इंसान के जीवन में आने वाली विपत्तियां ही उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं। जो व्यक्ति परिस्थितियों से लड़ता है और अपने सिद्धांतों तथा सच्चाई के लिए हर तरह की कुर्बानी देने को तैयार रहता है। वही जीवन में श्रेष्ठ मनुष्य बनता है। यह बातें नगर के अज़ाखाना-ए-रज़ा में आयोजित मुहर्रम की सातवीं मजलिस में मौलाना जाफर रिजवी ने कहीं। उन्होंने पैगंबर इब्राहिम की कुर्बानी का जिक्र करते हुए कहा कि अल्लाह के हुक्म पर जनाब इब्राहिम अपने बेटे को कुर्बान करने के लिए तैयार हो गए थे। उसी तरह लगभग चौदह सौ वर्ष पहले इमाम हुसैन ने इंसानियत, न्याय और सच्चाई की रक्षा के लिए करबला में अजीमुश्शान कुर्बानी पेश की, जिसके कारण आज भी पूरी दुनिया उन्हें श्रद्धा और सम्मान के साथ याद करती है।
मौलाना जाफर रिजवी ने कहा कि कर्बला का संदेश केवल मुसलमानों के लिए नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत के लिए है। इमाम हुसैन ने अत्याचार और अन्याय के सामने झुकने के बजाय सत्य का रास्ता चुना और यह सिखाया कि इंसान को हर परिस्थिति में अपने उसूलों पर कायम रहना चाहिए। उन्होंने भारतीय सभ्यता और संस्कृति की सराहना करते हुए कहा कि हिंदुस्तान की पहचान सदियों से भाईचारे, सहिष्णुता और जियो और जीने दो की भावना रही है। वसुधैव कुटुंबकम का सिद्धांत इस देश की महान परंपरा का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि यही कारण है कि भारत हमेशा से दुनिया के लिए शांति और मानवता का संदेश देने वाला देश रहा है। इमाम हुसैन खुद हिंदुस्तान आना चाहते थे लेकिन उन्हें कर्बला में शहीद कर दिया गया। मजलिस के बाद बनारस से आई अंजुमन-ए-हाशमिया के प्रसिद्ध नौहाख्वान अनवर साहब ने नौहा पढ़कर इमाम हुसैन और उनके कुनबे को खिराज़े अकीदत पेश की। मिर्जापुर से आए मौलाना शहंशाह मिर्जापुरी ने अपने कलामे के जरिये कर्बला के मंजर पेश किए। लखनऊ से पधारे प्रसिद्ध शायर वकार सुल्तानपुरी ने अपने तरही कलामों के माध्यम से अज़ादारों को इमाम हुसैन का पुरसा पेश किया। अज़ाखाना-ए-रज़ा के प्रबंधक डॉ. एसजी. इमाम ने बताया कि मुहर्रम की आठवीं तारीख बुधवार को परंपरागत दुलदुल का जुलूस निकाला जाएगा। इस अवसर पर डॉ. सैयद गजंफर इमाम, सरवर, साजिद, शाहिद बनारसी, सफदर अली, मुस्तफा, कौसर अली, रेयाज अहमद मौजूद रहे।