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विषम परिस्थितियों से जूझ कर व्यवसायिक वर्ग में किया टॉप
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फोटो- 8- रणजीत प्रजापति
- फोटो : CHITRAKUTT
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होनहार बेटे ने विषम परिस्थितियों से जूझते हुए सीआईसी में व्यावसायिक वर्ग के इस छात्र ने अपने संवर्ग में 84 प्रतिशत अंक पाकर जिला टॉप किया। इस बेटे का सपना है कि मां के बुढापे की लाठी बने तो मां उसे किसी मुकाम तक पहुंचाने के लिये हर जद्दोजहद उठाने को तैयार हैं।
मूलरूप से अशोह गांव निवासी बाबूलाल उर्फ बउवा प्रजापति की पांच संतानों में सबसे छोटा पुत्र रणजीत प्रजापति सीआईसी में इंटरमीडिएट व्यवसायिक आशुलिपि तथा टंकण का छात्र है। पिता मानसिक रूप अस्वस्थ हैं। तीन बेटियों और दो बेटों को पालने का जिम्मा मां देवमती ने अपने कंधों पर उठा लिया। कर्वी में वह पिछले तकरीबन 25 वर्षों से पटरी किनारे सिलाई मशीन रखकर सिलाई करती हैं। इसी के सहारे घर-परिवार चलता रहा।
तीन बेटियों की शादी हो गई और बडे़ बेटे मनोज प्रजापति ने भी मां का हाथ बटाने के लिये मजदूरी शुरू कर दी। अब इस घर की आशाओं का केंद्र छोटा बेटा रणजीत प्रजापति ही है। मां ने उसे पढ़ाया और इंटरमीडिएट व्यावसायिक वर्ग में उसने जिले को टॉप करके घर परिवार का नाम रोशन किया। रणजीत ने भी अपनी पढ़ाई के लिये मां के हाथों को मजबूत किया और बीच-बीच में समय निकालकर मेहनत मजदूरी की और कुछ पैसे जोड़े। घरों की पेंटिंग और पुताई में तो जैसे रणजीत को महारथ हासिल है। रणजीत खुद सचिवालय में स्टेनोग्राफर बनने की तमन्ना रखते हैं और चाहते हैं कि बुढ़ापे में वह मां और पिता की लाठी बनें।
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मूलरूप से अशोह गांव निवासी बाबूलाल उर्फ बउवा प्रजापति की पांच संतानों में सबसे छोटा पुत्र रणजीत प्रजापति सीआईसी में इंटरमीडिएट व्यवसायिक आशुलिपि तथा टंकण का छात्र है। पिता मानसिक रूप अस्वस्थ हैं। तीन बेटियों और दो बेटों को पालने का जिम्मा मां देवमती ने अपने कंधों पर उठा लिया। कर्वी में वह पिछले तकरीबन 25 वर्षों से पटरी किनारे सिलाई मशीन रखकर सिलाई करती हैं। इसी के सहारे घर-परिवार चलता रहा।
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तीन बेटियों की शादी हो गई और बडे़ बेटे मनोज प्रजापति ने भी मां का हाथ बटाने के लिये मजदूरी शुरू कर दी। अब इस घर की आशाओं का केंद्र छोटा बेटा रणजीत प्रजापति ही है। मां ने उसे पढ़ाया और इंटरमीडिएट व्यावसायिक वर्ग में उसने जिले को टॉप करके घर परिवार का नाम रोशन किया। रणजीत ने भी अपनी पढ़ाई के लिये मां के हाथों को मजबूत किया और बीच-बीच में समय निकालकर मेहनत मजदूरी की और कुछ पैसे जोड़े। घरों की पेंटिंग और पुताई में तो जैसे रणजीत को महारथ हासिल है। रणजीत खुद सचिवालय में स्टेनोग्राफर बनने की तमन्ना रखते हैं और चाहते हैं कि बुढ़ापे में वह मां और पिता की लाठी बनें।
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