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बंदी के कगार पर कोयला मंडी
चंदौली ब्यूरो, अमर उजाला
Updated Sat, 17 Dec 2016 12:50 AM IST
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मंडी में खड़ी ट्रकें।
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कोयला मंडी चंदासी नोटबंदी की वजह से बंद होने की कगार पर पहुंच गई है। व्यापारी खाली बैठ कर ताश खेल रहे हैं। कभी ट्रकों से गुलजार रहने वाली मंडी पूरी तरह से खाली नजर आ रही है। देश भर में लगातार हो रही छापेमारी का भी डर व्यापारियों को सता रहा है। व्यापारियों के अनुसार इसके पहले 1978 में मंडी में ऐसी मंदी आयी थी, लेकिन इस बार का असर उससे भी व्यापक है।
मंडी में पांच हजार से अधिक डिपो हैं। वहीं चार से पांच हजार कमीशन एजेंट, तीन से चार हजार व्यापारी और इतने ही ट्रांसपोर्टर है जबकि दस हजार मजदूर हैं। इस तरह कुल 25 हजार से अधिक लोगों की रोजी रोटी मंडी पर आधारित है। पांच सौ और हजार रुपये के नोट के चलन के बाहर होने के तुरंत बाद तो इसका असर नहीं दिख रहा है। अब इसका असर मंडी में दिख रहा है। पिछले एक सप्ताह से स्थिति यह है कि मंडी में ट्रकों का आना बंद हो गया है। व्यापारियों के अनुसार जिन्हें कोयला दिया गया है वहां भुगतान अटक गया है। कोयला व्यापारी अजय सिंह कहते हैं कि मंडी के पहले से ही दुर्दिन चल रहे हैं नोट बंदी के बाद तो अब व्यापारियों के पलायन की स्थिति आ गई है। गुलाब यादव की माने तो वर्ष 1978 में कमिश्नर भूरे लाल ने मंडी में छापेमारी की थी। लेकिन छापेमारी के बाद दो माह तक मंडी में सियापा छाया था। इसके बाद मंडी संभल गई थी और हालात ठीक हो गए थे। पिछले एक दशक से रेलवे से कोयला ढुलाई के बाद स्थिति कुछ बिगड़ी लेकिन दाल रोटी चल रही थी लेकिन नोटबंदी के बाद तो मंडी बंदी के कगार पर पहुंच गया है। बिहार से आए मजदूर तो पहले ही पलायित हो चुके हैं।
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मंडी में पांच हजार से अधिक डिपो हैं। वहीं चार से पांच हजार कमीशन एजेंट, तीन से चार हजार व्यापारी और इतने ही ट्रांसपोर्टर है जबकि दस हजार मजदूर हैं। इस तरह कुल 25 हजार से अधिक लोगों की रोजी रोटी मंडी पर आधारित है। पांच सौ और हजार रुपये के नोट के चलन के बाहर होने के तुरंत बाद तो इसका असर नहीं दिख रहा है। अब इसका असर मंडी में दिख रहा है। पिछले एक सप्ताह से स्थिति यह है कि मंडी में ट्रकों का आना बंद हो गया है। व्यापारियों के अनुसार जिन्हें कोयला दिया गया है वहां भुगतान अटक गया है। कोयला व्यापारी अजय सिंह कहते हैं कि मंडी के पहले से ही दुर्दिन चल रहे हैं नोट बंदी के बाद तो अब व्यापारियों के पलायन की स्थिति आ गई है। गुलाब यादव की माने तो वर्ष 1978 में कमिश्नर भूरे लाल ने मंडी में छापेमारी की थी। लेकिन छापेमारी के बाद दो माह तक मंडी में सियापा छाया था। इसके बाद मंडी संभल गई थी और हालात ठीक हो गए थे। पिछले एक दशक से रेलवे से कोयला ढुलाई के बाद स्थिति कुछ बिगड़ी लेकिन दाल रोटी चल रही थी लेकिन नोटबंदी के बाद तो मंडी बंदी के कगार पर पहुंच गया है। बिहार से आए मजदूर तो पहले ही पलायित हो चुके हैं।
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