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जन्माष्टमी पर विशेष: श्रीकृष्ण ने अवंतिका देवी मंदिर से किया था रुकमणी का हरण
Updated Mon, 14 Aug 2017 01:17 AM IST
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जन्माष्टमी पर विशेष : श्रीकृष्ण ने अवंतिका देवी मंदिर से किया था रुक्मिणी का हरण
- अहार में आज भी है मौजूद सदियों पुराने खिन्नी, कदंब, इंद्रजों के पेड़
- आज भी क्षेत्र के गांवों के नाम श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह की रस्मों पर
अमर उजाला ब्यूरो
बुलंदशहर।
जिले का अहार क्षेत्र आज भी श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के विवाह का साक्षी है। यहां आज भी सैकड़ों वर्ष पुराने पेड़ हैं, जिनके मेवा और फूलों से ही श्रीकृष्ण की बारात का स्वागत किया गया था। इतना ही नहीं क्षेत्र के कई गांवों के नाम भी श्रीकृष्ण रुक्मिणी विवाह की रस्मों पर आधारित हैं।
अहार क्षेत्र, कभी महारानी रुक्मिणी के पिता महाराज भीष्मक की राजधानी कुंदनपुर के नाम से जाना जाता था। राजा भीष्मक के सात पुत्र और एक पुत्री रुक्मिणी थीं। रुक्मिणी और राजा भीष्मक चाहते थे कि उनका विवाह श्रीकृष्ण के साथ हो, लेकिन रुक्मिणी के भाई और राजा भीष्मक के उत्तराधिकारी रुक्मी नहीं चाहते थे कि श्रीकृष्ण के साथ विवाह हो। इसका पता जब श्रीकृष्ण को चला तो उन्होंने रुक्मिणी का क्षेत्र के प्राचीन मां अवंतिका देवी मंदिर से हरण कर लिया था। रुक्मी ने उनका रास्ता रोका और इस दौरान बलराम और रूक्मी के बीच भीषण युद्ध हुआ। बताया जाता है कि बलराम जी ने महाराजा भीष्मक की राजधानी कुंदनपुर को पलट दिया था। आज भी अहार क्षेत्र में मिट्टी खुदने पर मकानों की दीवार निकलती हैं। इसके बाद श्रीकृष्ण-रुक्मिणी का विवाह हुआ। श्रीकृष्ण की बारात का स्वागत खिन्नी, कदंब, इंद्रजों वृक्ष के फूलों और मेवाओं से किया गया था। सैकड़ों वर्ष पुराने ये पेड़ आज भी क्षेत्र में अपनी महक बिखेर रहे हैं।
इस तरह पड़े गांवों के नाम
बताया जाता है कि अहार क्षेत्र के गांव मोहरसा में श्रीकृष्ण का मोहर बंधा था, इसलिए इसका नाम मोहरसा पड़ा। दराबर गांव में श्रीकृष्ण जी का दरबार लगता था। बामनपुर गांव में श्रीकृष्ण की बारात का ब्रह्मभोज हुआ था। गांव सिहालीनगर में श्रीकृष्ण का मोहर मोर के पंखों से बनाया गया था। गांव सिरोरा में श्रीकृष्ण का मोहर सिराया गया था। गांव खंदोई में ब्रह्मभोज के लिए मिट्टी के बर्तन बने थे। यहां पर आज भी मिट्टी के बर्तनों का बहुत बड़ा मेला लगता है।
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कुंड में स्नान करने आती थीं रुक्मिणी
अहार में अवंतिका देवी मंदिर है और यहां पर रुक्मिणी कुंड भी है। बताया जाता है कि रुक्मिणी रोज अवंतिका देवी मंदिर के पास गंगा स्नान करने आती थीं। मान्यता है कि इस कुंड में स्नान करने से चर्म रोग दूर हो जाते हैं। क्षेत्र के लोगों का कहना है कि कितनी भी बाढ़ आ जाए, लेकिन यह कुंड कभी नहीं डूबता है।
कुछ आज, कुछ मनाएंगे कल
जन्माष्टमी की तैयारी लगभग पूरी हो गई है। इस बार जन्माष्टमी का व्रत रखने को लेकर असमंजस की स्थिति है। कुछ लोग सोमवार तो कुछ लोग मंगलवार को व्रत रखेंगे। रविवार को बाजार पहुंचकर लोगों ने व्रत का सामान और कान्हा को सजाने का सामान खरीदा। वहीं दूसरी ओर मंदिरों को भी सजाया गया है। मंदिरों में भजन-कीर्तन आदि के आयोजन की भी तैयारियां जोरों पर हैं।
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- अहार में आज भी है मौजूद सदियों पुराने खिन्नी, कदंब, इंद्रजों के पेड़
- आज भी क्षेत्र के गांवों के नाम श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह की रस्मों पर
अमर उजाला ब्यूरो
बुलंदशहर।
जिले का अहार क्षेत्र आज भी श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के विवाह का साक्षी है। यहां आज भी सैकड़ों वर्ष पुराने पेड़ हैं, जिनके मेवा और फूलों से ही श्रीकृष्ण की बारात का स्वागत किया गया था। इतना ही नहीं क्षेत्र के कई गांवों के नाम भी श्रीकृष्ण रुक्मिणी विवाह की रस्मों पर आधारित हैं।
अहार क्षेत्र, कभी महारानी रुक्मिणी के पिता महाराज भीष्मक की राजधानी कुंदनपुर के नाम से जाना जाता था। राजा भीष्मक के सात पुत्र और एक पुत्री रुक्मिणी थीं। रुक्मिणी और राजा भीष्मक चाहते थे कि उनका विवाह श्रीकृष्ण के साथ हो, लेकिन रुक्मिणी के भाई और राजा भीष्मक के उत्तराधिकारी रुक्मी नहीं चाहते थे कि श्रीकृष्ण के साथ विवाह हो। इसका पता जब श्रीकृष्ण को चला तो उन्होंने रुक्मिणी का क्षेत्र के प्राचीन मां अवंतिका देवी मंदिर से हरण कर लिया था। रुक्मी ने उनका रास्ता रोका और इस दौरान बलराम और रूक्मी के बीच भीषण युद्ध हुआ। बताया जाता है कि बलराम जी ने महाराजा भीष्मक की राजधानी कुंदनपुर को पलट दिया था। आज भी अहार क्षेत्र में मिट्टी खुदने पर मकानों की दीवार निकलती हैं। इसके बाद श्रीकृष्ण-रुक्मिणी का विवाह हुआ। श्रीकृष्ण की बारात का स्वागत खिन्नी, कदंब, इंद्रजों वृक्ष के फूलों और मेवाओं से किया गया था। सैकड़ों वर्ष पुराने ये पेड़ आज भी क्षेत्र में अपनी महक बिखेर रहे हैं।
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इस तरह पड़े गांवों के नाम
बताया जाता है कि अहार क्षेत्र के गांव मोहरसा में श्रीकृष्ण का मोहर बंधा था, इसलिए इसका नाम मोहरसा पड़ा। दराबर गांव में श्रीकृष्ण जी का दरबार लगता था। बामनपुर गांव में श्रीकृष्ण की बारात का ब्रह्मभोज हुआ था। गांव सिहालीनगर में श्रीकृष्ण का मोहर मोर के पंखों से बनाया गया था। गांव सिरोरा में श्रीकृष्ण का मोहर सिराया गया था। गांव खंदोई में ब्रह्मभोज के लिए मिट्टी के बर्तन बने थे। यहां पर आज भी मिट्टी के बर्तनों का बहुत बड़ा मेला लगता है।
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कुंड में स्नान करने आती थीं रुक्मिणी
अहार में अवंतिका देवी मंदिर है और यहां पर रुक्मिणी कुंड भी है। बताया जाता है कि रुक्मिणी रोज अवंतिका देवी मंदिर के पास गंगा स्नान करने आती थीं। मान्यता है कि इस कुंड में स्नान करने से चर्म रोग दूर हो जाते हैं। क्षेत्र के लोगों का कहना है कि कितनी भी बाढ़ आ जाए, लेकिन यह कुंड कभी नहीं डूबता है।
कुछ आज, कुछ मनाएंगे कल
जन्माष्टमी की तैयारी लगभग पूरी हो गई है। इस बार जन्माष्टमी का व्रत रखने को लेकर असमंजस की स्थिति है। कुछ लोग सोमवार तो कुछ लोग मंगलवार को व्रत रखेंगे। रविवार को बाजार पहुंचकर लोगों ने व्रत का सामान और कान्हा को सजाने का सामान खरीदा। वहीं दूसरी ओर मंदिरों को भी सजाया गया है। मंदिरों में भजन-कीर्तन आदि के आयोजन की भी तैयारियां जोरों पर हैं।