धानापुर। इंद्रियों के दमन से व्यक्ति यशस्वी बनता है और धर्म की रक्षा करने वालों की रक्षा धर्म करता है। विपरीत परिस्थितियों में विवेक से निर्णय लेने पर भविष्य कलंकित नहीं होता है। ये बातें श्रीलक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी ने बुढ़ेपुर में चल रहे चातुर्मास्य ज्ञान यज्ञ में कही।
उन्होंने भागवत कथा के प्रसंग में इंद्रियों के निग्रह की चर्चा करते हुए कहा कि इंद्रियों को स्वतंत्र छोड़ देने से पतन निश्चित होता है। एक बार अर्जुन इंद्रलोक गए जहां उर्वशी नामक अप्सरा का नृत्य हो रहा था। नृत्य के बाद अर्जुन शयन कक्ष में चले गए तो उर्वशी उनके पास चली गई। अर्जुन ने आने का कारण पूछा तो उर्वशी ने वैवाहिक गृहस्थ धर्म स्वीकार करने का आग्रह किया। अर्जुन ने मृत्युलोक की मर्यादा कलंकित नहीं करने की बात कही तो उर्वशी ने उन्हें एक वर्ष तक नपुंसक बनने का शाप दे दिया। अर्जुन ने शाप तो ले लिया पर अपयश लेकर नहीं लौटे। आगे चलकर उर्वशी का शाप उनके अज्ञातवास में वरदान सिद्ध हुआ। आगे कहा कि जो धर्म की रक्षा करता है, उसकी रक्षा धर्म करता है जबकि धर्म की हत्या करने वालों की धर्म हत्या कर देता है। इसलिए किसी भी परिस्थिति में धर्म का परित्याग नहीं करना चाहिए। कहा कि जो पाप, अज्ञानता और दुख का हरण करे वो ही हरि है। वेदांत दर्शन के अनुसार संसार में आने का मतलब इसमें रहना नहीं है। परिवर्तन का नाम संसार है। आश्चर्य है कि ऐसा जानकर भी जीव ईश्वर को भूलकर नश्वर संसार में आसक्त हो जाता है।