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डिजाइनर दीयों से बाजारों की बढ़ी रौनक
Updated Sat, 03 Nov 2018 12:56 AM IST
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पीडीडीयू नगर। दीवाली नजदीक आते ही इस पर्व से जुड़े आइटम बाजारों में आ गए हैं। बाजारों में विभिन्न प्रकार के कलात्मक मिट्टी के दीयों से बाजार सजने लगे हैं। चंदौली, चकिया, सकलडीहा, पीडीडीयू नगर सहित ग्रामीण इलाकों के कस्बों में इन दीयों से रौनक बढ़ने लगी है। महंगाई का असर भी इन दीयों पर साफ दिख रहा है। इसके चलते दीये महंगे भी मिल रहे हैं।
बाजार में डिजाइनर दीये 60 रुपये में 100 और सामान्य दीये की कीमत 40 रुपये में 100 है। दुकानदार रमेश का कहना है कि दीवाली पर सामान्य दीये की तुलना में कलात्मक दीये की मांग अधिक होती है। बढ़ती महंगाई के कारण इसकी कीमत इस साल 10-15 रुपये अधिक है। इस दीये को बनाने में समय अधिक लगता है। उसे सांचे में तैयार किया जाता है और पकाने में भी सावधानी बरतनी पड़ती है। ताकि नुकसान न हो। दुकानदार राम दुलार ने बताया कि पिछले कई सालों से तो झालरों ने रोजगार ही बंद कर दिया था लेकिन अब कुछ लोगों का झुकाव दीयों की ओर बढ़ा है। इसमें कलात्मक दीयों की मांग अधिक है।
इनसेट
महंगी मिट्टी और ईंधन ने बढ़ाई मुश्किलें
कुम्हारों को चाइनीज झालरों से भी चुनौती
अमर उजाला ब्यूरो
सचित्र-
पीडीडीयू नगर/सकलडीहा। ईंधन और मिट्टी महंगी होने से चाक की रफ्तार कम हुई है। दीवाली नजदीक आते ही कुम्हारों की उंगलियां चाक पर घूम रही हैं। लेकिन उत्साह की कमी है। इलेक्ट्रानिक आइटम और चाइनीज झालरों ने भी कुम्हारों को तगड़ा झटका दिया है। गांवों में भी अब दीयों की जगह झालर ले रहे हैं। कुम्हारों का कहना है कि दीवाली पर ही दीयों की बिक्री होती है, लेकिन ईंधन और मिट्टी महंगी होने पर दीया बनाने में दिक्कतें आ रही हैं।
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पीडीडीयू नगर के लाट नंबर एक, अलीनगर, नगर के सटे सिकटिया, चतुर्भुजपुर सहित अन्य इलाकों में दीपक बनाने में कुम्हार जुटे हैं। इसी तरह सकलडीहा कस्बा के कोहरान बस्ती और छोटी मस्जिद के पास दीये बनने शुरू हो गए हैं। सकलडीहा कस्बा के कोहरान बस्ती निवासी लालजी ने कहा कि अब पहले जैसी मांग नहीं रही। लोग परंपरा निभाने के लिए ही दीपक खरीद रहे हैं। वर्तमान में सौ रुपये सैकड़े उपले मिल रहे हैं, वहीं लकड़ी के छोटे-छोटे टुकड़े भी 80 रुपये बोरी मिल रही है। इसी तरह कस्बा निवासी दिनेशचंद्र प्रजापति ने बताया कि पहले ग्राम समाज के पोखरे पर अतिक्रमण न होने पर दिया बनाने के मिटृी आसानी से मिल जाती थी, लेकिन अब नहीं मिल पा रही है। रमाशंकर प्रजापति कहते हैं कि अब 160 फीट मिटृी खरीदने के लिए 1500 रुपए प्रति ट्रैक्टर खर्च करना पड़ता है। मुन्ना प्रजापति और कमल प्रजापति का कहना है कि दीया बनाकर पेट पालन भी मुश्किल हो गया है। महंगाई की वजह से काफी मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है।
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बाजार में डिजाइनर दीये 60 रुपये में 100 और सामान्य दीये की कीमत 40 रुपये में 100 है। दुकानदार रमेश का कहना है कि दीवाली पर सामान्य दीये की तुलना में कलात्मक दीये की मांग अधिक होती है। बढ़ती महंगाई के कारण इसकी कीमत इस साल 10-15 रुपये अधिक है। इस दीये को बनाने में समय अधिक लगता है। उसे सांचे में तैयार किया जाता है और पकाने में भी सावधानी बरतनी पड़ती है। ताकि नुकसान न हो। दुकानदार राम दुलार ने बताया कि पिछले कई सालों से तो झालरों ने रोजगार ही बंद कर दिया था लेकिन अब कुछ लोगों का झुकाव दीयों की ओर बढ़ा है। इसमें कलात्मक दीयों की मांग अधिक है।
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महंगी मिट्टी और ईंधन ने बढ़ाई मुश्किलें
कुम्हारों को चाइनीज झालरों से भी चुनौती
अमर उजाला ब्यूरो
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पीडीडीयू नगर/सकलडीहा। ईंधन और मिट्टी महंगी होने से चाक की रफ्तार कम हुई है। दीवाली नजदीक आते ही कुम्हारों की उंगलियां चाक पर घूम रही हैं। लेकिन उत्साह की कमी है। इलेक्ट्रानिक आइटम और चाइनीज झालरों ने भी कुम्हारों को तगड़ा झटका दिया है। गांवों में भी अब दीयों की जगह झालर ले रहे हैं। कुम्हारों का कहना है कि दीवाली पर ही दीयों की बिक्री होती है, लेकिन ईंधन और मिट्टी महंगी होने पर दीया बनाने में दिक्कतें आ रही हैं।
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पीडीडीयू नगर के लाट नंबर एक, अलीनगर, नगर के सटे सिकटिया, चतुर्भुजपुर सहित अन्य इलाकों में दीपक बनाने में कुम्हार जुटे हैं। इसी तरह सकलडीहा कस्बा के कोहरान बस्ती और छोटी मस्जिद के पास दीये बनने शुरू हो गए हैं। सकलडीहा कस्बा के कोहरान बस्ती निवासी लालजी ने कहा कि अब पहले जैसी मांग नहीं रही। लोग परंपरा निभाने के लिए ही दीपक खरीद रहे हैं। वर्तमान में सौ रुपये सैकड़े उपले मिल रहे हैं, वहीं लकड़ी के छोटे-छोटे टुकड़े भी 80 रुपये बोरी मिल रही है। इसी तरह कस्बा निवासी दिनेशचंद्र प्रजापति ने बताया कि पहले ग्राम समाज के पोखरे पर अतिक्रमण न होने पर दिया बनाने के मिटृी आसानी से मिल जाती थी, लेकिन अब नहीं मिल पा रही है। रमाशंकर प्रजापति कहते हैं कि अब 160 फीट मिटृी खरीदने के लिए 1500 रुपए प्रति ट्रैक्टर खर्च करना पड़ता है। मुन्ना प्रजापति और कमल प्रजापति का कहना है कि दीया बनाकर पेट पालन भी मुश्किल हो गया है। महंगाई की वजह से काफी मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है।