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67 साल की आजादी में हमारा सिविक सेंस जीरो
Chitrakoot
Updated Mon, 12 Aug 2013 05:35 AM IST
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अराजकता और स्वच्छंदता में खोज रहे आजादी का मतलब
चित्रकूट। हम आजादी की 66 वीं वर्षगांठ मनाने जा रहे हैं। पर आजादी के इस उल्लास में बात सिर्फ अधिकारों की है। हमारा कर्तव्य क्या है? क्या हम एक जिम्मेदार नागरिक के कर्तव्यों से वाकिफ हैं और उसे निभा रहे हैं? इस सवाल पर खामोशी है। हवस सिर्फ अधिकारों की है। किसी तरह से अपना काम होना चाहिए इसके लिए चाहे जितने लोगों की दिक्कतें बढ़ जाएं कोई फिक्र नहीं। हमारा ‘सिविक सेंस’ तो खत्म सा हो गया है। इसकी बानगी घर से निकलते ही दिखने लगती है। सार्वजनिक स्थलों पर अराजकता का आलम है। सड़कों पर चलना जंग के मैदान से भी दुष्कर है। इश्तहार लिखकर जिस बात की मनाही की जाती है वही काम लोग सीना ठोंककर करते नजर आते हैं। ट्रैफिक सेंस तो है ही नहीं। जब तक ट्रैफिक सिपाही का डंडा नहीं उठता कोई रुकने का नाम नहीं लेता। जो रसूख वाले हैं वे ट्रैफिक वाले चौराहों पर रोके जाना अपनी तौहीन समझते हैं। सारी पॉवर वहीं दिखा दी जाती है। उन्हें शर्म भी नहीं आती। उनकी नजर में आजादी का मतलब स्वच्छंदता है। ऐसी स्वच्छंदता जो दूसरे को पीड़ा पहुंचाए और उन्हें सुख। कितना भोंडा होता जा रहा है हमारा सिविक सेंस। हमें यह नहीं पता कि आजादी के साथ अनुशासन का होना अनिवार्य होता है। बिना अनुशासन के आजादी उच्छृंखलता में बदल जाती है जिससे ढेर सारे अनर्थ होते हैं। इससे समाज में अराजकता को बढ़ावा मिलता है। आजादी की वर्षगांठ पर आम जन के सिविक सेंस की पड़ताल करती रिपोर्ट-
- कर्वी से राजापुर मार्ग पर पड़ने वाली रेलवे क्रासिंग के बंद होने बाद जनपद के लोगों में इतना भी सब्र नहीं रहा कि वो क्रासिंग खुलने का इंतजार कर सकें। लोग बंद फाटक से इतनी तेजी से मोटरसाइकिलें तक झुका कर मुस्कुराते हुए निकलते हैं। कभी कभी तो गाड़ी आने लगती है और उसकी पटरी पर भी मोटरसाइकिलें खड़ी रहती हैं। अगर किसी से नियमों के उल्लंघन पर बात की जाती है तो लोग अपना नाम तो बताते नहीं, इतना जरुर कहते हैं किसके पास इंतजार करने को इतना समय है।
- रेलवे क्रासिंग पर ट्रेन निकलने के बाद भी मोटरसाइकिलों के पूरी सड़क पर मोटरसाइकिलों के खड़े हो जाने से लोगों को जाम से निकलने के बाद भी लगभग पंद्रह मिनट तक जाम से भी जूझते हैं लेकिन लोगों के मन में दो मिनट के लिए इंतजार का सब्र नहीं है। जबकि आगे निकले की होड़ में सभी अपना लगभग दस से पंद्रह मिनट समय बर्बाद कर देते हैं।
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- रेलवे स्टेशन में साइकिल ले जाना मना होने के बाद भी तीन-चार साइकिलें रेलवे स्टेशन के इधर उधर पाई गई। रेलवे में मनाही के बाद भी कुछ लोग रेलवे प्लेटफार्म पर मोटरसाइकिल व साइकिल चलाते है वहीं काफी संख्या में लोग बिना बुकिंग के साइकिलें ट्रेन में लादकर सफर भी करते हैं।
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चित्रकूट। हम आजादी की 66 वीं वर्षगांठ मनाने जा रहे हैं। पर आजादी के इस उल्लास में बात सिर्फ अधिकारों की है। हमारा कर्तव्य क्या है? क्या हम एक जिम्मेदार नागरिक के कर्तव्यों से वाकिफ हैं और उसे निभा रहे हैं? इस सवाल पर खामोशी है। हवस सिर्फ अधिकारों की है। किसी तरह से अपना काम होना चाहिए इसके लिए चाहे जितने लोगों की दिक्कतें बढ़ जाएं कोई फिक्र नहीं। हमारा ‘सिविक सेंस’ तो खत्म सा हो गया है। इसकी बानगी घर से निकलते ही दिखने लगती है। सार्वजनिक स्थलों पर अराजकता का आलम है। सड़कों पर चलना जंग के मैदान से भी दुष्कर है। इश्तहार लिखकर जिस बात की मनाही की जाती है वही काम लोग सीना ठोंककर करते नजर आते हैं। ट्रैफिक सेंस तो है ही नहीं। जब तक ट्रैफिक सिपाही का डंडा नहीं उठता कोई रुकने का नाम नहीं लेता। जो रसूख वाले हैं वे ट्रैफिक वाले चौराहों पर रोके जाना अपनी तौहीन समझते हैं। सारी पॉवर वहीं दिखा दी जाती है। उन्हें शर्म भी नहीं आती। उनकी नजर में आजादी का मतलब स्वच्छंदता है। ऐसी स्वच्छंदता जो दूसरे को पीड़ा पहुंचाए और उन्हें सुख। कितना भोंडा होता जा रहा है हमारा सिविक सेंस। हमें यह नहीं पता कि आजादी के साथ अनुशासन का होना अनिवार्य होता है। बिना अनुशासन के आजादी उच्छृंखलता में बदल जाती है जिससे ढेर सारे अनर्थ होते हैं। इससे समाज में अराजकता को बढ़ावा मिलता है। आजादी की वर्षगांठ पर आम जन के सिविक सेंस की पड़ताल करती रिपोर्ट-
- कर्वी से राजापुर मार्ग पर पड़ने वाली रेलवे क्रासिंग के बंद होने बाद जनपद के लोगों में इतना भी सब्र नहीं रहा कि वो क्रासिंग खुलने का इंतजार कर सकें। लोग बंद फाटक से इतनी तेजी से मोटरसाइकिलें तक झुका कर मुस्कुराते हुए निकलते हैं। कभी कभी तो गाड़ी आने लगती है और उसकी पटरी पर भी मोटरसाइकिलें खड़ी रहती हैं। अगर किसी से नियमों के उल्लंघन पर बात की जाती है तो लोग अपना नाम तो बताते नहीं, इतना जरुर कहते हैं किसके पास इंतजार करने को इतना समय है।
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- रेलवे क्रासिंग पर ट्रेन निकलने के बाद भी मोटरसाइकिलों के पूरी सड़क पर मोटरसाइकिलों के खड़े हो जाने से लोगों को जाम से निकलने के बाद भी लगभग पंद्रह मिनट तक जाम से भी जूझते हैं लेकिन लोगों के मन में दो मिनट के लिए इंतजार का सब्र नहीं है। जबकि आगे निकले की होड़ में सभी अपना लगभग दस से पंद्रह मिनट समय बर्बाद कर देते हैं।
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- रेलवे स्टेशन में साइकिल ले जाना मना होने के बाद भी तीन-चार साइकिलें रेलवे स्टेशन के इधर उधर पाई गई। रेलवे में मनाही के बाद भी कुछ लोग रेलवे प्लेटफार्म पर मोटरसाइकिल व साइकिल चलाते है वहीं काफी संख्या में लोग बिना बुकिंग के साइकिलें ट्रेन में लादकर सफर भी करते हैं।