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हथकरघे पड़े हैं ठप
चंदौली ब्यूरो, अमर उजाला
Updated Sun, 20 Nov 2016 01:03 AM IST
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करघे के पास बेकार बैठीं महिलाएं।
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बड़े नोटो के बंद होने का असर बुनकरों पर पड़ा है। स्थिति यह है कि हजारो बुनकरों के सामने भुखमरी की स्थिति आ गई है। आंकलन के मुताबिक करीब 75 प्रतिशत व्यवसाय प्रभावित हुआ है। पहले तीन माह तक बारिश और जल जमाव की वजह से हथकरघा बंद रहा और अब नोट बंदी की वजह से बुनकरों के सामने खाने के लाले पड़ गए हैं।
जिले में आठ हजार पंजीकृत और तीन से चार हजार बिना पंजीकृत बुनकर हैं। इस तरह 12 हजार बुनकर हैं तथा इन पर आश्रित साठ हजार परिवार के सदस्य हैं। बुनकरों की सर्वाधिक संख्या दुलहीपुर, महाबलपुर, सतपोखरी, बिसौरी, मलोखर, शकूराबाद, शकूर का भट्ठा आदि गांवों में रहती है। आम तौर पर कम पढ़े लिखे बुनकरों तक अभी तक सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं पहुंचा है। यही कारण है कि सभी बैंक खाता धारक भी नहीं है। गांवों में अविकसित नई कालोनियां बसने की वजह से पानी निकासी की व्यवस्था ठप है। ऐसे में बारिश होते ही दुलहीपुर इलाके में पानी भर गया। बाढ़ की वजह से हथकरघा बंद हो गया।
पानी निकलने के बाद बुनकरों ने काम धाम शुरू किया लेकिन आठ नवंबर को नोट बंदी की घोषणा हो गई। इससे बुनकरों पर मानों वज्रपात ही हुआ है। शिक्षा की कमी की वजह से यहां पूरा काम नकदी पर ही होता है। पुरुष सदस्य जहां कालीन और साड़ी बुनाई का काम करते हैं वहीं महिलाएं और लड़कियां कढ़ाई आदि का काम करती हैं। यह पूरा काम वाराणसी के सेठों के जरिए मिलता है, लेकिन नोट बंदी के बाद से काम मिलना पूरी तरह बंद हो गया है। इस बावत सतपोखरी के प्रधान हमीदुल्ला अंसारी ने बताया कि नोट एक्सचेंज की शुरूआत की गई लेकिन एक सप्ताह बाद ही इसे भी बैंकों ने बंद कर दिया। ऐसे में बुनकरों को मुश्किल का सामना करना पड़ रहा है। वहीं मोहम्मद सोएब और रियाज ने बताया कि जब से नोट बंदी हुई है तब से हम लोग बैंक के ही चक्कर काट रहे हैं। पुराने नोट चल नहीं रहे हैं और नए नोट मिल नहीं रहे हैं।ऐसे में समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर परिवार का पेट कैसे चलाया जाए। वहीं नसीम अहमद ने बताया कि जब से पांच और हजार रुपये के नोट बंद हुए हैं तब से काम नहीं रह गया है।
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जिले में आठ हजार पंजीकृत और तीन से चार हजार बिना पंजीकृत बुनकर हैं। इस तरह 12 हजार बुनकर हैं तथा इन पर आश्रित साठ हजार परिवार के सदस्य हैं। बुनकरों की सर्वाधिक संख्या दुलहीपुर, महाबलपुर, सतपोखरी, बिसौरी, मलोखर, शकूराबाद, शकूर का भट्ठा आदि गांवों में रहती है। आम तौर पर कम पढ़े लिखे बुनकरों तक अभी तक सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं पहुंचा है। यही कारण है कि सभी बैंक खाता धारक भी नहीं है। गांवों में अविकसित नई कालोनियां बसने की वजह से पानी निकासी की व्यवस्था ठप है। ऐसे में बारिश होते ही दुलहीपुर इलाके में पानी भर गया। बाढ़ की वजह से हथकरघा बंद हो गया।
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पानी निकलने के बाद बुनकरों ने काम धाम शुरू किया लेकिन आठ नवंबर को नोट बंदी की घोषणा हो गई। इससे बुनकरों पर मानों वज्रपात ही हुआ है। शिक्षा की कमी की वजह से यहां पूरा काम नकदी पर ही होता है। पुरुष सदस्य जहां कालीन और साड़ी बुनाई का काम करते हैं वहीं महिलाएं और लड़कियां कढ़ाई आदि का काम करती हैं। यह पूरा काम वाराणसी के सेठों के जरिए मिलता है, लेकिन नोट बंदी के बाद से काम मिलना पूरी तरह बंद हो गया है। इस बावत सतपोखरी के प्रधान हमीदुल्ला अंसारी ने बताया कि नोट एक्सचेंज की शुरूआत की गई लेकिन एक सप्ताह बाद ही इसे भी बैंकों ने बंद कर दिया। ऐसे में बुनकरों को मुश्किल का सामना करना पड़ रहा है। वहीं मोहम्मद सोएब और रियाज ने बताया कि जब से नोट बंदी हुई है तब से हम लोग बैंक के ही चक्कर काट रहे हैं। पुराने नोट चल नहीं रहे हैं और नए नोट मिल नहीं रहे हैं।ऐसे में समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर परिवार का पेट कैसे चलाया जाए। वहीं नसीम अहमद ने बताया कि जब से पांच और हजार रुपये के नोट बंद हुए हैं तब से काम नहीं रह गया है।
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