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बिखर गए सपने, अब कैसे चलेगी जिंदगी
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बिखर गए सपने, अब कैसे चलेगी जिंदगी
बुलंदशहर। पंचायत चुनाव की ड्यूटी से लौटे जिन शिक्षकों की जान कोरोना की वजह से चली गई उनके परिवारों पर दुखों का ऐसा पहाड़ टूटा है कि सुनकर भी कलेजा कांप उठता है। शिक्षक मानक चंद की मौत के बाद उनकी दो बेटियाें की भी जान चली गई। बेबस बच्चे बिलख रहे हैं। पापा के जाने का गम आंसू नहीं थमने दे रहा। परवरिश और पढ़ाई की चिंता के बीच जिंदगी को आगे बढ़ाने की चुनौती अचानक आन पड़ी है।
गंगागढ़ गांव में शिक्षक मानक चंद का घर मातम में डूबा है। मानक चंद की पत्नी विमलेश सुबकते हुए बताती हैं कि अगर यह पता होता कि पंचायत चुनाव की ड्यूटी के बाद वह इतने बीमार हो जाएंगे कि जान ही चली जाएगी तो वह उन्हें कभी न जाने देंती। भले ही नौकरी छूट जाती। मानक चंद पहासू क्षेत्र के गांव जिनामई स्थित उच्च प्राथमिक विद्यालय में तैनात सहाय अध्यापक थे। मानक की पत्नी विमलेश देवी ने बताती हैं कि कि पति चुनाव प्रशिक्षण में भाग लेने के बाद ही उनकी तबीयत खराब हो गई। डॉक्टर भी उन्हें बचा नहीं सके और 24 अप्रैल को वह सबको रोते-बिलखते छोड़ चले गए। पिता की मौत का खबर सुनते ही 21 वर्षीय बेटी संगीता की तबीयत खराब हो गई। संगीता को इलाज के लिए आगरा तक ले जाया गया, लेकिन उसकी भी मौत हो गई। उधर, बड़ी बेटी की अलीगढ़ स्थित ससुराल में 26 अप्रैल को सिर की नस फटने से मौत हो गई। बड़ा बेटा दिनेश बीमार रहता है। छोटा बेटा राजकुमार और लोकेश बीएससी की पढ़ाई कर रहे हैं।
बेटी के हाथ पीले करने का ख्वाब लिए चले गए
मानक चंद की पत्नी विमलेश बताती हैं कि उनके पति छोटी बेटी संगीता के हाथ पीले करना चाहते थे। परिवार में एकमात्र कमाने वाले मानक ही थे। वह कहा करते थे कि संगीता के हाथ पीले करने के बाद उनकी जिम्मेदारियां कम हो जाएंगी। बेटे पढ़-लिखकर अफसर बन जाएंगे। अब परिवार पर अचानक आई विपदा ने जैसे सब कुछ थाम दिया है। दो बेटियों की मौत हो गई। बाकी सभी सदमे से नहीं उबर पा रहे हैं। अब घर चलाने का भी संकट है।
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काश! चुनाव ड्यूटी में न गए होते रामफूल
अरनिया क्षेत्र के गांव पला स्थित उच्च प्राथमिक विद्यालय में सहायक शिक्षक रामफूल भाटी ने भी चुनाव ड्यूटी के लिए प्रशिक्षण में जाने के बाद से ही संक्रमण की चपेट में आ गए थे। गाजियाबाद के लाल कुआं क्षेत्र में उनका परिवार रहता है। पत्नी मंजू ने बताया कि जब अस्पताल लेकर पहुंचे तो बहुत देर हो चुकी थी। एक अस्पताल में बड़ी मुश्किल से बेड मिला, लेकिन 23 अप्रैल को वह दुनिया छोड़ गए। बेटी आमना 10वीं में पढ़ रही है और सात वर्षीय पुत्र राघव तीसरी कक्षा मेें है। घर चलाने के लिए परिवार के पास कोई जरिया नहीं। बच्चों के आंसू सूख नहीं रहे। मंजू कहती हैं कि किसी तरह बच्चों को संभालती हूं। डर लगता है कि कहीं खुद कमजोर पड़ गईं तो बच्चों का क्या होगा।
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दिवंगत शिक्षकों की सूची हो रही तैयार
कोरोना से दिवंगत शिक्षकों की सूची एक बार फिर तैयार की जा रही है। शासन की ओर से भी दिवंगत शिक्षकों को दी जाने वाली मदद का कोई आदेश प्राप्त नहीं हुआ है। दिवंगत शिक्षकों को मदद दिए जाने के लिए शासन के आदेश का इंतजार है।
अखंड प्रताप सिंह, बेसिक शिक्षा अधिकारी।
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बुलंदशहर। पंचायत चुनाव की ड्यूटी से लौटे जिन शिक्षकों की जान कोरोना की वजह से चली गई उनके परिवारों पर दुखों का ऐसा पहाड़ टूटा है कि सुनकर भी कलेजा कांप उठता है। शिक्षक मानक चंद की मौत के बाद उनकी दो बेटियाें की भी जान चली गई। बेबस बच्चे बिलख रहे हैं। पापा के जाने का गम आंसू नहीं थमने दे रहा। परवरिश और पढ़ाई की चिंता के बीच जिंदगी को आगे बढ़ाने की चुनौती अचानक आन पड़ी है।
गंगागढ़ गांव में शिक्षक मानक चंद का घर मातम में डूबा है। मानक चंद की पत्नी विमलेश सुबकते हुए बताती हैं कि अगर यह पता होता कि पंचायत चुनाव की ड्यूटी के बाद वह इतने बीमार हो जाएंगे कि जान ही चली जाएगी तो वह उन्हें कभी न जाने देंती। भले ही नौकरी छूट जाती। मानक चंद पहासू क्षेत्र के गांव जिनामई स्थित उच्च प्राथमिक विद्यालय में तैनात सहाय अध्यापक थे। मानक की पत्नी विमलेश देवी ने बताती हैं कि कि पति चुनाव प्रशिक्षण में भाग लेने के बाद ही उनकी तबीयत खराब हो गई। डॉक्टर भी उन्हें बचा नहीं सके और 24 अप्रैल को वह सबको रोते-बिलखते छोड़ चले गए। पिता की मौत का खबर सुनते ही 21 वर्षीय बेटी संगीता की तबीयत खराब हो गई। संगीता को इलाज के लिए आगरा तक ले जाया गया, लेकिन उसकी भी मौत हो गई। उधर, बड़ी बेटी की अलीगढ़ स्थित ससुराल में 26 अप्रैल को सिर की नस फटने से मौत हो गई। बड़ा बेटा दिनेश बीमार रहता है। छोटा बेटा राजकुमार और लोकेश बीएससी की पढ़ाई कर रहे हैं।
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बेटी के हाथ पीले करने का ख्वाब लिए चले गए
मानक चंद की पत्नी विमलेश बताती हैं कि उनके पति छोटी बेटी संगीता के हाथ पीले करना चाहते थे। परिवार में एकमात्र कमाने वाले मानक ही थे। वह कहा करते थे कि संगीता के हाथ पीले करने के बाद उनकी जिम्मेदारियां कम हो जाएंगी। बेटे पढ़-लिखकर अफसर बन जाएंगे। अब परिवार पर अचानक आई विपदा ने जैसे सब कुछ थाम दिया है। दो बेटियों की मौत हो गई। बाकी सभी सदमे से नहीं उबर पा रहे हैं। अब घर चलाने का भी संकट है।
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काश! चुनाव ड्यूटी में न गए होते रामफूल
अरनिया क्षेत्र के गांव पला स्थित उच्च प्राथमिक विद्यालय में सहायक शिक्षक रामफूल भाटी ने भी चुनाव ड्यूटी के लिए प्रशिक्षण में जाने के बाद से ही संक्रमण की चपेट में आ गए थे। गाजियाबाद के लाल कुआं क्षेत्र में उनका परिवार रहता है। पत्नी मंजू ने बताया कि जब अस्पताल लेकर पहुंचे तो बहुत देर हो चुकी थी। एक अस्पताल में बड़ी मुश्किल से बेड मिला, लेकिन 23 अप्रैल को वह दुनिया छोड़ गए। बेटी आमना 10वीं में पढ़ रही है और सात वर्षीय पुत्र राघव तीसरी कक्षा मेें है। घर चलाने के लिए परिवार के पास कोई जरिया नहीं। बच्चों के आंसू सूख नहीं रहे। मंजू कहती हैं कि किसी तरह बच्चों को संभालती हूं। डर लगता है कि कहीं खुद कमजोर पड़ गईं तो बच्चों का क्या होगा।
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दिवंगत शिक्षकों की सूची हो रही तैयार
कोरोना से दिवंगत शिक्षकों की सूची एक बार फिर तैयार की जा रही है। शासन की ओर से भी दिवंगत शिक्षकों को दी जाने वाली मदद का कोई आदेश प्राप्त नहीं हुआ है। दिवंगत शिक्षकों को मदद दिए जाने के लिए शासन के आदेश का इंतजार है।
अखंड प्रताप सिंह, बेसिक शिक्षा अधिकारी।