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लॉकडाउन: सड़कों पर धुआं उड़ना रुका तो 50 प्रतिशत घट गया प्रदूषण
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बदायूं। कोरोना का संक्रमण रोकने को किए गए लॉकडाउन में काम धंधे बंद होने से जिंदगी ठहर सी गई है। मगर लॉकडाउन से कई फायदे भी हुए हैं। सड़कों पर वाहन न के बराबर होने के साथ धुआं और प्रदूषण फैलाने वाले धंधे बंद हैं।धुआं उड़ना कम हुआ तो प्रदूषण भी घटकर आधा गया। के रूप में सामने आया है। विशेषज्ञों की मानें तो लॉकडाउन में 50 प्रतिशत से ज्यादा प्रदूषण में कमी आई है। सड़कों पर गुजरने वाले वाहनों की संख्या और ईंधन की गिरती बिक्री के आंकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं। पेट्रोल डीजल की बिक्री सामान्य दिनों की अपेक्षा केवल दस प्रतिशत रह गई है।
विश्व पृथ्वी दिवस हर साल 22 अप्रैल को मनाया जाता है। अब तक इस दौरान अलग-अलग तरह की प्रतियोगिताएं, सेमिनार, भाषण आदि होते थे, जिनमें लोगों को प्रदूषण के बारे में जानकारी दी जाती थी, ताकि लोग प्रकृति की तरफ ध्यान दें और उसे साफ व स्वच्छ रखने में मदद करें। मगर इस बार विश्व पृथ्वी दिवस कोरोना काल में हुआ, जिसकी वजह से सभी लोग घरों में कैद है। लगभग सभी तरह की फैक्ट्रियां बंद पड़ी हैं। इससे प्रदूषण बेहद कम हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि लॉकडाउन के कारण ऐसा हुआ है। जिले में सड़कों पर दौड़ रहे वाहनों और ईंधन की खपत के आंकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं। जाहिर सी बात है कि इस समय सड़कों पर वाहन नहीं दौड़ रहे, जिसका असर वातावरण पर हुआ है।
नदियों का पानी भी हुआ निर्मल
औद्योगिक इकाइयों के बंद हो जाने से केमिकल युक्त दूषित पदार्थ नदियों में नहीं पहुंच रहे हैं। इससे गंगा, रामगंगा आदि नदियों का पानी पहले की अपेक्षा काफी स्वच्छ हो गया है। हालात यह हैं कि पानी में रहने वाले जलीय जीव भी दिखाई देने लगे हैं, जबकि इससे पहले प्रदेश सरकार की तरफ गंगा यात्रा निकाली गई थी। इसमें उन्होंने लोगों से गंगा नदी को स्वच्छ रखने की अपील की थी। इसके अलावा अनेक योजना के तहत गंगा के पानी को स्वच्छ करने की कोशिश की जा रही थी। इसका ज्यादा असर होता दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन लॉकडाउन की वजह गंगा का पानी अपने आप ही स्वच्छ होने लगा है।
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जिले में वाहनों की स्थिति
दोपहिया वाहन-दो लाख 41 हजार 60
चार पाहिया-25 हजार
टेंपो - पांच हजार 769
जिले में पेट्रोल पंप-114
लॉकडाउन से पहले पेट्रोल-डीजल की खपत रोजाना- 90 हजार लीटर प्रति दिन
लॉकडाउन में खपत- 9 से 10 हजार लीटर प्रतिदिन
एक पंप पर औसतन तीन से चार सौ लीटर बिक रहा ईधन
त्रिवेणी सहाय पेट्रोल पंप के मालिक नितिन शर्मा ने बताया कि लॉकडाउन से पहलेएक पंप पर प्रतिदिन औसतन तीन से साढ़े तीन हजार के आसपास पेट्रोल और डीजल की ब्रिकी होती थी, जिसमें एक हजार से-1200 लीटर पेट्रोल और दो हजार से 22 सौ लीटर डीजल की खपत थी। यह घटकर कुछ दिनों पहले तक सात सौ से आठ सौ लीटर रह गई थी,लेकिन जब से जिला प्रशासन ने पास निरस्त किये हैं तब से यह आंकड़ा घटकर केवल 300 से 400 लीटर पर सीमित हो गया है।
विश्व के सभी देश अपनी अर्थव्यवस्था बढ़ाने की होड़ में लगे थे। इसका नतीजा यह हुआ कि लोग अपनी क्षमता से अधिक काम करने लगे। इसके चलते मशीनीकरण यानी औद्योगिकीकरण हुआ। जितना ज्यादा औद्योगिकीकरण हुआ उतना ही पर्यावरण प्रदूषित हुआ। ग्लेशियर पिघलने लगे और ऑक्सीजन कम होने लगी, लेकिन लॉकडाउन में सब लोग केवल अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में लगे हैं। पहले लोग घरों से बाहर निकलकर गंदगी करते थे। वह सभी कुछ खत्म हो गया। इससे वातावरण में शुद्घता आ रही है, जो आने वाले समय के लिए एक बेहतर संकेत है। बस जरूरत है कि सभी लोग इस तरफ पूरी तरह से ध्यान दें।
- डॉ. आरके वर्मा, प्रवक्ता वनस्पति विज्ञान, राजकी इंटर कॉलेज
कोविड-19 की वजह से काफी दिक्कतें आ रही हैं, लेकिन उसका कहीं न कहीं हम लोगों को फायदा भी मिल रहा है। देशभर में लॉकडाउन लागू किया गया है। इसकी वजह से बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिला है। पहले वातावरण में बहुत ज्यादा वायु और ध्वनि प्रदूषण होता था, जो अभी लगभग पूरी तरह से बंद है। ऑनलाइन पढ़ाई पर जोर दिया जा रहा हैं, जो कहीं न कहीं प्रदूषण नियंत्रण में सहायक हो रहा है। क्योंकि अभी तक कोचिंग जाने वाले छात्र-छात्राओं की शाम को लाइन से लगी रहती थी। कभी इस शिक्षक के पास तो कभी दूसरे शिक्षक के पास, ऐसे में वाहनों को अत्याधिक प्रयोग किया जाता था। लेकिन अब नहीं हो रहा है। सही बात ये है कि हम सभी लोग अपनी भारतीय सभ्यता को भूल चुके हैं। पहले हम लोग जरूरत के मुताबिक कमाते और खाते है। लेकिन मौजूदा समय में हम लोग दिखावे की ओर भाग रहे है। - डॉ. रूपम अग्रवाल, असिस्टेंट प्रोफेसर, बॉटनी, एनञएमएसएन दास कॉलेज
अस्थमा और एलर्जी के मरीजों की संख्या इन दिनों काफी होती थी। क्योंकि बदलते मौसम और प्रदूषण की वजह से ऐसे रोगियों को बेहद ज्यादा दिक्कत होती थी, लेकिन लॉकडाउन होने की वजह से वायु और ध्वनि प्रदूषण बेहद कम हुआ है। जिसकी वजह से ऐसे में रोगियों की संख्या कम हो गई है। हालांकि श्वास रोगियों को सलाह है कि लॉकडाउन के बाद भी मौसम परिवर्तन के समय नियमित फेस मास्क का उपयोग करें और नियमित दवा लें। ज्यादा दिक्कत हो तो चिकित्सक की सलाह लें।
- डॉ. नितिन कुमार, फिजिशियन, जिला अस्पताल
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विश्व पृथ्वी दिवस हर साल 22 अप्रैल को मनाया जाता है। अब तक इस दौरान अलग-अलग तरह की प्रतियोगिताएं, सेमिनार, भाषण आदि होते थे, जिनमें लोगों को प्रदूषण के बारे में जानकारी दी जाती थी, ताकि लोग प्रकृति की तरफ ध्यान दें और उसे साफ व स्वच्छ रखने में मदद करें। मगर इस बार विश्व पृथ्वी दिवस कोरोना काल में हुआ, जिसकी वजह से सभी लोग घरों में कैद है। लगभग सभी तरह की फैक्ट्रियां बंद पड़ी हैं। इससे प्रदूषण बेहद कम हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि लॉकडाउन के कारण ऐसा हुआ है। जिले में सड़कों पर दौड़ रहे वाहनों और ईंधन की खपत के आंकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं। जाहिर सी बात है कि इस समय सड़कों पर वाहन नहीं दौड़ रहे, जिसका असर वातावरण पर हुआ है।
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नदियों का पानी भी हुआ निर्मल
औद्योगिक इकाइयों के बंद हो जाने से केमिकल युक्त दूषित पदार्थ नदियों में नहीं पहुंच रहे हैं। इससे गंगा, रामगंगा आदि नदियों का पानी पहले की अपेक्षा काफी स्वच्छ हो गया है। हालात यह हैं कि पानी में रहने वाले जलीय जीव भी दिखाई देने लगे हैं, जबकि इससे पहले प्रदेश सरकार की तरफ गंगा यात्रा निकाली गई थी। इसमें उन्होंने लोगों से गंगा नदी को स्वच्छ रखने की अपील की थी। इसके अलावा अनेक योजना के तहत गंगा के पानी को स्वच्छ करने की कोशिश की जा रही थी। इसका ज्यादा असर होता दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन लॉकडाउन की वजह गंगा का पानी अपने आप ही स्वच्छ होने लगा है।
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जिले में वाहनों की स्थिति
दोपहिया वाहन-दो लाख 41 हजार 60
चार पाहिया-25 हजार
टेंपो - पांच हजार 769
जिले में पेट्रोल पंप-114
लॉकडाउन से पहले पेट्रोल-डीजल की खपत रोजाना- 90 हजार लीटर प्रति दिन
लॉकडाउन में खपत- 9 से 10 हजार लीटर प्रतिदिन
एक पंप पर औसतन तीन से चार सौ लीटर बिक रहा ईधन
त्रिवेणी सहाय पेट्रोल पंप के मालिक नितिन शर्मा ने बताया कि लॉकडाउन से पहलेएक पंप पर प्रतिदिन औसतन तीन से साढ़े तीन हजार के आसपास पेट्रोल और डीजल की ब्रिकी होती थी, जिसमें एक हजार से-1200 लीटर पेट्रोल और दो हजार से 22 सौ लीटर डीजल की खपत थी। यह घटकर कुछ दिनों पहले तक सात सौ से आठ सौ लीटर रह गई थी,लेकिन जब से जिला प्रशासन ने पास निरस्त किये हैं तब से यह आंकड़ा घटकर केवल 300 से 400 लीटर पर सीमित हो गया है।
विश्व के सभी देश अपनी अर्थव्यवस्था बढ़ाने की होड़ में लगे थे। इसका नतीजा यह हुआ कि लोग अपनी क्षमता से अधिक काम करने लगे। इसके चलते मशीनीकरण यानी औद्योगिकीकरण हुआ। जितना ज्यादा औद्योगिकीकरण हुआ उतना ही पर्यावरण प्रदूषित हुआ। ग्लेशियर पिघलने लगे और ऑक्सीजन कम होने लगी, लेकिन लॉकडाउन में सब लोग केवल अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में लगे हैं। पहले लोग घरों से बाहर निकलकर गंदगी करते थे। वह सभी कुछ खत्म हो गया। इससे वातावरण में शुद्घता आ रही है, जो आने वाले समय के लिए एक बेहतर संकेत है। बस जरूरत है कि सभी लोग इस तरफ पूरी तरह से ध्यान दें।
- डॉ. आरके वर्मा, प्रवक्ता वनस्पति विज्ञान, राजकी इंटर कॉलेज
कोविड-19 की वजह से काफी दिक्कतें आ रही हैं, लेकिन उसका कहीं न कहीं हम लोगों को फायदा भी मिल रहा है। देशभर में लॉकडाउन लागू किया गया है। इसकी वजह से बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिला है। पहले वातावरण में बहुत ज्यादा वायु और ध्वनि प्रदूषण होता था, जो अभी लगभग पूरी तरह से बंद है। ऑनलाइन पढ़ाई पर जोर दिया जा रहा हैं, जो कहीं न कहीं प्रदूषण नियंत्रण में सहायक हो रहा है। क्योंकि अभी तक कोचिंग जाने वाले छात्र-छात्राओं की शाम को लाइन से लगी रहती थी। कभी इस शिक्षक के पास तो कभी दूसरे शिक्षक के पास, ऐसे में वाहनों को अत्याधिक प्रयोग किया जाता था। लेकिन अब नहीं हो रहा है। सही बात ये है कि हम सभी लोग अपनी भारतीय सभ्यता को भूल चुके हैं। पहले हम लोग जरूरत के मुताबिक कमाते और खाते है। लेकिन मौजूदा समय में हम लोग दिखावे की ओर भाग रहे है। - डॉ. रूपम अग्रवाल, असिस्टेंट प्रोफेसर, बॉटनी, एनञएमएसएन दास कॉलेज
अस्थमा और एलर्जी के मरीजों की संख्या इन दिनों काफी होती थी। क्योंकि बदलते मौसम और प्रदूषण की वजह से ऐसे रोगियों को बेहद ज्यादा दिक्कत होती थी, लेकिन लॉकडाउन होने की वजह से वायु और ध्वनि प्रदूषण बेहद कम हुआ है। जिसकी वजह से ऐसे में रोगियों की संख्या कम हो गई है। हालांकि श्वास रोगियों को सलाह है कि लॉकडाउन के बाद भी मौसम परिवर्तन के समय नियमित फेस मास्क का उपयोग करें और नियमित दवा लें। ज्यादा दिक्कत हो तो चिकित्सक की सलाह लें।
- डॉ. नितिन कुमार, फिजिशियन, जिला अस्पताल