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शहीद वीर नरायन और सोना खान को याद किया
Updated Wed, 20 Dec 2017 01:17 AM IST
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मुगलसराय। भारत वर्षीय गोंड आदिवासी महासभा (समिति) की परशुरामपुर स्थित केंद्रीय कार्यालय पर हुई बैठक में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 के अमर शहीद वीरनरायन सिंह और सोनाखान को याद किया। इस दौरान उनके वीरता पर चर्चा की गई और उनके बताए मार्ग पर चलने का आह्वान किया।
कार्यक्रम की शुरूआत वीरनरायन और सोना खान के चित्र पर माल्यार्पण कर हुआ। इस मौके पर हुई गोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि 1857 में गोंडवाना (वर्तमान में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़) में वीरनरायन और सोनाखान का शौर्य और स्वबलिदान जग प्रसिद्ध है। कहा कि 1856 में इलाके में भयंकर सूखा पड़ा। फसल न होने की वजह से चहुंओर भुख मरी की स्थिति हो गई। इस स्थिति से विचलित वीरनारायन सिंह ने लोगों की सभा बुलाई। इसमें लोगों ने वीरनरायन सिंह का नेतृत्व स्वीकार किया। इसके बाद सामंतवाद और शोषण के खिलाफ वीरनरायन के नेतृत्व में विद्रोह का बिगुल फूंका गया। अंग्रेजों ने दमनात्मक कार्रवाई शुरू की। वीरनरायन पकड़ लिए गए, 10 दिसंबर 1857 को वीर नरायन को तोप के आगे बांधकर गोला दाग दिया। यही नहीं लोगों में आतंक फैलाने के लिए दस दिन तक उनके शव को लटकाए रखा। 19 दिसंबर 1857 को परिवार वालों को शव सौंपा गया। इस घटना के बाद ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ विद्रोह की ज्वाला भड़क उठी। इस मौके पर प्यारेलाल, श्रीकृष्ण गोंड, रविशंकर, प्रमोद गोंड, रमाशंकर, सुरेश गोंड, राजकुमार, रामाआधार गोंड, बाबूलाल, लल्लन लाल, प्रह्लाद, सुदामा, हरिश्चंद्र, विजयी, सिकंदर, संतोष आदि उपस्थित रहे।
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कार्यक्रम की शुरूआत वीरनरायन और सोना खान के चित्र पर माल्यार्पण कर हुआ। इस मौके पर हुई गोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि 1857 में गोंडवाना (वर्तमान में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़) में वीरनरायन और सोनाखान का शौर्य और स्वबलिदान जग प्रसिद्ध है। कहा कि 1856 में इलाके में भयंकर सूखा पड़ा। फसल न होने की वजह से चहुंओर भुख मरी की स्थिति हो गई। इस स्थिति से विचलित वीरनारायन सिंह ने लोगों की सभा बुलाई। इसमें लोगों ने वीरनरायन सिंह का नेतृत्व स्वीकार किया। इसके बाद सामंतवाद और शोषण के खिलाफ वीरनरायन के नेतृत्व में विद्रोह का बिगुल फूंका गया। अंग्रेजों ने दमनात्मक कार्रवाई शुरू की। वीरनरायन पकड़ लिए गए, 10 दिसंबर 1857 को वीर नरायन को तोप के आगे बांधकर गोला दाग दिया। यही नहीं लोगों में आतंक फैलाने के लिए दस दिन तक उनके शव को लटकाए रखा। 19 दिसंबर 1857 को परिवार वालों को शव सौंपा गया। इस घटना के बाद ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ विद्रोह की ज्वाला भड़क उठी। इस मौके पर प्यारेलाल, श्रीकृष्ण गोंड, रविशंकर, प्रमोद गोंड, रमाशंकर, सुरेश गोंड, राजकुमार, रामाआधार गोंड, बाबूलाल, लल्लन लाल, प्रह्लाद, सुदामा, हरिश्चंद्र, विजयी, सिकंदर, संतोष आदि उपस्थित रहे।
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