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‘बिजली होती तो शायद बच जाता घर का चिराग’
Updated Thu, 14 Dec 2017 05:05 PM IST
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निरीक्षण पर आए डॉक्टर तो तड़पते मिले थे बच्चे
बुलंदशहर।
जिला महिला अस्पताल के एसएनसीयू (सिक न्यू बॉर्न केयर यूनिट) में नवजातों की मौत के मामले में बड़ा खुलासा हुआ है। सूत्रों के अनुसार यदि समय रहते चिकित्सक मौके पर न पहुंचते तो वार्ड में भर्ती अन्य नवजातों की भी मौत हो सकती थी। जिस वक्त चिकित्सक मौके पर पहुंचे, उस समय तक दो नवजातों की मौत हो चुकी थी और अन्य की हालत गंभीर थी।
सोमवार रात आंधी-बारिश के कारण जिला महिला अस्पताल में भी बिजली सप्लाई बाधित हो गई थी। रात में स्टाफ की लापरवाही के कारण जेनरेटर भी नहीं चलाया जा सका। इसके कारण एसएनसीयू में भर्ती दो नवजातों की मौत हो गई। सूत्रों ने दावा किया है कि हादसे की रात एसएनसीयू में पांच बच्चे भर्ती थे, जिनमें से दो ने दम तोड़ दिया था जबकि तीन अन्य मासूम तड़प रहे थे। बताया जा रहा है कि बिजली न होने के चलते नवजात वार्ड में रो रहे थे, लेकिन अस्पताल का स्टाफ गहरी नींद में सो रहा था। सूत्रों ने दावा किया कि यदि चिकित्सकों के पहुंचने में 10 मिनट की भी देर हो जाती तो वार्ड में भर्ती तीनों और नवजातों की भी मौत हो जाती। गनीमत रही कि तड़के करीब चार बजे अस्पताल स्टाफ व प्रभारी सीएमएस डॉ. सुधा शर्मा मौके पर पहुंचीं और बिजली सप्लाई चालू कराई। इसके बाद दो नवजातों की गंभीर हालत को देखते हुए चिकित्सकों ने उन्हें रेफर कर दिया। प्रभारी सीएमएस डॉ. सुधा शर्मा ने बताया कि सुबह चार बजे वह खुद मौके पर पहुंची थीं और बिजली सप्लाई चालू कराई थी। तब तक दो बच्चों की मौत हो चुकी थी। दो बच्चों की गंभीर हालत के चलते उन्हें रेफर कर दिया था।
‘बिजली होती तो शायद बच जाता घर का चिराग’
जिला महिला अस्पताल के एसएनसीयू में भर्ती यासमीन पत्नी गुलजार के 24 दिन के बेटे शाकिर की मौत के बाद पूरा परिवार गम में है। परिजनों को यह मलाल है कि अगर उस रात अस्पताल में जेनरेटर चल गया होता तो शायद शाकिर की जान बच गई होती।
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नवजात शाकिर की मां यासमीन तो इतने सदमे में है कि वह कुछ बोल और बता नहीं पा रही है। मृतक के दादा सलाम ने कहा कि जिस कमरे में शाकिर को रखा गया था, बिजली जाने के बाद उसमें गर्माहट नहीं रही होगी। सलाम ने बताया कि उसकी पुत्रवधू ने 19 नवंबर को गुलावठी के सरकारी अस्पताल में पुत्र को जन्म दिया था। उसी रोज रात को चिकित्सकों ने उसे जिला महिला चिकित्सालय रेफर कर दिया था। चार दिन तक जिला महिला चिकित्सालय के एसएनसीयू में बच्चे को मशीन में रखा गया था। इसके बाद उसे वापस घर ले आए। 10 दिसंबर को शाकिर की तबीयत बिगड़ने के कारण उसे दोबारा जिला महिला चिकित्सालय ले गए। शाकिर को दोबारा एसएनसीयू में भर्ती किया गया। 12 दिसंबर को शाकिर की मौत हो गई। उस समय रात को बिजली गुल हो गई थी और जेनरेटर भी नहीं चलाया गया था। शाकिर के दादा सलाम ने नम आंखों से बताया कि शायद ठंड लगने से उनके पोते की मौत हो गई होगी। सलाम ने बताया कि उसके पुत्र गुलजार की यह पहली संतान थी। यासमीन के पति गुलजार एवं ससुर सलाम ग्राम मोहाना में धोबी का कार्य करके परिवार का गुजारा करते हैं।
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बुलंदशहर।
जिला महिला अस्पताल के एसएनसीयू (सिक न्यू बॉर्न केयर यूनिट) में नवजातों की मौत के मामले में बड़ा खुलासा हुआ है। सूत्रों के अनुसार यदि समय रहते चिकित्सक मौके पर न पहुंचते तो वार्ड में भर्ती अन्य नवजातों की भी मौत हो सकती थी। जिस वक्त चिकित्सक मौके पर पहुंचे, उस समय तक दो नवजातों की मौत हो चुकी थी और अन्य की हालत गंभीर थी।
सोमवार रात आंधी-बारिश के कारण जिला महिला अस्पताल में भी बिजली सप्लाई बाधित हो गई थी। रात में स्टाफ की लापरवाही के कारण जेनरेटर भी नहीं चलाया जा सका। इसके कारण एसएनसीयू में भर्ती दो नवजातों की मौत हो गई। सूत्रों ने दावा किया है कि हादसे की रात एसएनसीयू में पांच बच्चे भर्ती थे, जिनमें से दो ने दम तोड़ दिया था जबकि तीन अन्य मासूम तड़प रहे थे। बताया जा रहा है कि बिजली न होने के चलते नवजात वार्ड में रो रहे थे, लेकिन अस्पताल का स्टाफ गहरी नींद में सो रहा था। सूत्रों ने दावा किया कि यदि चिकित्सकों के पहुंचने में 10 मिनट की भी देर हो जाती तो वार्ड में भर्ती तीनों और नवजातों की भी मौत हो जाती। गनीमत रही कि तड़के करीब चार बजे अस्पताल स्टाफ व प्रभारी सीएमएस डॉ. सुधा शर्मा मौके पर पहुंचीं और बिजली सप्लाई चालू कराई। इसके बाद दो नवजातों की गंभीर हालत को देखते हुए चिकित्सकों ने उन्हें रेफर कर दिया। प्रभारी सीएमएस डॉ. सुधा शर्मा ने बताया कि सुबह चार बजे वह खुद मौके पर पहुंची थीं और बिजली सप्लाई चालू कराई थी। तब तक दो बच्चों की मौत हो चुकी थी। दो बच्चों की गंभीर हालत के चलते उन्हें रेफर कर दिया था।
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‘बिजली होती तो शायद बच जाता घर का चिराग’
जिला महिला अस्पताल के एसएनसीयू में भर्ती यासमीन पत्नी गुलजार के 24 दिन के बेटे शाकिर की मौत के बाद पूरा परिवार गम में है। परिजनों को यह मलाल है कि अगर उस रात अस्पताल में जेनरेटर चल गया होता तो शायद शाकिर की जान बच गई होती।
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नवजात शाकिर की मां यासमीन तो इतने सदमे में है कि वह कुछ बोल और बता नहीं पा रही है। मृतक के दादा सलाम ने कहा कि जिस कमरे में शाकिर को रखा गया था, बिजली जाने के बाद उसमें गर्माहट नहीं रही होगी। सलाम ने बताया कि उसकी पुत्रवधू ने 19 नवंबर को गुलावठी के सरकारी अस्पताल में पुत्र को जन्म दिया था। उसी रोज रात को चिकित्सकों ने उसे जिला महिला चिकित्सालय रेफर कर दिया था। चार दिन तक जिला महिला चिकित्सालय के एसएनसीयू में बच्चे को मशीन में रखा गया था। इसके बाद उसे वापस घर ले आए। 10 दिसंबर को शाकिर की तबीयत बिगड़ने के कारण उसे दोबारा जिला महिला चिकित्सालय ले गए। शाकिर को दोबारा एसएनसीयू में भर्ती किया गया। 12 दिसंबर को शाकिर की मौत हो गई। उस समय रात को बिजली गुल हो गई थी और जेनरेटर भी नहीं चलाया गया था। शाकिर के दादा सलाम ने नम आंखों से बताया कि शायद ठंड लगने से उनके पोते की मौत हो गई होगी। सलाम ने बताया कि उसके पुत्र गुलजार की यह पहली संतान थी। यासमीन के पति गुलजार एवं ससुर सलाम ग्राम मोहाना में धोबी का कार्य करके परिवार का गुजारा करते हैं।