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चित्रकूट को इको सेंसिटिव जोन घोषित किया जाय
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चित्रकूट। जिले के धार्मिक, एतिहासिक, पौराणिक स्थलों को संरक्षित किया जाना देश की सभ्यता और संस्कृति के लिए बहुत जरूरी है। ऐसे में ताज महल के आस पास के क्षेत्र की तर्ज पर यहां भी इको सेंसिटिव जोन घोषित किया जा सकता है। हालांकि चित्रकूट जिले के धार्मिक स्थल उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में विभाजित है लेकिन उत्तर प्रदेश में बालू व पत्थर खनन के ज्यादा उद्योग संचालित है। प्रदेश सरकार चित्रकूट के विकास के लिए परिषद् का गठन कर दिया है।
चित्रकूट में कुएं, भरतकूप, झरने, हनुमानधारा व नदियां जंगलों में ऋषियों के आश्रम, वनस्पतिया आदि का विशिष्ट स्थान है। इसलिए इनको संरक्षित करना बहुत आवश्यक है। क्योंकि आज ये सब बालू, सिलिका, पत्थर खनन व जंगल कटान के कारण नष्ट होने के कगार पर है। चित्रकूट के पहाड़ जिनका योगदान क्षेत्र की बारिश व जलवायु के संतुलन में होता है उनको भी बिना किसी पर्यावरणीय प्रबंधन के माइनिंग करके खत्म किया जा रहा है।
जिले के पर्यावरणविद गुंजन मिश्रा का मानना है कि चित्रकूट जिले की प्राकृतिक संसाधन एवं पर्यावरणीय वहन क्षमता का भी आकलन नहीं किया गया है यही वजह है कि मनमाने तरीके से संसाधनों का दोहन हो रहा है। गर्मी की लहर, असमय वर्षा का होना, जंगलों में आग, भूमिगत जल स्तर का गिरना की घटनाएं 1990 के बाद ज्यादा बढ़ गईं हैं । खनन व क्रशर जैसी औद्योगिक इकाइयां संचालित है। इसलिए पर्यावरणीय दृष्टि से चित्रकूट का उत्तर प्रदेश वाला क्षेत्र ज्यादा संवेदनशील है। चित्रकूट की चौरासी कोस परिक्रमा मार्ग के धार्मिक स्थलों को भी पर्यावरण के प्रति संवेदनशील क्षेत्र में भी घोषित किया जाय। पर्यावरणविद के अनुसार चित्रकूट इको सेंसिटिव जोन घोषित करने वाले क्षेत्र के सभी मानकों को पूरा करता है। इस क्षेत्र को पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील घोषित में करने किसी भी प्रकार कोई दिक्कत भी नहीं है।
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चित्रकूट में कुएं, भरतकूप, झरने, हनुमानधारा व नदियां जंगलों में ऋषियों के आश्रम, वनस्पतिया आदि का विशिष्ट स्थान है। इसलिए इनको संरक्षित करना बहुत आवश्यक है। क्योंकि आज ये सब बालू, सिलिका, पत्थर खनन व जंगल कटान के कारण नष्ट होने के कगार पर है। चित्रकूट के पहाड़ जिनका योगदान क्षेत्र की बारिश व जलवायु के संतुलन में होता है उनको भी बिना किसी पर्यावरणीय प्रबंधन के माइनिंग करके खत्म किया जा रहा है।
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जिले के पर्यावरणविद गुंजन मिश्रा का मानना है कि चित्रकूट जिले की प्राकृतिक संसाधन एवं पर्यावरणीय वहन क्षमता का भी आकलन नहीं किया गया है यही वजह है कि मनमाने तरीके से संसाधनों का दोहन हो रहा है। गर्मी की लहर, असमय वर्षा का होना, जंगलों में आग, भूमिगत जल स्तर का गिरना की घटनाएं 1990 के बाद ज्यादा बढ़ गईं हैं । खनन व क्रशर जैसी औद्योगिक इकाइयां संचालित है। इसलिए पर्यावरणीय दृष्टि से चित्रकूट का उत्तर प्रदेश वाला क्षेत्र ज्यादा संवेदनशील है। चित्रकूट की चौरासी कोस परिक्रमा मार्ग के धार्मिक स्थलों को भी पर्यावरण के प्रति संवेदनशील क्षेत्र में भी घोषित किया जाय। पर्यावरणविद के अनुसार चित्रकूट इको सेंसिटिव जोन घोषित करने वाले क्षेत्र के सभी मानकों को पूरा करता है। इस क्षेत्र को पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील घोषित में करने किसी भी प्रकार कोई दिक्कत भी नहीं है।
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