फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Budaun News ›   It was sometimes called Sadanera, not watering the water today

कभी सदानीरा कही जाती थी, आज पानी का नामोनिशान नहीं

Thu, 08 Jun 2017 11:44 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो कादरचौक।
अमर उजाला ब्यूरो कादरचौक। Updated Thu, 08 Jun 2017 11:44 PM IST
विज्ञापन
It was sometimes called Sadanera, not watering the water today
नदी - फोटो : अमर उजाला
सोत सूखने और सिल्ट की सफाई न होने से सूख गईं कादरचौक औ नूरपुर की झीलें
विज्ञापन

कादरचौक की बड़ी झील और नूरपुर की नारगोर झील कभी सदानीरा कही जाती थीं। अपने सौंदर्य के लिए मशहूर थीं। लेकिन एक दशक ज्यादा हो गए दोनों झीलें सूखी पड़ी हैं। इन्हें पुनर्जीवित करने का एक बार प्रयास हुआ, जो आगे नहीं बढ़ पाया। 
 कादरचौक क्षेत्र में 140 हेक्टेयर रकबे वाली झील भोजपुर, लालूपुर, नगरिया, गड़िया, मुतालिका, चौडेरा, सहित क्षेत्र की छह ग्राम पंचायतों के रकबे में फैली हुई है। नूरपुर के 200 बीघा में फैली  नारगोर झील से भी करीब आधा दर्जन गांव जुड़े हुए हैं। नारगोर झील कभी अपने सौंदर्य के लिए भी जानी जाती थी। ऐसा कहा जाता है कि यह प्राचीन काल में संतों की तप स्थली भी रही। आसपास के गांवों के बुजुर्गों का कहना है कि झीलों में कमल, चमेली, पुरेन आदि तमाम तरह की फुलवारी खिलती थी लेकिन पानी खत्म होने के बाद यह रौनक भी चली गई। लेकिन सिल्ट जमा होने की वजह से अब यहां एक बूूद भी पानी नहीं है। वर्षों से सिल्ट साफ न होने से पानी के सारे सोत बंद हो गए। दूसरा जलस्तर घटने से भी झीलों का पानी सूखने लगा। करीब दो साल पहले तत्कालीन जिलाधिकारी शंभूनाथ ने झील का दौरा किया था। इसी दौरान झील के सौंदर्यीकरण कराने के लिए बाढ़ खंड को आदेश दिए गए थे, लेकिन बाढ़ खंड अभी तक इसका प्रोजेक्ट तैयार नहीं कर पाया है।
विज्ञापन


झील की जमीन पर होने लगे कब्जे     
झील की सूखी जमीन पर लोगों ने खेती करनी शुरू कर दी है। कई बार अधिकारियों की ओर से कब्जा मुक्त कराने के लिए कहा गया लेकिन झील कब्जा मुक्त आज भी नहीं हो पाई है। लोग झील की जमीन पर बोरिंग लगा कर अपने खेतों की सिंचाई करते हैं और फसल उगाते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


झील सूखी तो वाटर लेवल भी घट गया     
आसपास के लोगों का कहना है कि पिछली बार से इस वाटर लेवल घट कर करीब 15-16 फिट नीचे पहुंच गया है। इन झीलों के सूखने से दिक्कतें बढ़ती जा रही है। जानवरों के पानी पीने के लिए और कोई साधन भी नही है। अगर ऐसे हालात बने रहे तो हर आदमी बूंद-बूंद के लिए तरसेगा।      

कभी आय का जरिया थीं झीलें
इन झीलों से लोग अपनी रोजी का भी धंध करते थे, इसमें मछली पालन, फूल खिलना, सिंघाड़ा की फसल करके लोग आपना पेट पालते थे लेकिन झील सूखने से इसकी संभावना भी खत्म हो गई है।

कच्चे मकानों की मरम्मत के बहाने होती थी सिल्ट सफाई       
गांवों में कच्चे मकानों को बनाने के लिए झील और तालाबों की मिटटी का उपयोग किया जाता था, जिनकी मोटी दीवारों को बनाने के लिए और बरसात से पहले ही मकानों की मरम्मत के लिए इन दोनों झीलों से बैलगाडियों मे भरकर पूरा गांव मिट्टी लाया करता था। इससे बरसात में आई सिल्ट साफ होती रहती थी। यह झील की गहराई बढ़ाने मे भी सहायक होती थीं। बदले दौर मे मकान पक्के बनने के बाद झीलों की साफ सफाई ही नहीं हो रही है।


झीलों के सौंदर्यीकरण का प्रस्ताव अभी नहीं बना है। डाटा कलेक्ट कर शीघ्र ही प्रस्ताव तैयार किया जाएगा। सौंदर्यीकरण होने के बाद झील में पानी भी हो सकेगा।
-राधेश्याम, अभियंता सब डिवीजन प्रथम वाढ़ खंड।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed