कंदवा। बच्चे की प्रथम गुरु मां होती है। वह जैसा संस्कार बच्चे को देती है, उसी प्रकार वह बन जाता है। धुंधकारी की मां धुंधली के स्वभाव का बुरा प्रभाव धुंधकारी पर पड़ा। ये बातें चिरईगांव में चल रहे चातुर्मास यज्ञ के दौरान मंगलवार को त्रिदंडी स्वामी के शिष्य सुंदर राज जी महाराज ने श्रद्धालुओं को कथा का रसपान कराते हुए कही। उन्होंने ने कहा कि कथा की सार्थकता तब सिद्ध होती है, जब इसे हम अपने जीवन में व्यवहार में धारण कर निरंतर हरि स्मरण करते हुए अपने जीवन को आनंदमय व मंगलमय बनाकर अपना आत्म कल्याण करें। अन्यथा यह कथा केवल मनोरंजन व कानों के रस तक ही सीमित रह जाएगी। कहा कि भागवत कथा से मन का शुद्धिकरण होता है। इससे संशय दूर होता है और शांति व मुक्ति मिलती है। श्रीमद्भागवत कथा के श्रवण से जन्म जन्मांतर के विकार नष्ट होकर प्राणी मात्र का लौकिक व आध्यात्मिक विकास होता है। जहां अन्य युगों में धर्म लाभ एवं मोक्ष प्राप्ति के लिए कड़े प्रयास करने पड़ते हैं, वहीं कलियुग में कथा सुनने मात्र से व्यक्ति भवसागर से पार हो जाता है। कथा को विस्तार देते हुए कहा कि आत्मदेव के दो पुत्र हुए-एक का नाम धुंधकारी और दूसरे का नाम गोकर्ण था। गोकर्ण पिता की छत्र छाया में पले-बढ़े और आगे चलकर वह परम विद्वान व हरि भक्त हुए। वहीं धुंधकारी अपनी मां धुंधली के लाड़-प्यार में पूरी तरह बिगड़ गया और आगे चलकर बहुत बड़ा दुराचारी हुआ। उसके पाप कृत्य से दु:खी होकर पिता आत्मदेव तो संतों की संगति में चले गए। वहीं मां धुंधली को वह पैसे के लिए मारने-पीटने लगा। एक दिन रात में घर छोड़कर भागते समय कूप में गिर कर उसकी मौत हो गई। इस दौरान माधुरी सिंह, उषा पांडेय, पूनम सिंह, ममता सिंह, संत विलास सिंह, नरेंद्र, संतोष, वीर प्रताप रहे।