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आकांक्षाओं की पूर्ति करता है श्रीमद्भागवत महापुराण
Updated Wed, 26 Sep 2018 12:16 AM IST
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पीडीडीयू नगर। श्रीमद्भागवत महापुराण मानव की आकांक्षाओं की पूर्ति का कल्पवृक्ष है। संसार रूपी भवसागर से पार पाने के लिए यही तरणहार व नौका है। श्रीमद्भागवत भगवान श्री हरि का ही अंग है।
ये बातें नगर के पराहुपुर में चल रही भा्रवत कथा के दौरान सोमवार को सातवें और अंतिम दिन कथावाचक पं. सुरेंद्रनाथ तिवारी ने कहीं। उन्होंने कहा कि भागवत कथा मनुष्य की अज्ञानता को समाप्त कर उनमें ज्ञान रूपी तत्व का संचार करती है। सुदामा चरित का वर्णन करते हुए कहा कि सुदामा बाल्यकाल में गुरु संदीपन जी के आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने पहुंचे। उस समय के नियमों के अनुसार शिष्यों को भोजन बनाने व अन्य कार्यों के लिए जंगल से लकड़ियां लानी पड़ती थीं। एक दिन गुरु माता ने सुदामा जी को श्रीकृष्ण के साथ लकड़ी लाने जंगल में भेजा। जाते समय सुदामा को एक मुट्ठी चना दिया और कहा कि भूख लगने पर दोनों गुरुभाई खा लेना। जंगल में श्रीकृष्ण एक पेड़ पर लकड़ियां तोड़ने चढ़ गए। उसी समय तेज आंधी आ गई। श्रीकृष्ण ऊपर पेड़ की एक डाल से चिपके रहे और सुदामा भूख लगने पर चने खाने लगे। चने खाने की आवाज सुन कृष्ण ने इसके बारे में पूछा। सुदामा ने कहा कि यह ठंड से कटकटा रहे उनके दांतों की आवाज है। अंतर्यामी श्रीकृष्ण ने सुदामा के झूठ को जान लिया और सुदामा को गरीबी का श्राप दे डाला। शिक्षा पूरी होने के बाद दोनों वापस लौट गए। गरीबी में जी रहे सुदामा से उनकी पत्नी सुशीला ने द्वारिकाधीश के पास जाने की सलाह दी। पत्नी के बार- बार कहने पर एक पोटली में चावल लेकर सुदामा श्रीकृष्ण से मिलने पहुंचे। आदर- सत्कार के बाद जब श्रीकृष्ण ने पूछा कि भाभी ने मेरे लिए क्या भेजा है तो महल की चकाचौंध से डरे सुदामा चावल छिपाने लगे पर कृष्ण ने उन्हें ऐसा करते देख लिया। वे सुदामा से चावल लेकर खाने लगे। दो मुट्ठी चावल खाने के बाद जब भगवान ने तीसरी मुट्ठी में चावल उठाया तो वहां खड़ी रुक्मिणी ने उन्हें रोक दिया। बोलीं, दो लोक तो आप इन्हें दे ही चुके हैं, अब तीसरा भी दे दिया तो स्वयं कहां रहेंगे। इसपर श्रीकृष्ण रुक गए। कहा, कथा से यही सीख मिलती है कि भगवान अपने भक्तों की सहायता व उनपर कृपाकरते हैं। इस मौके पर भारी संख्या में श्रोता उपस्थित थे।
ये बातें नगर के पराहुपुर में चल रही भा्रवत कथा के दौरान सोमवार को सातवें और अंतिम दिन कथावाचक पं. सुरेंद्रनाथ तिवारी ने कहीं। उन्होंने कहा कि भागवत कथा मनुष्य की अज्ञानता को समाप्त कर उनमें ज्ञान रूपी तत्व का संचार करती है। सुदामा चरित का वर्णन करते हुए कहा कि सुदामा बाल्यकाल में गुरु संदीपन जी के आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने पहुंचे। उस समय के नियमों के अनुसार शिष्यों को भोजन बनाने व अन्य कार्यों के लिए जंगल से लकड़ियां लानी पड़ती थीं। एक दिन गुरु माता ने सुदामा जी को श्रीकृष्ण के साथ लकड़ी लाने जंगल में भेजा। जाते समय सुदामा को एक मुट्ठी चना दिया और कहा कि भूख लगने पर दोनों गुरुभाई खा लेना। जंगल में श्रीकृष्ण एक पेड़ पर लकड़ियां तोड़ने चढ़ गए। उसी समय तेज आंधी आ गई। श्रीकृष्ण ऊपर पेड़ की एक डाल से चिपके रहे और सुदामा भूख लगने पर चने खाने लगे। चने खाने की आवाज सुन कृष्ण ने इसके बारे में पूछा। सुदामा ने कहा कि यह ठंड से कटकटा रहे उनके दांतों की आवाज है। अंतर्यामी श्रीकृष्ण ने सुदामा के झूठ को जान लिया और सुदामा को गरीबी का श्राप दे डाला। शिक्षा पूरी होने के बाद दोनों वापस लौट गए। गरीबी में जी रहे सुदामा से उनकी पत्नी सुशीला ने द्वारिकाधीश के पास जाने की सलाह दी। पत्नी के बार- बार कहने पर एक पोटली में चावल लेकर सुदामा श्रीकृष्ण से मिलने पहुंचे। आदर- सत्कार के बाद जब श्रीकृष्ण ने पूछा कि भाभी ने मेरे लिए क्या भेजा है तो महल की चकाचौंध से डरे सुदामा चावल छिपाने लगे पर कृष्ण ने उन्हें ऐसा करते देख लिया। वे सुदामा से चावल लेकर खाने लगे। दो मुट्ठी चावल खाने के बाद जब भगवान ने तीसरी मुट्ठी में चावल उठाया तो वहां खड़ी रुक्मिणी ने उन्हें रोक दिया। बोलीं, दो लोक तो आप इन्हें दे ही चुके हैं, अब तीसरा भी दे दिया तो स्वयं कहां रहेंगे। इसपर श्रीकृष्ण रुक गए। कहा, कथा से यही सीख मिलती है कि भगवान अपने भक्तों की सहायता व उनपर कृपाकरते हैं। इस मौके पर भारी संख्या में श्रोता उपस्थित थे।
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