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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Budaun News ›   Now Milavtkhoron began the business of synthetic Mantha

अब मिलावटखोरों ने शुरू किया सिंथेटिक मैंथा का धंधा

Wed, 02 Sep 2015 12:25 AM IST
बदायूं
बदायूं Updated Wed, 02 Sep 2015 12:25 AM IST
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अपना धंधा चलाने को मिलावटखोर बाज नहीं आते हैं। चाहे सिंथेटिक दूध का कारोबार हो या फिर अन्य खाद्य पदार्थ। सीधे तौर पर लोगों की जिंदगी के साथ खेला जाता है...मिलावटखोरों ने अब मैंथा को भी सिंथेटिक बनाना शुरू कर दिया है। उसावां क्षेत्र के एक गांव में इस धंधे से जुड़ लोग मैंथा की महंगी किस्में तैयार कर सूबे के कई जिलों में बिक्री कर रहे हैं।
थोड़ा सा खर्च करके अधिक मुनाफे कमाने में लगे लोग किसी की भी परवाह नहीं करते। जिले के उसावां क्षेत्र के गांव में वनबौसारी सिंथेटिक मैंथा बनाने का धंधा भी चल रहा है। यहां बता दें कि सिंथेटिक मैंथा कि स्पीयरमेंट, पिपरेटा और शिवालिक महंगी किस्में हैं। जिले में शिवालिक तो खूब मिल जाता है पर स्पीयरमेंट और पिपरेटा उतना नहीं मिल पाता है। स्पीयरमेंट और पिपरेटा लगभग दो हजार रुपये किलो तक बिकता है। जानकार लोग बताते हैं कि सिथेटिंक मैंथा के धंधे में छह-सात लोग अब हर किसी की नजर में आने लगे हैं। यह लोग विभिन्न रासायनिक पदार्थ के जरिए सिंथेटिक स्पीयरमेंट,पिपरेटा और शिवालिक तैयार करते हैं। बताते हैं कि एक किमी. तेल तैयार करने में लगभग 150-200 रुपये तक के केमिकल प्रयोग में लाये जाते हैं और बाजार में दो हजार या उससे कम में आसानी से बिक जाता है। इस धंधे के कारोबारी सिंथेटिक मैंथा को बदायूं जिले में नहीं बेकते हैं। वह फर्रुखाबाद, आंवला, चंदौसी आदि जिलों में बेचने जाते हैं। सूत्र बताते हैं कि जिन केमिकलों को मिलाया जाता है उससे नकली और असली की पहचान भी मुश्किल  हो जाती है। लिहाजा, सिंथेटिंक मैंथा के कारोबारी फिलहाल अपने धंधे को खूब चला रहे हैं। यह लोग तैयार किया गया माल बारी-बारी से बाहर ले जाते हैं। तड़के घर से निकल जाते हैं और देर शाम या रात को लौट आते हैं। एक दफा में 10 से 15 किलो सिथेंटिक मैंथा ले जाते हैं। जिसकी वजह से लोग उन पर शक पर नहीं करते हैं। धंधे बाजों ने परिवार के सभी सदस्यों को भी यह काम सिखा रखा है, जो उनकी गैरमौजूदगी में सिंथेटिक मैंथा तैयार करते हैं।
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इंसेट-
...मिलावट ने ही खत्म कर दी बासमती चावल की मंडी
दातागंज। कई व्यापारियों ने बताया कि कुछ साल पहले तक यह इलाका बासमती चावल की मंडी हुआ करता था, लेकिन इसमें भी जब मिलावट होने लगी तो यह मंडी भी खत्म हो गई। व्यापारियों ने बताया कि नकली बासमती के  चलते अच्छी फर्में भी फैल हो गईं। क्योंकि जब वह माल को कहीं बाहर भेजते थे, तब वह नकली होने पर वापस लौट आता था। मिलावट की वजह से बासमती चावल का कारोबार करने वालों की भी छवि खराब होने लगी थी। अब जिस तरह सिंथेटिक मैंथा भी बनने लगा है उससे यह लगने लगा है कि कहीं देश और प्रदेश में मैंथा के क्षेत्र में बड़ी  मंडी बन चुके बदायूं का यह कारोबार भी प्रभावित न हो जाए। बताते चलें कि बदायूं मैंथा की बड़ी मंडी है।
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