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मदद की उम्मीद में सूख रहे पीड़ित परिवार के आंसू
Dataganj
Updated Tue, 05 May 2015 07:47 PM IST
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गेहूं की फसल नष्ट होने पर कर्ज में डूबे आत्महत्या करने वाले किसान के परिवार को जिला प्रशासन ने अभी तक कोई पुख्ता मदद नहीं मिली है। सूदखोरों के खौफ से इस परिवार ने अपना पुराना घर छोड़कर नई जगह पर झोपड़ी डालकर बसेरा बनाया है। यही परिवार उसी में गुजर-बसर करने को मजबूर है।
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क्षेत्र के गढ़ा गांव में एक अप्रैल की रात में युवा काश्तकार सूरजपाल जाटव ने बबूल के पेड़ पर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। सूरजपाल ने अपनी सात बीघा जमीन गिरवी रखकर बीस बीघा जमीन पेशगी पर ली थी और इसमें गेहूं की फसल की थी। अतिवृष्टि और तेज हवाओं से उसकी पूरी फसल चौपट हो गई। पत्नी, तीन बच्चे और विधवा मां के साथ जीवन यापन करने वाले सूरजपाल को दो लाख रुपये कर्ज निपटाने की चिंता भी थी। इसीलिए उसने आत्मघाती कदम उठाया। उस समय प्रशासन ने पूरी मदद करने के साथ सूदखोरों पर लगाम कसने और बंधक जमीन वापस दिलाने का आश्वासन दिया था, लेकिन मदद के नाम पर अभी तक अन्य काश्तकारों की भांति मात्र 5,400 रुयये का चेक मुआवजे के तौर पर दिया गया है।
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विधवा मां का दर्द
मृतक किसान की विधवा मां सुदामा के आंसू उनके दर्द को बयां करते हैं। बुढ़ापे की लाठी छूट जाने का दर्द उनके अलावा और कौन समझ सकता है। उनकी बंधक जमीन अभी मुक्त नहीं हुई है। बैंक वालों को छोड़ साहूकार अपना रुपया लेने का दबाव बना रहे हैं। उसने कहा कि अभी तक उसका मतदाता पहचान पत्र तक नहीं बना है। पहचान पत्र बनाने वाला उससे 300 रुपये की मांग कर रहा है। एक तो सूदखोरों के तगादे, दूसरे घर में कोई पुरुष न होने के डर के चलते वो घर छोड़ दिया। मोहल्ले वालों ने सुरक्षित स्थान पर एक झोपड़ी बना दी है। उसी में जीवन यापन हो रहा है।
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आय के नाम पर भैंस बनी है सहारा
इस परिवार की आय के नाम पर एक मात्र भैंस है। इसका दूध बेचकर ही गुजर-बसर हो रही है। भैंस भी एक समय दूध दे रही है। यही दूध बेचकर जो पैसेे मिल रहे हैं, उसी से परिवार गृहस्थी की गाड़ी खींची जा रही है।
भग्गू की विधवा पर तीन बच्चों की जिम्मेदारी
डहरपुर कलां गांव निवासी 50 वर्षीय भग्गू की हार्टअटैक से मौत हुई थी। इस परिवार को तो फसल नुकसान का चेक तक नहीं मिला है। हरदेवी पति की मौत के बाद आठ वर्षीय पुत्री राधा, पांच वर्षीय पुत्री अनारकली और दो वर्षीय बेटा हीरालाल को किसी तरह पाल-पोस रही हैं। इस पर मात्र डेढ़ बीघा जमीन है। भग्गू पर सूदखोरों का 15 हजार रुपये कर्जा है। ये लोग भग्गू की पत्नी का जीना मुहाल किए हुए हैं। उसका रोना है कि बच्चों का पेट पालना ही मुश्किल है, कर्जा कहां से निपटाए? भग्गू ने भी पेशगी और बटाई पर 10 बीघा गेहूं की फसल की थी। फसल की दुर्दशा देखकर ही उसका हार्टअटैक हुआ था।
तहसील क्षेत्र के गढ़ा गांव के मृतक किसान सूरजपाल और काकोरी गांव (उसहैत) के ओमेंद्र गिरि का नाम कृषि दुर्घटना बीमा और फसल दुर्घटना बीमा दोनों में भेज दिया गया है। मुख्यमंत्री सहायता कोष से भी मदद की डिमांड की है। आने में थोड़ा वक्त लगेगा
- ओपी तिवारी, एसडीएम, दातागंज
कब मिल पाएगी शासकीय सहायता
वजीरगंज (बदायूं)। कर्जे का दबाव, गेहूं की फसल बर्बाद होने और लोहिया आवास का पैसा न मिलने से डिप्रेशन में आकर किसान द्वारा आत्महत्या कर लेने के पौन माह बाद फौरी तौर पर कई योजनाओं का लाभ तो मिला है, लेकिन आश्वासन के बाद भी शासकीय सहायता राशि किसान के परिवार को अभी तक हासिल नहीं हुई है। घर के मुखिया के गुजर जाने के बाद परिवार बुरी तरह टूट गया है।
क्षेत्र के ग्राम बगरैन में बीती 10 अप्रैल को किसान कन्हई लाल ने डिप्रेशन में घर के बाहर खड़े पेड़ की डाल से लटक कर आत्महत्या कर ली थी। मृतक कन्हई लाल पर करीब तीन लाख रुपये के कर्जे का दबाव तो था ही, उसकी गेहूं की फसल भी बर्बाद हो गई थी। यही नहीं उसके लिए मंजूर लोहिया आवास स्वीकृत हो गया था। उसने आवास बनवाने को अपना पुराना मकान भी तोड़ डाला। मगर, लोहिया आवास के लिये किस्त खाते में न आने से वह विचलित हो उठा था।
डीएम ने दिलाया कई योजनाओं का लाभ
किसान की मौत के बाद आनन-फानन में उसके खाते में अगले ही दिन लोहिया आवास की पहली किस्त एक लाख, 37 हजार, 500 रुपये डाल दी गई। एसडीएम गुलाब चंद ने तत्काल आर्थिक सहायता के रूप में मृतक की विधवा का पांच हजार रुपये और दो बोरे गेहूं और एक बोरा चावल भी मुहैया करा दिए। मौके पर पहुंचे डीएम शंभूनाथ ने भी मृतक का कृषक बीमा, पारिवारिक लाभ योजना, विधवा पेंशन और समाजवादी पेंशन की तत्काल सुविधा दिलाए जाने को एसडीएम को निर्देशित कर औपचारिकताएं पूरी कर लीं थीं।
सूदखोरों से राहत, पर आश्वासन पर टिकी उम्मीद
पौन माह बीत जाने के बाद अभी तक शासन की ओर से सरकारी इमदाद मिलने की दिशा में कोई कार्यवाही नहीं होने से मृतक की विधवा खासी परेशान है। विधवा चंद्रकली का कहना है कि उसके पति ने जिनसे कर्ज लिया था किसी ने कोई तकादा नहीं किया है। सूदखोरों का कहना है कि जब पैसा हो जाए तब दे देना। मोहल्ले के लोगों का समय-समय पर सहयोग मिलता रहा है। इससे थोड़ी राहत है। लोहिया आवास की पहली किस्त से वह अपने रहने के लिए भी ठिकाना बनवा रही है। मगर, व्यवस्था को लेकर उसके मन में बड़ा सवाल हैं, उसका कहना है कि अगर, आवास की किस्त के पैसे पहले ही खाते में डाल दिए गए होते तो उसका पति जीवित होता। उसका यह भी कहना कि परिवार की जरूरतों के लिए उसे पैसों की खास जरूरत है। बेटी की शादी भी करनी है। अगर, सरकारी सहायता समय पर मिल जाती है तो उसे काफी राहत मिलेगी।