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शादी के 15 दिन बाद कारगिल युद्ध में कूदे, 19 गोलियां खाकर फहराया था तिरंगा
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गुलावठी के ग्राम कुरली निवासी कारगिल शहीद ऋषिपाल सिंह डागर का सैन्य सम्मान से अंतिम संस्कार किय?
- फोटो : BULANDSHAHR
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शादी के 15 दिन बाद कारगिल युद्ध में कूदे, 19 गोलियां खाकर फहराया था तिरंगा
गुलावठी। शादी के 15 दिन बाद ही कारगिल युद्ध में दुश्मनों की छाती पर गोलियां बरसाने वाले परवमीर चक्र विजेता योगेन्द्र यादव की बहादुरी के किस्से नई पीढ़ी के लिए प्रेरक हैं।
औरंगाबाद अहीर निवासी कारगिल हीरो योगेंद्र सिंह यादव की शादी 5 मई 1999 को हुई। शादी के 15 दिन बाद ही उन्हें कारगिल युद्ध में पहुंचने का आदेश मिला। योगेन्द्र ने सीने पर 19 गोलियां खाईं, लेकिन टाइगर हिल पर तिरंगा फहरा दिया। युद्ध के बाद योगेन्द्र को परमवीर चक्र से नवाजा गया। परमवीर चक्र विजेता ऑनरेरी लेफ्टिनेंट योगेंद्र सिंह कहते हैं कि अपने जांबाज साथियों को खोने का गम है , लेकिन उनकी शहादत पर गर्व है। वह कहते हैं, उन परिवारों को नमन, जिन्होंने इस देश के लिए अपना बेटा दिया है। वह कहते हैं इस वक्त बड़ी जंग कोरोना से है जिससे हम दो गज दूरी से ही बच सकते हैं।
बलिदान और शौर्य की बेमिसाल कहानी है टाइगर हिल फतह: मुकेश
सिकंदराबाद। कारगिल युद्ध में क्षेत्र के गांव इस्माईलपुर निवासी लांस नायक मुकेश यादव गर्दन में गोली लगने से घायल हो गए थे। वह अब रिटायर होने के बाद समाज सेवा में जुटे हुए हैं। कारगिल युद्ध के दौरान मुकेश यादव भारतीय सेना में 18 ग्रेनेडियर बटालियन में जम्मू-कश्मीर में लांस नायक के रूप में तैनात थे। जब वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध शुरू हुआ तो मुकेश यादव की बटालियन को कैप्टन सचिन निंबालकर के नेतृत्व में टाइगर हिल्स पर विजय पाने का टारगेट मिला मुकेश यादव ने बताया कि टाइगर हिल पर फतेह पाना गर्व की बात था क्योंकि यह दुर्गम चोटी 16500 फीट ऊंची है उनकी बटालियन ने 30 जून को ऑपरेशन शुरू किया था और 5 जुलाई को टाइगर हिल्स पर तिरंगा फहरा दिया था। ऑपरेशन के सेना ने तीन ऑफिसर, दो जेसीओ, 37 सैनिकों को खोया। इस दौरान कई साथी जख्मी भी हुए थे जिनमें वह भी शामिल थे। उनकी गर्दन में गोली लगी थी। मुकेश बताते हैं कि मुश्किल की घड़ी तब होती है जबअपने साथियों के परिवार वालों से मिलते हैं। उनके बच्चे और परिवार के लोगों को देखकर आज भी उनकी आंखे नम हो जाती है। मिलने पर हर बार शहीद साथियों के बच्चे उनसे अपने पापा के बारे में पूछते हैं।
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नौ दुश्मनों को ढेर कर शहीद हुए थे दाताराम
खुर्जा के गांव धराऊं निवासी दाताराम शादी के 21 दिन बाद ही कारगिल युद्ध कूद पड़े। दाताराम ने 9 पाकिस्तानी सैनिकों को अपनी गोलियों से ढेर कर वीरगति को प्राप्त हो गए। आज भी प्रत्येक वर्ष उनकी पुण्यतिथि पर परिवार और गांव के लोग कार्यक्रम आयोजित कर उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं। शहीद होने के बाद दाताराम की पत्नी को बीस बीघे जमीन और सहयोग राशि मिली थी। इसके अलावा दिल्ली में शहीदों के लिए दिल्ली के द्वारिका में बनाए गए आवास में से उन्हें भी मिला था। हालांकि गांव धराऊं में उनका परिवार नहीं रहता है। नगर में चौक का नाम शहीद दाताराम के नाम पर रखा गया है।
वैर के रामकुमार ने किए थे दुश्मनों के दांत खट्टे
ककोड़। वैर निवासी रामकुमार पुत्र स्वर्गीय राजपाल सिंह आर्टलरी 127 रेजिमेंट में 1998 में नासिक से भर्ती हुए थे । इनके बड़े भाई कृष्ण ने बताया कि कारगिल युद्ध के दौरान तीन जुलाई 1999 को उनकी रेजिमेंट की पोस्टिंग कारगिल में हुई थी। युद्ध के दौरान उन्होेंने दुश्मनों ने लोहा लेते हुए देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। शहीद रामकुमार अविवाहित थे। परिवार में उनके अलावा दो भाई कृष्ण कुमार, बुधपाल सिंह हैं। पिता का देहांत हो चुका है। मां शकुंतला देवी अभी जीवित हैं।
खैरपुर के ओमप्रकाश सिंह ने दिखाया था अद्भुत पराक्रम
स्याना तहसील के गांव खैरपुर निवासी ओमप्रकाश सिंह रघुवंशी दो राजपूताना राइफल में राइफलमैन के पद पर तैनात थे। कारगिल युद्ध के दौरान 29 जून 1999 को वह शहीद हो गए। तत्कालीन कमांडेंट ब्रिगेडियर प्रकाश चौधरी ने उनकी पत्नी राजकुमारी को पत्र भेजकर ओमप्रकाश की शहादत पर गर्व जताया था और उनके पराक्रम को याद किया था। ओमप्रकाश की पत्नी राजकुमारी देवी ने बताया कि उनका बेटा भी फौज में जाने की तैयारी कर रहा है।
सैदपुर के सुरेंद्र बन गए थे दुश्मन के लिए काल
शहीदों के गांव के नाम से विख्यात गांव सैदपुर के सुरेंद्र सिंह ने भी कारगिल युद्ध में गजब का पराक्रम दिखाया था। 13 जून 1999 को को दुश्मनों के लिए काल बने सुरेंद्र अपनी विजय देखने से पहले ही शहीद हो गए थे। उनकी पत्नी राजबाला ने बताया कि सरकार ने अपने सभी वादे पूरे किए। इस दौरान बड़े बेटे को गैस एजेंसी दिलाई गई है, जबकि छोटा बेटा अभी पढ़ाई कर रहा है।
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गुलावठी। शादी के 15 दिन बाद ही कारगिल युद्ध में दुश्मनों की छाती पर गोलियां बरसाने वाले परवमीर चक्र विजेता योगेन्द्र यादव की बहादुरी के किस्से नई पीढ़ी के लिए प्रेरक हैं।
औरंगाबाद अहीर निवासी कारगिल हीरो योगेंद्र सिंह यादव की शादी 5 मई 1999 को हुई। शादी के 15 दिन बाद ही उन्हें कारगिल युद्ध में पहुंचने का आदेश मिला। योगेन्द्र ने सीने पर 19 गोलियां खाईं, लेकिन टाइगर हिल पर तिरंगा फहरा दिया। युद्ध के बाद योगेन्द्र को परमवीर चक्र से नवाजा गया। परमवीर चक्र विजेता ऑनरेरी लेफ्टिनेंट योगेंद्र सिंह कहते हैं कि अपने जांबाज साथियों को खोने का गम है , लेकिन उनकी शहादत पर गर्व है। वह कहते हैं, उन परिवारों को नमन, जिन्होंने इस देश के लिए अपना बेटा दिया है। वह कहते हैं इस वक्त बड़ी जंग कोरोना से है जिससे हम दो गज दूरी से ही बच सकते हैं।
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बलिदान और शौर्य की बेमिसाल कहानी है टाइगर हिल फतह: मुकेश
सिकंदराबाद। कारगिल युद्ध में क्षेत्र के गांव इस्माईलपुर निवासी लांस नायक मुकेश यादव गर्दन में गोली लगने से घायल हो गए थे। वह अब रिटायर होने के बाद समाज सेवा में जुटे हुए हैं। कारगिल युद्ध के दौरान मुकेश यादव भारतीय सेना में 18 ग्रेनेडियर बटालियन में जम्मू-कश्मीर में लांस नायक के रूप में तैनात थे। जब वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध शुरू हुआ तो मुकेश यादव की बटालियन को कैप्टन सचिन निंबालकर के नेतृत्व में टाइगर हिल्स पर विजय पाने का टारगेट मिला मुकेश यादव ने बताया कि टाइगर हिल पर फतेह पाना गर्व की बात था क्योंकि यह दुर्गम चोटी 16500 फीट ऊंची है उनकी बटालियन ने 30 जून को ऑपरेशन शुरू किया था और 5 जुलाई को टाइगर हिल्स पर तिरंगा फहरा दिया था। ऑपरेशन के सेना ने तीन ऑफिसर, दो जेसीओ, 37 सैनिकों को खोया। इस दौरान कई साथी जख्मी भी हुए थे जिनमें वह भी शामिल थे। उनकी गर्दन में गोली लगी थी। मुकेश बताते हैं कि मुश्किल की घड़ी तब होती है जबअपने साथियों के परिवार वालों से मिलते हैं। उनके बच्चे और परिवार के लोगों को देखकर आज भी उनकी आंखे नम हो जाती है। मिलने पर हर बार शहीद साथियों के बच्चे उनसे अपने पापा के बारे में पूछते हैं।
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नौ दुश्मनों को ढेर कर शहीद हुए थे दाताराम
खुर्जा के गांव धराऊं निवासी दाताराम शादी के 21 दिन बाद ही कारगिल युद्ध कूद पड़े। दाताराम ने 9 पाकिस्तानी सैनिकों को अपनी गोलियों से ढेर कर वीरगति को प्राप्त हो गए। आज भी प्रत्येक वर्ष उनकी पुण्यतिथि पर परिवार और गांव के लोग कार्यक्रम आयोजित कर उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं। शहीद होने के बाद दाताराम की पत्नी को बीस बीघे जमीन और सहयोग राशि मिली थी। इसके अलावा दिल्ली में शहीदों के लिए दिल्ली के द्वारिका में बनाए गए आवास में से उन्हें भी मिला था। हालांकि गांव धराऊं में उनका परिवार नहीं रहता है। नगर में चौक का नाम शहीद दाताराम के नाम पर रखा गया है।
वैर के रामकुमार ने किए थे दुश्मनों के दांत खट्टे
ककोड़। वैर निवासी रामकुमार पुत्र स्वर्गीय राजपाल सिंह आर्टलरी 127 रेजिमेंट में 1998 में नासिक से भर्ती हुए थे । इनके बड़े भाई कृष्ण ने बताया कि कारगिल युद्ध के दौरान तीन जुलाई 1999 को उनकी रेजिमेंट की पोस्टिंग कारगिल में हुई थी। युद्ध के दौरान उन्होेंने दुश्मनों ने लोहा लेते हुए देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। शहीद रामकुमार अविवाहित थे। परिवार में उनके अलावा दो भाई कृष्ण कुमार, बुधपाल सिंह हैं। पिता का देहांत हो चुका है। मां शकुंतला देवी अभी जीवित हैं।
खैरपुर के ओमप्रकाश सिंह ने दिखाया था अद्भुत पराक्रम
स्याना तहसील के गांव खैरपुर निवासी ओमप्रकाश सिंह रघुवंशी दो राजपूताना राइफल में राइफलमैन के पद पर तैनात थे। कारगिल युद्ध के दौरान 29 जून 1999 को वह शहीद हो गए। तत्कालीन कमांडेंट ब्रिगेडियर प्रकाश चौधरी ने उनकी पत्नी राजकुमारी को पत्र भेजकर ओमप्रकाश की शहादत पर गर्व जताया था और उनके पराक्रम को याद किया था। ओमप्रकाश की पत्नी राजकुमारी देवी ने बताया कि उनका बेटा भी फौज में जाने की तैयारी कर रहा है।
सैदपुर के सुरेंद्र बन गए थे दुश्मन के लिए काल
शहीदों के गांव के नाम से विख्यात गांव सैदपुर के सुरेंद्र सिंह ने भी कारगिल युद्ध में गजब का पराक्रम दिखाया था। 13 जून 1999 को को दुश्मनों के लिए काल बने सुरेंद्र अपनी विजय देखने से पहले ही शहीद हो गए थे। उनकी पत्नी राजबाला ने बताया कि सरकार ने अपने सभी वादे पूरे किए। इस दौरान बड़े बेटे को गैस एजेंसी दिलाई गई है, जबकि छोटा बेटा अभी पढ़ाई कर रहा है।