजूद जिम्मेदार आंखें मूंदे रहे।
संस्था में बच्चों को रखने पर मौन थी बाल कल्याण समिति
गुमशुदा व भागी हुई किशोरियों को रखने के लिए समिति ही नामित करती है संस्था
अमर उजाला ब्यूरो
देवरिया। बच्चों के कल्याण और बेहतरी से जुड़े निर्णय लेने के लिए डेढ़ साल पहले जिले में गठित पांच सदस्यीय बाल कल्याण समिति की उपयोगिता भी इस मामले में जांच के दायरे में है। जिले की सीमा में किसी भी गुमशुदा या घर से भागी नाबालिग बच्ची के मिलने पर उसे सबसे पहले बाल कल्याण समिति के समक्ष ही पेश करना होता है। यह समिति ही तय करती है कि बच्चे को कहां और किस केंद्र में रखा जाएगा। संस्था नामित करने की जिम्मेदारी भी इसी समिति की है। जून 2017 के बाद जिले में सवा सौ से भी अधिक भूले-भटके बच्चे और किशोरियां पाई गईं। इनमें चंद को छोड़ दें तो ज्यादातर को मां विंध्यवासिनी संस्था में ही रखा गया है। अवैध संस्था में बच्चों को रखे जाने के बावजूद बाल कल्याण समिति की चुप्पी चर्चा में है। सूत्रों की मानें तो पांच सदस्यीय कमेटी के कई सदस्य संचालिका गिरिजा त्रिपाठी की सहयोगी हैं। यही कारण है कि नियम विरुद्ध होते हुए भी चुप्पी साध जाते थे। हालांकि समिति के अध्यक्ष श्रीकांत यादव इससे इन्कार करते हैं। उनका कहना है कि समिति पूरी सक्रियता से अपना काम करती रही है। कई बार पुलिस-प्रशासन को पत्र से अवगत कराया गया। बैठकों में भी कहा गया कि कोई नाबालिग बच्ची मिलने पर सबसे पहले समिति के समक्ष ही पेश करें, मगर इसे दरकिनार किया जाता रहा। पुलिस भी अक्सर समिति की जानकारी में लाए बगैर किशोरियों को बालगृह बालिका में पहुंचा देती थी।